अंततोगत्वा मध्य पूर्व में जारी युद्ध में जो युद्ध विराम पूरे विश्व के लोग चाहते थे, वह ईरान, इस्रायल संग अमेरिका के बीच 40 दिनों से जारी युद्ध पर विराम या अल्प विराम लगा। यद्यपि यह युद्ध विराम 15 दिनों के लिए ही घोषित किया गया है, पर पूरी दुनिया के लोगों ने राहत की सांस ली। इस युद्ध ने युद्ध में शामिल या ना शामिल लगभग सभी देशों के अपने-अपने अहंकार को चकनाचूर कर दिया। भले ही कोई उस बात को माने या ना माने, अमेरिका के अपने सर्वोच्च युद्ध शक्ति सम्पन्नता के अहंकार को ईरान जैसे छोटे से देश के लड़ाकों ने, उनके अजेय कहे जाने वाले एफ-35 बाम्बरों जैसे करोड़ों रूपयों के युद्धक विमानों को अपने गुलेल जैसे लाखों रूपयों के ड्रोन से ध्वस्त कर दिया। अमेरिका का नाटो जैसे संगठन के माध्यम से सर्वाधिक शक्ति सम्पन्न देशों के अगुआ होने का भी अहंकार टूट गया। वहीं ईरान के सत्ताधीशों के अपने अजेय होने के अहंकार और धार्मिक कट्टरता से दुष्प्रभावित होकर तैयार किए गए मिसाइलों तथा ड्रोनों के जखीरों से अजेय होने के अहंकार को भी तो अमेरिका और इस्राइल ने मिलकर चकनाचूर कर दिया। इस्राइल के अपने सर्वोच्च एयर डिफेंस सिस्टम साधे रखने के अहंकार को भी गहरा धक्का लगा, तो वहीं खाड़ी के तेल समृद्ध देशों को अपने तेल समृद्धि जनित अहंकार को भी इस युद्ध ने तोड़ दिया। पाकिस्तान जैसे आतंक पोषक दरिद्र देश का, मुस्लिम देशों को समेट कर चलने के राजनैतिक अहंकार को भी ध्वस्त किया। वस्तुतः जितने भी देश इस युद्ध में प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से शामिल थे, उनका अहंकार निश्चित रूप से टूटा है। पर दुर्भाग्य यह है कि कोई भी देश अपने अहंकार में इस अहंकार के विखंडन को स्वीकार नहीं कर रहा है।
अस्तु, इस लड़ाई के आरंभ होने के कारणों में जाने से यह समझ में आता है कि इतने आधुनिक युग में तमाम प्रकार के वैज्ञानिक एवं तकनीकी उत्थान के बावजूद आज भी मानव सभ्यता में बहुतायत लोग, क्या, और क्यों, पाषाण युगीन सोच में जी रहे हैं, जहां कबीलाई सोच में किसी एक कबीले के लोग दूसरे कबीले के लोगों के जीने के अधिकार को या उनके अस्तित्व को नकारते थे और नकार भी रहे हैं। फर्क यही है कि उस पाषाणयुग में कबीले के नेता पत्थरों की गुफाओं में रहकर पत्थरों के प्रहार से, या और लकड़ियों को जलाकर अग्नि के प्रहार से, मरने-मारने का आदेश देते थे, वहीं आज के ये कबीलाई नेता गगनचुंबी, वातानुकूलित, ध्वनि अवरोधित, प्रकाश पुंजित, नाना प्रकार के भवन सौंदर्य सामग्रियों से सुसज्जित, कम्प्यूटर, मोबाइल जैसे आधुनिकतम संचार प्रणालियों से युक्त होकर भी उसी पाषाण युगीन सोच से संक्रमित होकर, किसी विरूद्ध देश के अस्तित्व को पृथ्वी से समाप्त करने हेतु बमों से, राकेटों से, मिसाईलों से, ड्रोन से युद्ध करने का आदेश देते हैं, और युद्ध करते हैं। फर्क क्या है? हिंसक सोच में कोई परिवर्तन क्यों नहीं है? इन विनाशकारी अस्त्रों के प्रहार से जब पृथ्वी पर प्रलय आ जाने के हजारों वर्षों बाद, फिर कभी जब सभ्यता का अभ्युदय होगा, तो उस समय के आर्कियोलाजिस्ट, आज के इस सभ्यता के, तथाकथित समृद्ध सभ्यता के सारे प्रखर पुरूषों को उनकी दृष्टि में या मूर्ख मानेंगे या पागल करार देंगे या पूरी तरह अशिक्षित लिखेंगे? किस संज्ञा को विशेषण के रूप से संबोधित किया जावेगा, यह कार्य पाठकों पर छोड़ना उचित होगा। किन्तु, क्या यह सत्य नहीं है कि इस