कैंसर के खिलाफ कितनी असरदार है इम्यूनोथेरेपी?

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कैंसर के इलाज के लिए कीमोथेरेपी और सर्जरी का इस्तेमाल किया जाता है और पिछले कुछ सालों से कैंसर के खिलाफ एक और हथियार चर्चा में है, नाम है इम्यूनोथेरेपी। करीब 100 साल के विकास के बाद, शरीर के इम्यून सिस्टम (प्रतिरोधक क्षमता) को मजबूत करके कैंसर से लड़ने वाले इलाज अब असर दिखा रहे हैं और मरीजों की जान बचा रहे हैं। यह इलाज अब तेजी से आगे बढ़ रहा है। इससे मरीज के हिसाब से इलाज, लंबे समय तक कैंसर से राहत और कम साइड इफेक्ट की उम्मीद मिलती है।

शरीर में यह प्राकृतिक क्षमता होती है कि वह ‘‘ऐसी कोशिकाओं को पहचानकर खत्म कर दे जो स्वस्थ नहीं लगतीं। अगर सब कुछ सही तरीके से काम कर रहा हो, तो इसमें कैंसर बन चुकी कोशिकाएं भी शामिल होनी चाहिए। लेकिन कभी-कभी कैंसर कोशिकाएं इस प्रणाली से बच निकलती हैं या इसे मात दे देती हैं, जिससे खतरनाक और अनियंत्रित वृद्धि होती है। वे सामने होते हुए भी छिपी रहती हैं और आसपास की स्वस्थ कोशिकाओं से अलग पहचान में नहीं आतीं।

इम्यूनोथेरेपी का लक्ष्य उन कैंसर कोशिकाओं को उजागर करना है ताकि इम्यून सिस्टम उन्हें सही रूप में पहचान सके। यह इम्यून सिस्टम की रक्षा क्षमता को मजबूत करता है ताकि वह कैंसर कोशिकाओं को ढूंढकर नष्ट कर सके और इसके परिणाम बेहद प्रभावशाली हो सकते हैं।

इम्यूनोथेरेपी के दो सबसे प्रसिद्ध रूप हैं, सीएआर-सेल थेरेपी और इम्यून चेकपाइंट इनहिबिटर्स। सीएआर टी-सेल थेरेपी में मरीज के खून से टी-सेल (बहुत ही विशेष इम्यून सेल्स जो खास बाहरी हमलावरों को पहचानकर खत्म करती हैं) निकालना, उन्हें लैब में इस तरह बदलना कि वे कैंसर कोशिकाओं को ढूंढकर हमला कर सकें, और फिर इन मजबूत किए गए टी-सेल्स को शरीर में वापस छोड़ देना शामिल होता है। इन थेरेपी का इस्तेमाल फिलहाल खून से जुड़े कैंसर के इलाज में किया जाता है।

इम्यून चेकपाइंट इनहिबिटर्स ऐसी दवाएं हैं जो इम्यून सिस्टम के अंदर मौजूद एक ‘‘आफ स्विच’’ को बंद कर देती हैं। इस सुरक्षा प्रणाली का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य होता है, यह बहुत जल्दी फैलने वाले प्रतिक्रिया को रोकती है, जो स्वस्थ कोशिकाओं को नुकसान पहुंचा सकती है। लेकिन कुछ कैंसर कोशिकाएं इस ‘‘आफ स्विच’’ को चालू कर देती हैं, जिससे टी-सेल काम करना बंद कर देते हैं और वे पहचान से बच निकलती हैं। इम्यून चेकपाइंट इनहिबिटर्स ऐसा होने से रोकते हैं, जिससे टी-सेल कैंसर कोशिकाओं को खतरे के रूप में पहचानते हैं और उन पर हमला करते हैं।

इस तकनीक को विकसित करने वाले वैज्ञानिकों को 2018 में नोबेल पुरस्कार मिला, और आज इन दवाओं का इस्तेमाल कई तरह के कैंसर में किया जा रहा है। फिर भी, इन दोनों तरीकों की अपनी सीमाएं हैं। हालांकि शोध जारी है, लेकिन वैज्ञानिक ठोस ट्यूमर (ब्लड कैंसर के विपरीत), पर सीएआर टी-सेल थेरेपी को प्रभावी बनाने में संघर्ष कर रहे हैं, जो नए मामलों में 90 फीसदी से ज्यादा होते हैं। यह इलाज महंगा है और इसके लिए काफी मेहनत और संसाधनों की जरूरत होती है।

इम्यूनोथेरेपी के साइड इफेक्ट
इम्यून चेकपाइंट इनहिबिटर्स के साथ ‘‘कई तरह के साइड इफेक्ट’’ हो सकते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि इम्यून सिस्टम का ‘‘आफ स्विच’’ शरीर को अपनी ही कोशिकाओं पर हमला करने से रोकता है, और इस सुरक्षा को हटाने से सिर्फ ट्यूमर ही नहीं बल्कि स्वस्थ कोशिकाएं भी खतरे में आ सकती हैं। अमेरिका के नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट के मुताबिक, आम साइड इफेक्ट में त्वचा पर चकत्ते, दस्त और थकान शामिल हैं, जबकि दुर्लभ मामलों में यह लीवर, दिल और किडनी में सूजन भी पैदा कर सकता है।

