आर्टेमिस-II 50 साल बाद चांद की ओर

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पचास से अधिक साल बाद नासा का चंद्रमा को लेकर पहला मिशन शुरू हुआ। आर्टेमिस 2 मिशन के राकेट ने 1 अप्रैल, 2026 फ़्लोरिडा के केप कैनावेरल स्थित केनेडी स्पेस सेंटर से उड़ान भरी। 10 दिन के आर्टेमिस 2 मिशन में अंतरिक्षयात्री चांद की सतह पर नहीं उतरेंगे बल्कि इस योजना में चांद का चक्कर लगाते हुए पृथ्वी से उतनी दूर जाएंगे, जहां पर आज तक कोई नहीं गया है। इस मिशन में तीन अमेरिकी अंतरिक्षयात्री रीड वाइसमैन, क्रिस्टीन कोच, विक्टर ग्लोवर और कनाडाई अंतरिक्षयात्री जेरेमी हेनसेन शामिल हैं। अंतरिक्ष में मौजूद हमारे सबसे नज़दीकी पड़ोसी के चारों ओर उनकी यह यात्रा आगे चलकर चंद्रमा पर उतरने और आखिरकार वहां एक बेस बनाने का रास्ता तैयार करेगी।

चांद की ज़मीन देखने में भले ही सूखी, धूल भरी और बंजर लगती हो, लेकिन हक़ीक़त इससे बिल्कुल अलग है। चांद में वही तत्व मौजूद हैं जो हमें धरती पर मिलते हैं। मिसाल के तौर पर रेयर अर्थ एलिमेंट्स (दुर्लभ धातुएं), जो धरती पर बहुत कम पाए जाते हैं, चांद के कुछ हिस्सों में शायद इतनी मात्रा में मौजूद हों कि उन्हें निकाला जा सके। इनमें लोहे और टाइटेनियम जैसी धातुएं भी हैं, और हीलियम भी- जिसका इस्तेमाल सुपरकंडक्टर से लेकर मेडिकल उपकरणों तक, कई चीज़ों में होता है।
लेकिन जिस संसाधन ने सबसे ज्यादा ध्यान खींचा है, वह सबसे हैरान करने वाला भी है- पानी। चांद के कुछ खनिजों में पानी फंसा हुआ है, और ध्रुवों पर भी पानी की अच्छी ख़ासी मात्रा मौजूद है। वहां ऐसे गड्ढे हैं जो हमेशा छाया में रहते हैं, जहां बर्फ़ जमा हो सकती है। अगर आप चांद पर रहना चाहते हैं, तो पानी तक पहुंचना बेहद ज़रूरी है। यह न सिर्फ़ पीने के काम आता है, बल्कि इसे हाइड्रोजन और आक्सीजन में तोड़कर अंतरिक्ष यात्रियों के लिए सांस लेने की हवा तैयार की जा सकती है, और यहां तक कि अंतरिक्ष यानों के लिए ईंधन भी बनाया जा सकता है।

1960 और 1970 के दशक में अमेरिका के अपोलो मिशन सोवियत संघ के साथ अंतरिक्ष में वर्चस्व की दौड़ से प्रेरित थे। इस बार मुक़ाबले में चीन है। चीन अपने अंतरिक्ष कार्यक्रम में तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। वह चांद पर रोबोट और रोवर सफलतापूर्वक उतार चुका है, और उसका कहना है कि वह 2030 तक इंसानों को भी वहां पहुंचा देगा। चांद की धूल में सबसे पहले अपना झंडा गाड़ने का गौरव आज भी मायने रखता है। लेकिन अब यह और भी अहम हो गया है कि आप झंडा कहां गाड़ते हैं। अमेरिका और चीन, दोनों ही, उन इलाक़ों तक पहुंच चाहते हैं जहां संसाधन सबसे ज्यादा हैं, यानी चांद की सबसे क़ीमती ज़मीन पर क़ब्ज़ा जमाना।

संयुक्त राष्ट्र की 1967 की आउटर स्पेस संधि कहती है कि कोई भी देश चांद का मालिक नहीं बन सकता। लेकिन चांद पर जो कुछ पाया जाता है, उसके मामले में चीज़ें इतनी सीधी नहीं हैं। संयुक्त राष्ट्र की संधि के तहत आप ज़मीन के किसी टुकड़े के मालिक तो नहीं बन सकते, लेकिन असल में आप उस ज़मीन पर बिना किसी दख़ल के काम कर सकते हैं। तो इस वक्त सबसे बड़ी बात यही है कि आप अपनी ज़मीन का हिस्सा किसी तरह घेर लें। आप उसके मालिक नहीं बन सकते, लेकिन उसका इस्तेमाल कर सकते हैं। और एक बार अगर आप वहां पहुंच गए, तो जब तक चाहें, वह हिस्सा आपके पास ही रहता है। नासा की नज़र अब मंगल ग्रह पर टिकी है और वह 2030 के दशक तक इंसानों को वहां भेजना चाहता है। लेकिन उसे जिन तकनीकी चुनौतियों से पार पाना है, उन्हें देखते हुए यह समयसीमा काफ़ी महत्वाकांक्षी कही जा सकती है।