पृथ्वी पर अमर तो कोई नहीं है, सिवाय उस परम सत्ता के, जिसे हम ईश्वर, अल्लाह, गाड या अन्य किसी भी नाम से जानते हैं। जब इस पृथ्वी से सभी मनुष्यों का मरना एकदम तय है, चाहे वह सर्वोच्च शक्तिशाली अमेरिका का राष्ट्रपति हो या किसी दरिद्र अफ्रीकी देश का या ईरान का या ईस्राइल का या अरब देश का या भारत का या चीन का या रूस का या यूक्रेन का सर्वोच्च सत्ताधीश हो या एकदम साधारण नागरिक। तो, फिर इस प्रकार से लड़े जाने वाले युद्धों से अमरत्व किसे प्राप्त हो सकता है? निश्चित रूप से नहीं! तो फिर भी युद्ध क्यों छिड़ते हैं? तो ऐसा स्पष्ट होता है कि वर्तमान सभ्यता आज भी सह अस्तित्व के सिद्धांत को सर्वमान्य कर स्वीकार करने को तत्पर नहीं है। आज की सभ्यता में भी बहुत सारे लोग उसी पाषाण युगीन मानसिकता को पाल कर चल रहे हैं, जिसमें किसी अन्य देश की सभ्यता एवं संस्कृति का समूल नाश ही लक्ष्य होता था। कितनी बड़ी विडम्बना है कि पिछले 150 वर्षों में मानव सभ्यता द्वारा की गई वैज्ञानिक, तकनीकी प्रगति भी उस पाषाणीय सोच को समाप्त नहीं कर पाई। आज भी बहुत सारे देश और दुनिया का विशाल जन समूह कुछ देशों के अस्तित्व को नकारता है। उनके पृथ्वी पर जीने और बसने के अधिकार को नकारता है। और उनके अस्तित्व को समाप्त करने के लिए सदा संघर्षरत रहता है। ईश्वर के नाम पर सैकड़ों वर्षों पूर्व दिए गए संदेश को आधार मानकर सदा युद्ध करने के लिए तत्पर रहता है। रात-दिन ऐसे ही लक्ष्यों को पोषण करने को प्रयासरत रहता है। जबकि अगर सत्य यह है कि ईश्वर अमर है, अल्लाह अमर है, गाड अमर है और ये सब एक ही शक्ति के भाषायी पर्याय हैं, तो ईश्वर आज भी है, अभी भी है और वह सदैव संवाद करने को समक्ष है, सक्षम है, प्रस्तुत है, पर समस्या यह है कि उस परमात्मा की कृति जो साक्षात प्रकृति है, पर्यावरण है और जीव-जंतु, वनस्पति है, जो उसके साक्षात स्वरूप हैं, हम उसे अपना दास समझते हैं। उनका नाश कर अपने को विजयी बनाने की मूर्खता करते हैं, उनसे संवाद करने का साहस नहीं करते। प्रकृति से वार्तालाप करने से कतराते हैं। यह कभी चिंतन नहीं करते कि मनुष्य को छोड़कर इस पृथ्वी पर और इस अखंड ब्रह्मांड में कोई भी अन्य जीव-जंतु, वनस्पति किसी भी लिपिबद्ध भाषा का या अंक जनित गणित का उपयोग नहीं करती। फिर भी उनका अस्तित्व यथावत है, सुखद है। कोई खतरा उन्हें भी है तो केवल मनुष्यों से ही है, प्रकृति से नहीं।
आज मनुष्य की यांत्रिक विकास की भूख ने कितने लाखों जीव-जंतुओं की प्रजातियों को विलुप्त कर दिया। अपने शारीरिक क्षणिक सुख के लिए ऊर्जा का इतना विशाल उपभोग आरंभ कर दिया कि ऊर्जा समृद्धि के लिए युद्ध होने लगे। अपने राजनैतिक और आर्थिक कु-स्वार्थों के पोषण के लिए जनसंख्या में इतना विस्फोट कर लिया कि पृथ्वी इनके पापों के बोझ को बर्दाश्त नहीं कर पा रही है।
आज जब सबको मालूम है कि पृथ्वी पर प्रलयंकारी मौसम परिवर्तन का संकट जारी है, जिसमें 1-1 ग्राम कार्बन उत्सर्जन को रोकना मानव सभ्यता के अस्तित्व के लिए जरूरी है। वहीं इस युद्ध में 40 दिनों में लगभग 14 मिलियन टन कार्बन का उत्सर्जन हो गया बताया जाता है (पर वास्तव में तो यह 40 मिलियन टन से भी अधिक ही होगा)। इतने कार्बन उत्सर्जन से लगभग 264 पेटा जूल (0.264 एक्सा जूल) तापीय ऊर्जा का उत्सर्जन वातावरण में हो गया होगा। इसके कितने घातक परिणाम पूरे विश्व को झेलना होगा? इसकी भरपाई कौन करेगा? इसके कारण