नार्वे को दुनिया के सबसे हरित देशों में से एक माना जाता है। इसके शहरों में साइकिलों की भरमार है, इसकी 98 प्रतिशत बिजली रेन्यूएबल स्रोतों से आती है और 2024 में बिकने वाली हर दस में से नौ नई गाड़ियां इलेक्ट्रिक थीं। नार्वे अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) का सदस्य देश भी है। यहां कुल ऊर्जा खपत में बिजली की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा है, और यह कार्बन टैक्स लगाने वाले शुरुआती देशों में से भी एक रहा है। लेकिन इसके साथ-साथ, देश ने गैस और तेल का उत्पादन लगातार बढ़ाना जारी रखा है। प्रदूषण फैलाने वाले ये जीवाश्म ईंधन बड़े पैमाने पर निर्यात किए जाते हैं और यही नार्वे सरकार की आय का सबसे बड़ा स्रोत हैं।
यही संसाधन, दरअसल मशहूर सावरेन वेल्थ फंड की बुनियाद है जिसे ‘आयल फंड’ कहा जाता है, जो कि उदार पेंशन प्रणाली और कल्याणकारी राज्य की वित्तीय स्थिरता की गारंटी देता है। घरेलू स्तर पर कार्बन उत्सर्जन घटाने की कोशिशों और वैश्विक स्तर पर जीवाश्म ईंधन के बड़े निर्यातक की भूमिका के बीच इस विरोधाभास को ‘नार्वेजियन पैराडाक्स’ नाम दिया गया है, और यह सालों से तीखी राजनीतिक और सामाजिक बहस को पैदा करता रहा है।
जहां पर्यावरण समूह और नौजवान एक्टिविस्ट तेल कारोबार को कम करने के लिए ठोस प्रतिबद्धताओं और एक समयसीमा की मांग कर रहे हैं, वहीं अर्थव्यवस्था में योगदान और इससे पैदा होने वाली हजारों नौकरियों की वजह से इस उद्योग का अपना महत्व रहा है। मध्य पूर्व में युद्ध, और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज स्ट्रेट की नाकाबंदी से तेल की वैश्विक कीमतों में आई बढ़ोतरी ने र्नो को भारी अप्रत्याशित लाभ पहुंचाए हैं, लेकिन इसने देश की सबसे असहज बहसों में से एक को फिर से तेज कर दिया है।
तेल और गैस का रणनीतिक महत्व
संयुक्त राष्ट्र के मानव विकास सूचकांक के अनुसार, दुनिया के सबसे विकसित देशों में से एक नार्वे में ऊर्जा क्षेत्र संपन्नता का मुख्य स्रोत है। नार्वे के कुल निर्यात में इस क्षेत्र की भागीदारी 60 फीसदी से ज्यादा है और सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में हिस्सेदारी 20 प्रतिशत से भी ज्यादा हिस्सा है। नार्वे के महाद्वीपीय किनारे पर सबसे बड़ा आपरेटर इक्वीनार ग्रुप है, जिसमें ज्यादातर हिस्सेदारी सरकार की है, और इसके मुनाफे का बड़ा हिस्सा सावरेन वेल्थ फंड यानी आयल फंड में डाल दिया जाता है।
एक अनुमान के मुताबिक, साल 2025 के अंत तक इस कोष में कुल 1.9 ट्रिलियन अमेरिकी डालर तक थे, जो प्रति नागरिक लगभग 3.5 लाख डालर की बचत के बराबर है। साल 2026 के मौजूदा संदर्भ में, मध्य पूर्व में बढ़ता तनाव यह संकेत देता है कि ये आँकड़े आगे भी बढ़ते रहेंगे। ईरान के खिलाफ अमेरिका और इसराइल की जंग शुरू होने के बाद से सरकार को अतिरिक्त 5 अरब डालर की आमदनी हुई है और स्थानीय ऊर्जा कंपनियों के प्रदर्शन से ओस्लो शेयर बाजार ने रिकार्ड तोड़ दिए हैं।