लेकिन कहीं न कहीं से शुरुआत तो करनी ही होती है, और अमेरिका ने तय किया है कि वह शुरुआत चांद से करेगा। चांद पर जाना और लंबे समय तक वहां रुकना, किसी दूसरे ग्रह पर रहने और काम करने के तरीक़े सीखने के लिए कहीं जज्यादा सुरक्षित, सस्ता और आसान परीक्षण स्थल है। चांद पर बनने वाले बेस पर नासा उन तकनीकों को बेहतर बना सकता है, जिनसे अंतरिक्ष यात्रियों को ज़रूरी हवा और पानी उपलब्ध कराया जा सके। उन्हें यह भी तय करना होगा कि ऊर्जा कैसे पैदा की जाए और ऐसे ठिकाने कैसे बनाए जाएं, जो इंसानों को बहुत ज्यादा तापमान के साथ साथ ख़तरनाक अंतरिक्ष विकिरण से भी बचा सकें। ये सारी ऐसी तकनीकें हैं कि अगर आप इन्हें पहली बार मंगल ग्रह पर आज़माएं और वहां कुछ ग़लत हो जाए, तो हालात बहुत विनाशकारी हो सकते हैं। इन्हें चांद पर आज़माना कहीं ज्यादा सुरक्षित और आसान है।

अपोलो मिशनों के दौरान धरती पर लाई गई चट्टानों ने हमारे इस खगोलीय पड़ोसी को लेकर हमारी समझ ही बदल दी थी। इन चट्टानों ने हमें बताया कि चांद एक बेहद नाटकीय घटना के बाद बना था, जब मंगल के आकार का एक पिंड धरती से टकराया तो उससे टूटे हिस्सों से चांद बना। हमें यह सब अपोलो मिशनों से लाई गई चट्टानों की वजह से पता चला। अभी बहुत कुछ खोजा जाना बाकी है। क्योंकि चांद कभी धरती का ही हिस्सा था, इसलिए उसमें हमारे ग्रह के 4.5 अरब साल के इतिहास का रिकार्ड मौजूद है। और टेक्टानिक प्लेट्स, हवा या बारिश जैसी कोई चीज़ न होने की वजह से, इस रिकार्ड को मिटाने वाला कुछ नहीं है। इसलिए चांद एक बेहतरीन टाइम कैप्सूल है। चांद धरती का एक शानदार संग्रहालय है। चांद के किसी और हिस्से से लाई गई चट्टानों का नया भंडार वाक़ई अद्भुत होगा।

अपोलो मिशनों से भेजी गई धब्बेदार, काली सफ़ेद तस्वीरों ने अंतरिक्ष के सपने को हक़ीक़त में बदल दिया था। और भले ही देखने वालों में से सिर्फ़ गिने-चुने लोग ही आगे चलकर ख़ुद अंतरिक्ष यात्री बन पाए, लेकिन बहुत से लोगों ने विज्ञान, तकनीक और इंजीनियरिंग के क्षेत्र में अपना करियर चुना। उम्मीद है कि आर्टेमिस मिशन, जिसे लाइव और 4के रेज्योल्यूशन में दिखाया जाएगा, वो एक नई पीढ़ी को प्रेरित करेगा।

हम तकनीक से भरी दुनिया में रहते हैं। हमें वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और गणितज्ञों की ज़रूरत है- और अंतरिक्ष में लोगों को इन विषयों के लिए उत्साहित करने की ज़बरदस्त ताक़त है। नए रोज़गार और फलती-फूलती अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था, अमेरिका को आर्टेमिस पर झोंके गए अरबों डालर वसूल करवाएंगे। इसके साथ ही, इन मिशनों के लिए विकसित की गई तकनीक से निकली चीज़ें भी धरती पर काम आ सकेंगी। चांद पर वापसी दुनिया को एक और बहुत ज़रूरी उम्मीद देगी। अगर हम सच में एकजुट होकर काम करें, तो हम इंसानियत के लिए बहुत फ़ायदेमंद काम कर सकते हैं। यह हमें दिखाएगा कि इंसान क्या क्या कर सकता है।

इस मिशन पर गए अंतरिक्ष यात्री कमांडर रीड वाइज़मैन ने कहा कि इस मिशन में शामिल ओरायन स्पेसक्राफ़्ट के चालक दल ने ऐसे नज़ारे देखे, जिन्हें आज तक किसी इंसान ने कभी नहीं देखा। वहीं एक और अंतरिक्ष यात्री पायलट विक्टर ग्लोवर ने कहा कि उन्होंने जो देखा, उसे बयान करने के लिए शब्द ही नहीं हैं। अपनी इस यात्रा के दौरान ये स्पेसक्राफ़्ट पृथ्वी से 2,52,756 मील (4,06,771 किलोमीटर) तक पहुंच गया। ये अंतरिक्ष में इंसानों की तय की गई अब तक की सबसे ज्यादा दूरी है।

चांद के पीछे पहुंचने के बाद अंतरिक्ष यात्रियों का नासा से संपर्क टूट गया था। संपर्क क़रीब 40 मिनट तक टूटा रहा। हालाँकि इसकी संभावना पहले ही जता दी गई थी। जब संपर्क दोबारा स्थापित हुआ तो मिशन विशेषज्ञ क्रिस्टीना कोच ने अंतरिक्षयान से सन्नाटा तोड़ते हुए कहा, पृथ्वी से फिर से आवाज़ सुनना बहुत शानदार है।

इस मून मिशन में शामिल अंतरिक्ष यात्री धरती पर शनिवार सुबह 10 अप्रैल 2026 को करीब साढ़े पांच बजे (भारतीय समयानुसार) लौटेंगे। अंतरिक्ष यात्री शुक्रवार को ईस्टर्न अमेरिकी टाइम के मुताबिक़ रात 8ः07 बजे ( भारतीय समय के मुताबिक़ शनिवार सुबह 5 बजकर 37 मिनट) धरती पर लौटेंगे। उनके अमेरिका के पश्चिमी तट के पास प्रशांत महासागर में स्प्लैशडाउन (गिरने) करने की उम्मीद है।
स भाव्या सिंह