पृथ्वी के वायुमंडल के तापमान में वृद्धि का दंड या दुख या विनाश का भोग कौन भोगेगा? क्या यह इस्राइल, अमेरिका, ईरान या खाड़ी देशों तक ही सीमित रहेगा? इस 14 मिलियन टन कार्बन डाई आक्साइड को अवशोषित करने हेतु कम से कम 7 बिलियन यूएस डालर की आवश्यकता होगी, उसकी भरपाई कौन करेगा? इस युद्ध की लागत पर चिंतन करें तो यह पता लगता है कि अमेरिका पर लगभग 34 बिलियन यूएस डालर, इस्राइल पर 1.35 बिलियन यूएस डालर, ईरान द्वारा युद्ध सामग्री व्यय पर 2.3 बिलियन यूएस डालर खर्च हुआ है। इस अनावश्यक व्यय के स्थान पर अमेरिका को जब विश्व के मौसम परिवर्तन को रोकने के लिए खर्च करने के लिए कहा जाता है तो वह उससे पल्ला झाड़ लेता है। जबकि यह स्पष्ट है कि मौसम परिवर्तन साक्षात है और पृथ्वी के पर्यावरण को घुन या दीमक की तरह धीरे-धीरे जीवन के लिए उपयुक्तता को खत्म कर रहा है।
अमेरिका प्रतिदिन अपने युद्ध व्यापार में हो रहे हानि का विवरण दे रहा था, तो वहीं दुनिया के बाकी देश भी अपने-अपने ऊर्जा मूल्यों में हो रही बढ़ोत्तरी के नुकसान का हिसाब बना कर रोना रो रहे थे। पर इस हिसाब का जिम्मा किसका है कि इस युद्ध ने प्रकृति, पर्यावरण तथा शेष मानव, जीव, जंतुओं का कितना नुकसान पहुॅचाया है। इसकी भरपाई किससे हो? हजारों लोगों की अकाल मृत्यु हुई है। हजारों लोग बेघर-बार हुए हैं। हजारों लोग बेरोजगार हुए हैं। हजारों लोग स्वस्थ जीवन के लिए आवश्यक स्वस्थ पर्यावरण एवं पानी से वंचित हुए हैं। क्या वह प्रकृति पुरूष इस प्रकार के कुकृत्यों के लिए कभी इस प्रकार के युद्धों को सृजन करने के अपराधियों को क्षमा करेगा? कदाचित नहीं। अस्तु, आवश्यकता यह है कि इस पाषाणयुगीन सोच से वर्तमान सभ्यता को मुक्त करने हेतु सह-अस्तित्व के भारतीय संस्कृति के सूत्र को सर्वत्र व्यापक करें। वसुधैव कुटुम्बकम के भारतीय मनीषियों के मंत्र को मन-मन में गुनगुनाने की जगह विश्वव्यापी करें। प्रकृति पुरूष की प्रकट प्रकृति से प्राकृत्य भाषा, प्रेम, परस्पर सहयोग को प्रफुल्लित करें। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि इस मानव सभ्यता को लिपिबद्ध किताबी संकीर्णताओं की सोच से मुक्त कर, आर्थिक समृद्धि के व्यसन से मुक्त कर पूरे विश्व के हित के लिए पुनः शुद्ध, शीतल, निर्मल, प्रफुल्लित प्रकृति एवं पर्यावरण की पुनर्स्थापना के प्रयास के लिए प्रेरणा दें।
इस क्रांतिक समय में भारत के लिए तथा भारतवासियों के लिए तो अपनी सम्पूर्ण ऊर्जा आत्मनिर्भरता प्राप्त करना सर्वोच्च लक्ष्य होना चाहिए। 2025-26 में में भारत की कुल ऊर्जा मांग में विद्युत ऊर्जा 1.69 करोड़ मेगावाट थी, जो कि वर्तमान में निश्चित रूप से अधिक बढ़ चुकी होगी, जिसकी पूर्ति पूरी तरह स्वदेशी स्रोतों से हो रही है। पर पेट्रोलियम प्रोडक्ट के रूप में हमारी निर्भरता अभी भी आयातित तेल, सीएनजी गैस तथा एलपीजी पर है। हमें इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए चौतरफा कदम बढ़ाना आवश्यक है। पेट्रोल, डीजल के स्थान पर इलेक्ट्रिक वाहनों का अधिकाधिक उपयोग हो, तो एथेनाल और बायो सीएनजी के उत्पादन में वृद्धि भी एक महत्वपूर्ण कदम है। इस क्रांतिक समय में भारत वासियों के लिए एक प्रसन्नता का समाचार है कि थोरियम आधारित कलपक्कम ब्रीडर रिएक्टर अपने क्रांतिक अवस्था में पहुॅंच गया है, जो भारत को आगामी 700 वर्षों या और अधिक समय तक स्वच्छ ऊर्जा उपलब्ध करा सकेगा।
-संपादक
