क्या रेगिस्तान को हरा भरा बनाया जा सकता है?

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जब हम किसी रेगिस्तान के बारे में सोचते हैं, तो गोबी या सहारा के विशाल विस्तार हमारे जेहन में आ सकते हैं। असल में, रेगिस्तान काफी विविधता से भरे होते हैं, जहां पौधों, जानवरों और इंसानी जिंदगी के अलग-अलग स्तर पाए जाते हैं। मिस्र की राजधानी काहिरा दुनिया का सबसे बड़ा रेगिस्तानी शहर है, जहां 2.3 करोड़ से ज्यादा लोग रहते हैं। लेकिन आम तौर पर, रेगिस्तान एक बेहद सूखा इलाका होता है, जहां पानी की कमी ज्यादातर जीवन के पनपने को मुश्किल बना देती है।

दुनिया में रेगिस्तान बढ़ रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक हर साल करीब 10 लाख वर्ग किलोमीटर उपजाऊ जमीन खराब हो जाती है। जैसे-जैसे धरती पर उपजाऊ जमीन कम होती जा रही है, क्या यह मुमकिन है कि हम अनोखे तरीकों से पानी पैदा करें और रेगिस्तान को ऐसा बनाएं जहां पौधे पनप सकें?

मौसम में बदलाव
चीन की बीजिंग नार्मल यूनिवर्सिटी में भौगोलिक विज्ञान के प्रोफेसर यान ली बताते हैं, ‘‘मरुस्थलीकरण का मतलब है कि कोई प्राकृतिक जमीन, जैसे घास का मैदान या झाड़ीदार इलाका, धीरे- धीरे ज्यादा सूखा होता जाता है और फिर रेगिस्तान में बदल जाता है।’’ 1970 के दशक में वैज्ञानिक जूल चार्नी ने पाया कि इस प्रक्रिया में इंसानी गतिविधियों की अहम भूमिका होती है। ‘जब आपके पास बहुत ज्यादा मवेशी होते हैं, तो वे सारे घास खा जाते हैं, जिससे घास खत्म होकर जमीन नंगी या रेत में बदल जाती है।’’

जब ऐसा होता है तो अल्बीडो यानी सतह की परावर्तन क्षमता बदल जाती है, क्योंकि नंगी रेत काफी चमकदार होती है और वह सूरज की रोशनी का बड़ा हिस्सा लौटा देती है। जब जमीन गर्मी को सोखने के बजाय उसे वापस परावर्तित करती है, तो उसके ऊपर की हवा उतनी गर्म नहीं हो पाती है और कम नमी भाप में बदलती है, इससे कम बादल बनते हैं, नतीजा यह होता है कि इलाका और ज्यादा सूखा हो जाता है। ‘‘क्या होगा अगर हम सतह का अल्बीडो कम कर दें? क्या इससे बारिश बढ़ेगी?’’ सोलर पैनल ऐसा करने का एक अच्छा तरीका हैं। ये गहरे रंग के होते हैं और गहरे रंग की सतहें गर्मी को सोखती हैं, जिससे हवा गर्म होती है, नमी ऊपर उठती है और बादल बनते हैं। अगर सहारा का 20 फीसदी हिस्सा गहरे रंग के सोलर पैनलों से ढक दिया जाए तो क्या होगा। उन्होंने इस काम में विंड टर्बाइन (पवन चक्कियां) के संभावित इस्तेमाल का भी जिक्र किया। ली बताते हैं, ‘‘अगर हमारे पास विंड टर्बाइन होंगे, तो यह सतह के खुरदुरापन को बदलेगा। ज्यादा घर्षण के साथ, ज्यादा ऊर्जा टर्बुलेंस के जरिए वायुमंडल में जा सकती है। और यह टर्बुलेंस मौसम बनाती है और बादल तैयार करती है।’’ उनके माडल के मुताबिक, पूरे सहारा रेगिस्तान में औसत बारिश दोगुनी हो सकती है।

लेकिन अभी यह सिर्फ एक सिमुलेशन है और इसके लिए बड़ी संख्या में सोलर पैनल और विंड टर्बाइन की जरूरत होगी, जो करीब 20 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में होंगे। यह लगभग मेक्सिको या इंडोनेशिया के क्षेत्रफल के बराबर है। ली यह भी बताते हैं कि यह तरीका सिर्फ उन जगहों पर काम करता है, जैसे सहारा, जो समुद्र के करीब हैं, जहां से नम हवा अंदर लाई जा सकती है। कई दूसरे रेगिस्तान, जैसे गोबी या मध्य पूर्व के रेगिस्तान, समुद्र से बहुत दूर हैं।
फाग हार्वेस्टिंग