अगर यह दवा आक्रामक कैंसर (तेजी से फैलने वाले कैंसर) को नियंत्रित कर ले, तो यह समझौता फायदेमंद हो सकता है। लेकिन यह हमेशा ऐसा काम नहीं करता। पूरे आन्कोलाजी क्षेत्र की एक बड़ी समस्या यह है कि कोई भी इम्यूनोथेरेपी 100 फीसदी मरीजों पर काम नहीं करती। इसके कई कारण हो सकते हैं, जैसे ट्यूमर की बनावट से लेकर खुद इम्यून कोशिकाओं की विशेषताओं तक और ये इम्यून सिस्टम के लिए उसे पहचानना मुश्किल बना देते हैं। सामान्य तौर पर, करीब 20 फीसदी से 40 फीसदी मरीज ही इम्यूनोथेरेपी पर प्रतिक्रिया देते हैं। इसका मतलब है कि बहुत से मरीज, वास्तव में ज्यादातर मरीज, साइड इफेक्ट का जोखिम उठाते हैं, साथ ही समय और उम्मीद भी गंवाते हैं, लेकिन उन्हें ज्घ्यादा फायदा नहीं मिलता।

कई रणनीतियों पर काम
ज्यादा मरीज इम्यूनोथेरेपी से कैसे फायदा उठा सकते हैं? इस पर शोधकर्ता कई अलग-अलग तरीकों से काम कर रहे हैं। जो मरीज ज्यादा फाइबर वाला खाना खाते हैं, उन्हें बेहतर परिणाम मिल सकते हैं, क्योंकि इससे आंतों के माइक्रोबायोम में बदलाव आता है जो प्रतिरक्षा प्रणाली और ट्यूमर दोनों को प्रभावित कर सकता है। अन्य शोध बताते हैं कि स्टैटिन, जो सस्ती और आसानी से मिलने वाली कोलेस्ट्राल कम करने वाली दवाएं हैं, कोशिकाओं के बीच संचार में बदलाव के जरिए इम्यूनोथेरेपी के असर को बढ़ा सकती हैं। इलाज का समय भी महत्वपूर्ण हो सकता है, कुछ हालिया शोध बताते हैं कि दिन में जल्दी दवा लेने वाले मरीजों के परिणाम बाद में लेने वालों से बेहतर होते हैं।

इम्यूनोथेरेपी को अन्य इलाज जैसे रेडिएशन या अल्ट्रासाउंड के साथ मिलाकर इस्तेमाल करना भी असर बढ़ाने का एक तरीका हो सकता है। ‘‘रेडिएशन वास्तव में ट्यूमर को इम्यून सिस्टम के लिए दिखाई देने योग्य बना सकता है।’’ हाई फ्रीक्वेंसी वाली ध्वनि तरंगों का उपयोग करके ट्यूमर पर हमला करने वाली अल्ट्रासाउंड थेरेपी भी यही काम कर सकती है। अन्य शोधकर्ता इम्यूनोथेरेपी की कस्टमाइजेशन क्षमता का लाभ उठा रहे हैं और मरीजों को उनके लिए सबसे उपयुक्त इलाज से सावधानीपूर्वक जोड़ रहे हैं।

व्यक्तिगत औषधि क्यों जरूरी
व्यक्तिगत औषधि कई क्षेत्रों में उत्साह पैदा कर रही है, यह आन्कोलाजी के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह बीमारी बहुत अलग-अलग तरह की होती है। ‘‘कैंसर एक बीमारी नहीं है। यह 200 अलग-अलग बीमारियां हैं, और ये अलग-अलग वजहों से होती हैं, इसलिए इनका इलाज भी अलग-अलग तरीके से करना पड़ता है।’’ यहां तक कि एक ही प्रकार और स्टेज के कैंसर वाले दो मरीजों में भी कोशिका स्तर पर बीमारी अलग हो सकती है। यह क्षेत्र एक अहम मोड़ पर है। अब हम सिर्फ कैंसर नहीं, बल्कि मरीज का इलाज करने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।