नोबेल शांति पुरस्कार देने वाला देश युद्ध की उथल-पुथल से अमीर बन रहा है, इस धारणा को लेकर लेबर सरकार ने जवाब देने की कोशिश की है। नार्वे के वित्त मंत्री और नेटो के पूर्व महासचिव जेन्स स्टोल्टेनबर्ग ने इसे एक विरोधाभास (पैराडाक्स) बताते हुए कहा कि नार्वे को ‘शांति से ज्यादा फायदा होता है।’ लेकिन एनआरके की स्तंभकार सेसिली लैंगुम बेकर के शब्दों में, ‘‘कड़वी सच्चाई यह है कि जब दुनिया जलती है, तो हमारी सरकार के बजट में पैसा आता है।’’ यह स्थिति 2022 में ही साफ दिखाई देने लगी थी, जब रूस के यूक्रेन पर हमले के बाद मास्को का यूरोप को निर्यात तेजी से घट गया। तब से, ऊर्जा संकट से जूझ रहे महाद्वीप के लिए नार्वे एकमात्र भरोसेमंद आपूर्तिकर्ता के रूप में उभरा है। वित्तीय कंपनी नोर्डिया की विश्लेषक थीना साल्टवेट ने का कहना है कि ‘‘आज हम यूरोप में खपत होने वाली गैस का लगभग 30 प्रतिशत और तेल का 15 प्रतिशत सप्लाई करते हैं और अपने कुल निर्यात का 90 प्रतिशत वहीं भेजते हैं।’’
डी-कार्बनाइजेशन नीति
अपने बड़े तेल गैस भंडारों के बावजूद, नार्वे दशकों से यूरोप की सबसे स्वच्छ बुनियादी सुविधाओं में से एक वाला देश है। इसकी वजह मुख्यतः इसका जल विद्युत नेटवर्क है। साल 1991 में सरकार ने ग्रीन एनर्जी को बढ़ावा देने के लिए कार्बन टैक्स लगाया। 2005 में प्रोत्साहनों की बदौलत देश इलेक्ट्रिक कारों में दुनिया का अग्रणी देश बन गया। और 2017 में संसद ने 2030 तक कार्बन उत्सर्जन में 50 प्रतिशत कटौती के लिए जलवायु कानून पारित किया। हालांकि मौजूदा अंतरराष्ट्रीय हालात इस धारा को बेपटरी करते नजर आते हैं।
यूक्रेन और ईरान में संघर्षों ने सबसे ‘ग्रीन’ राजनीतिक पार्टियों को भी यह स्वीकार करने पर मजबूर कर दिया है कि यूरोपीय ऊर्जा सुरक्षा के लिए नार्वेजियन गैस एक ‘जरूरी बुराई’ है। गुलोवसेन के मुताबिक, अब प्रमुख बहस यह है कि वैश्विक अस्थिरता, हाइड्रोकार्बन पर और ज्यादा दांव लगाने को जायज ठहराती है। उन्होंने कहा, ‘‘अब गहरे आर्कटिक जलक्षेत्रों में नए इलाकों में काम करने की बात हो रही है- ऐसे संवेदनशील पर्यावरण में, जहां किसी भी हालत में दोहन नहीं होना चाहिए।’’
आगे क्या?
नार्वे के प्रधानमंत्री योनास गार स्टोरे की सरकार ने हाल ही में नई खोज के 57 लाइसेंस जारी किए। उन्होंने वादा किया, ‘‘हम यूरोप को सप्लाई के लिए और ज्यादा तेल की तलाश जारी रखेंगे। प्रधानमंत्री ‘तेल क्षेत्र से बाहर निकलने का चरण तय करने के बजाय उद्योग के ‘विकास’ के पक्षधर हैं। अपनी पार्टी के युवा धड़े के दबाव के बावजूद, उनका उद्योग से बाहर निकलने के लिए टाइम लाइन देने का कोई इरादा नहीं है। इसके उलट, वह सबसे कम दोहन किए गए क्षेत्र- बारेंट्स सागर- पर दांव लगा रहे हैं ताकि पुराने तेल भंडारों में आ रही गिरावट की भरपाई की जा सके। इंडस्ट्री एनर्जी यूनियन के फ्रोडे आल्फहाइम ने इस उद्योग की सामाजिक अहमियत की याद दिलाते हुए कहा, ‘‘हम 2 लाख से ज्यादा प्रत्यक्ष नौकरियों की बात कर रहे हैं। यह यूरोप को आपूर्ति बंद किए जाने का समय नहीं है।’’ वहीं, साल्टवेट ने चेतावनी दी, ‘‘ज्यादा से ज्यादा लोग महसूस कर रहे हैं कि यह उद्योग अपने अंतिम चरण में पहुंच रहा है लेकिन बदलाव का यह सफर तकलीफदेह होगा।’’
स ए.के. पाण्डेय