चिली के एटाकामा रेगिस्तान अक्सर धरती का सबसे सूखा स्थान कहा जाता है, वहां एक तकनीक के जरिये हवा से पानी निकाला जाता है। चिली की यूनिवर्सिटी ‘यूनिवर्सिदाद मेयर’ में भूगोलविद और असिस्टेंट प्रोफेसर वर्जीनिया कार्टर इन फाग कलेक्शन सिस्टम को तैयार करने की विशेषज्ञ हैं। वह कहती हैं, ‘‘फाग हार्वेस्टिंग करीब 50 साल पहले चिली में शुरू हुई थी। इसका मकसद रेगिस्तान में बादलों से पानी हासिल करना है।’’ धुंध से पानी पकड़ना काफी आसान है। खंभों के बीच एक जाली टांगी जाती है, और जब नमी से भरे बादल इस बारीक जाली से गुजरते हैं, तो बूंदें बनती हैं। इसके बाद पानी को पाइप और टैंक में इकट्ठा किया जाता है।

कार्टर कहती हैं कि चिली के उत्तरी हिस्से में औसतन हर दिन प्रति वर्ग मीटर दो लीटर पानी हासिल किया जा सकता है, जबकि कुछ जगहों पर यह सात लीटर तक हो सकता है। तो क्या भविष्य में फाग हार्वेस्टिंग रेगिस्तान को हरा-भरा बनाने में मदद कर सकती है? कार्टर कहती हैं कि यह मुमकिन है। उनकी टीम इस समय एटाकामा रेगिस्तान में एक प्रोजेक्ट पर काम कर रही है, जिसमें फाग के पानी का इस्तेमाल हाइड्रोपोनिक्स के लिए किया जा रहा है, यानी मिट्टी के बजाय पोषक घोल वाले पानी में पौधे उगाना। लेकिन इसमें कुछ कमियां भी हैं। इस तरीके से मिलने वाला पानी दूसरी तकनीकों के मुकाबले काफी कम होता है, और इसके लिए ऐसी जगह चाहिए जहां धुंध मौजूद हो, जो आमतौर पर समुद्र के करीब होती है।

समुद्री पानी को पीने लायक बनाना
जब वैश्विक समुद्री जल स्तर बढ़ रहा है, तो क्या सीधे समुद्र से पानी लेना मददगार हो सकता है? हालांकि समुद्री पानी को मीठा बनाना काफी असरदार है, लेकिन आज के तरीके काफी ऊर्जा खपत करते हैं और अक्सर जीवाश्म ईंधन पर निर्भर होते हैं। डर्बी यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर क्रिस्टोफर सेनसम छोटे डीसेलिनेशन यूनिट विकसित कर रहे हैं, जो सौर ऊर्जा पर आधारित हैं। इसमें आईनों का इस्तेमाल करके सूरज की रोशनी को पाइपों पर केंद्रित किया जाता है, जिससे समुद्री पानी उबलता है और नमक अलग हो जाता है। लेकिन इंसानी जरूरतों को पूरा करने के लिए और रेगिस्तान को हरा-भरा बनाने के लिए, इस तकनीक को बड़े पैमाने पर लागू करना होगा। और चाहे इसे किसी भी तरीके से किया जाए, इसमें बड़ी मात्रा में बचा हुआ नमक निकलता है, जो आसपास के पर्यावरण को नुकघ्सान पहुंचा सकता है।

हमें यह करना चाहिए?
सिद्धांत रूप में, हम समुद्री पानी को मीठा बनाकर, बादलों से पानी हासिल करके, या रेगिस्तान के मौसम को बदलकर उसे हरा-भरा बना सकते हैं। लेकिन रेगिस्तान अपने आप में बुरे नहीं होते। ली कहते हैं, ‘‘रेगिस्तान धरती पर प्राकृतिक जगह हैं। अगर रेगिस्तान स्थिर है, तो यह ठीक है। हम उसे वैसे ही रहने दे सकते हैं।’’ नाटिंघम यूनिवर्सिटी की प्लांट साइंटिस्ट जिन्निया गोंजालेज करांजा कहती हैं, ‘‘रेगिस्तान को हरा-भरा बनाने या वहां पानी लाने की कोशिश करने के बजाय, हमें वहां मौजूद जीवन की रक्षा करनी चाहिए।’’

वह कहती हैं कि रेगिस्तान को हरा-भरा बनाने की कोशिश लंबे समय में पर्यावरण और वहां रहने वाले लोगों के लिए नुकसानदेह हो सकती है। उनके अनुसार, ‘‘पौधे लगाकर शायद हम कुछ समय के लिए अच्छी फसलें उगा लें, लेकिन इसके लिए बहुत ज्यादा पानी चाहिए होगा। और हमने देखा है कि अगर आप इन फसलों में ज्यादा पानी इस्तेमाल करते हैं, तो रेगिस्तान के आसपास रहने वाले समुदाय ही सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं।’’ वह कहती हैं, ‘‘मुझे लगता है कि सबसे अच्छा यही है कि हम रेगिस्तान को समझें, उसका सम्मान करें और उसके साथ मिलकर काम करने की कोशिश करें।’’
स मितेन्द्र गेडाम