मोरियल स्लोन केटरिंग कैंसर सेंटर के वैज्ञानिकों ने पहले ही एक आशाजनक रणनीति का परीक्षण किया है, जो इस खोज पर आधारित है कि एक खास जेनेटिक प्रोफाइल वाले ट्यूमर इम्यून चेकपाइंट इनहिबिटर्स, जैसे डोस्टार्लिमैब, पर अच्छी प्रतिक्रिया देते हैं। साल 2022 और 2024 में किए गए दो छोटे ट्रायल्स में, इस प्रोफाइल वाले रेक्टल कैंसर का इलाज करने पर ट्यूमर पूरी तरह खत्म हो गए। इसके बाद टीम ने अपने शोध में 117 मरीजों को शामिल किया, जिनमें इसोफेगल, ब्लैडर और पेट के कैंसर जैसे अलग-अलग प्रकार के ट्यूमर थे, लेकिन उनमें वही जेनेटिक विशेषता थी। जिन 103 लोगों ने पूरा इलाज पूरा किया, उनमें से 84 के ट्यूमर पूरी तरह गायब हो गए। केवल दो को अतिरिक्त सर्जरी की जरूरत पड़ी। एमडी एंडरसन के शोधकर्ताओं ने एक अलग चेकपाइंट इनहिबिटर के साथ इसी तरह के परिणाम बताए हैं। अन्य समूहों ने यह भी दिखाया है कि भले ही मरीजों को बाद में सर्जरी करानी पड़े, लेकिन अगर पहले ट्यूमर पर इम्यूनोथेरेपी से हमला किया जाए, तो कुछ मामलों में सर्जरी के नतीजे बेहतर हो सकते हैं। हालांकि और शोध की जरूरत है, लेकिन ये नतीजे उम्मीद जगाते हैं, क्योंकि ये कम दर्दनाक और ज्यादा प्रभावी इलाज के नए दौर का रास्ता खोलते हैं। हमें मध्ययुगीन समय से आधुनिक समय की ओर बढ़ना होगा। रेक्टम, पेट या ब्लैडर निकालने से बेहतर तरीका खोजना होगा। लेकिन एक शर्त यह है कि करीब 5 फीसदी ट्यूमर में ऐसा जेनेटिक ढांचा होता है, जो बिना सर्जरी वाली इम्यूनोथेरेपी के लिए उपयुक्त है। बाकी 95 फीसदी के लिए भी उतना ही अच्छा इलाज चाहिए।

कैंसर वैक्सीन की उम्मीद
इस दिशा में, शोधकर्ता नई इम्यूनोथेरेपी विधियों की तलाश जारी रखे हुए हैं और पुरानी विधियों को बेहतर बनाने की कोशिश कर रहे हैं, जैसे कैंसर वैक्सीन। पारंपरिक वैक्सीन शरीर को किसी रोगजनक, जैसे वायरस, के हिस्सों से परिचित कराती है, ताकि शरीर असली हमले के खिलाफ इम्यून सिस्टम का अभ्यास कर सके। ऐसा ही विचार कैंसर में भी काम कर सकता है, फर्क यह है कि इसका उपयोग बीमारी को रोकने के बजाय इलाज करने के लिए किया जा सकता है। कैंसर कोशिकाओं की सतह पर कई तरह के प्रोटीन होते हैं। वैक्सीन तकनीक का उपयोग करके शोधकर्ता मरीज की इम्यून सिस्टम को इन प्रोटीनों को पहचानने और उन पर हमला करने के लिए प्रशिक्षित कर सकते हैं, जिससे उनके खास कैंसर के खिलाफ मजबूत प्रतिक्रिया पैदा हो सकती है। इस तरीके के समर्थन में शुरुआती सबूत पहले से मौजूद हैं।

अमेरिका के डाना-फार्बर कैंसर इंस्टीट्यूट के शोधकर्ताओं ने हाल ही में किडनी कैंसर के एक प्रकार से पीड़ित नौ लोगों के लिए व्यक्तिगत वैक्सीन बनाई। उनके ट्यूमर सर्जरी से हटाने के बाद, मरीजों को वैक्सीन दी गई ताकि शरीर में बची हुई कैंसर कोशिकाएं खत्म हो जाएं। साल 2025 में प्रकाशित शोध में टीम ने बताया कि सभी नौ मरीजों में कैंसर के खिलाफ टारगेटेड इम्यून प्रतिक्रिया हुई और वे सर्जरी के बाद कई सालों तक कैंसर-मुक्त रहे। व्यक्तिगत वैक्सीन ने मेलेनोमा के इलाज में भी उम्मीद दिखाई है। यह एक नई और साहसिक दुनिया है। यह प्रिसिजन मेडिसिन की परिभाषा है। अब शायद बहुत तेजी से आपके खास ट्यूमर के खिलाफ वैक्सीन रणनीति विकसित कर सकते हैं। इस उत्साह के बावजूद, आगे का रास्ता लंबा है। इन तरीकों को साबित करने के लिए और शोध की जरूरत है, जहां डाक्टर मरीजों को उनके खास कैंसर के मुताबिक सही इलाज से सटीक तरीके से जोड़ सकें।

कई ऐसे लक्ष्य और नई दवाएं रही हैं जो शुरुआती क्लिनिकल ट्रायल से आगे नहीं बढ़ पाईं। यह संभव है कि कुछ मरीज किसी भी तरह की इम्यूनोथेरेपी से ठीक न हों। कैंसर की अलग-अलग विशेषताएं होती हैं जो उन्हें बढ़ने में मदद करती हैं, और कुछ के खिलाफ इम्यून सिस्टम बेहतर काम करता है, जबकि कुछ के खिलाफ नहीं। लेकिन जिन मरीजों पर यह असर करता है, उनके लिए इम्यूनोथेरेपी जीवन बचाने वाली और जीवन बदलने वाली साबित हो रही है।
स भाव्या सिंह