हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी 05 जून को विश्व पर्यावरण दिवस का आयोजन विश्व के सभी देशों में भिन्न-भिन्न स्थानों पर मनाया जावेगा। इस वर्ष विश्व पर्यावरण दिवस का थीम ‘‘क्लाईमेट एक्शन’’ (जलवायु परिवर्तन पर कार्यवाही) है। जैसे ही विश्व पर्यावरण दिवस करीब आता है, तो पर्यावरण के प्रति अपने को आस्थावान दिखाने वाले हजारों-लाखों लोग, पर्यावरण संरक्षण की पगड़ी पहनकर सक्रिय हो जाते हैं। सारे लोग धारणीय विकास की अवधारणा को धारण कर पूरी धरा को प्रदूषण मुक्त, हरा-भरा करने का संकल्प धारण करने लगते हैं। किन्तु कहीं भी, कोई भी इस बात की चिंता नहीं करता कि पृथ्वी की वर्तमान में पर्यावरण क्षतिकारी अर्थव्यवस्था के कारण जो पर्यावरणीय क्षति उत्पन्न हो चुकी है और हो रही है, और होने वाली है, क्या उसे धारण करने की क्षमता पृथ्वी की है या नहीं है। कोई इस बात पर चिंता नहीं करता कि पृथ्वी में वर्तमान 830 करोड़ लोगों की जनसंख्या द्वारा किए जा रहे उपभोग के बोझ को धारण करने की क्षमता पृथ्वी के पर्यावरण पर है या नहीं? कोई इस बात पर भी गंभीरतापूर्वक बहस नहीं करता कि वर्तमान आर्थिक समृद्धि के द्वारा जनित उपभोग से उत्पन्न प्रदूषण भार को धारण करने की क्षमता पृथ्वी के वर्तमान पर्यावरणीय संसाधनों की है या नहीं? अति सम्पन्न लोगों एवं अति विपन्न लोगों के बीच व्याप्त उपभोग के भयावह अंतर को पाटने के लिए क्या कोई धारणीय मार्ग है? आर्थिक सम्पन्नता की शक्ति से जनित अत्यधिक उपभोग से उत्पन्न पर्यावरण पर जारी प्रतिघात का कोई विकल्प है या नहीं है? आज की स्थिति में अमेरिका के 1 प्रतिशत लोग ही अमेरिका के शेष 50 प्रतिशत गरीब लोगों की तुलना में करीब 25 गुना ज्यादा कार्बन उत्सर्जन करते हैं। और यह असंतुलन सारे विश्व में सभी देशों में है।
कहने का आशय यह है कि धारणीय विकास की अवधारणा की बात करने वाले ज्यादातर लोगों में इस धारणीय और अधारणीय विकास के सही स्वरूप को धारण करने के सोच का गंभीर अभाव है। फलस्वरूप, प्रत्येक वर्ष विश्व पर्यावरण दिवस भी या तो कहीं एक उत्सव के रूप में मनाया जाता है या कहीं पर अपने दुष्कृत्यों के दुष्प्रभावों में एक विलाप के रूप में मनाया जाता है। आज पृथ्वी पर पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी की इतनी गंभीर दुर्गति हो चुकी है कि इस पर एक दिन की बहस या कुछ घंटों की बहस से कोई समाधान संभव ही नहीं है। वर्तमान मानव सभ्यता उस क्रांतिक किनारे पर पहुॅंच चुकी है, जहां पर पृथ्वी पर उस सम्पूर्ण जीव सभ्यता के विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है। इस सबके बावजूद भी अर्थ समृद्धि के भ्रम में तकनीकी शीर्षता के अहंकार में मनुष्य अपनी पर्यावरणीय अहितकारी दुष्कृत्यों को दूर करने के लिए तत्पर नहीं है।
इस पर्यावरण दिवस के ध्येय सूत्र के अनुसार पृथ्वी पर पनप रहे जलवायु परिवर्तन को टालने के लिए सम्यक-सार्थक कार्यवाही तत्काल करना जरूरी है। पर यह कैसे हो? क्या केवल मोमबत्तियां जला देने से मृतक की आत्मा को शांति पहुॅंचती है या विश्व युद्ध या गृह युद्ध रूक जाते हैं? या ये केवल एक सामाजिक या राजनैतिक ठकोसले ही होते हैं? साक्षात और समक्ष दुष्परिणामों के बावजूद पूरी दुनिया के सर्वशक्तिमान देश आज तक रूस-यूक्रेन के मध्य जारी युद्ध के दीर्घकालीन पर्यावरणीय दुष्प्रभावों पर कोई श्वेत पत्र प्रकाशित नहीं किए हैं? गाजा और इस्रायल के बीच जारी युद्ध के लिए भी यही बात लागू होती है तो ईरान और अमेरिका संग इस्रायल तथा अरब देशों के मध्य चल रहे युद्धवत परिस्थितियों के लिए भी यही बात लागू होती है। पर कहॉं कोई देश या राजनेता या पर्यावरणविद या संयुक्त राष्ट्र संघ ही इन सभी युद्धों के कारण उत्सर्जित हो रहे अरबों टन कार्बन उत्सर्जन से उत्पन्न होने वाले जलवायु परिवर्तन से संभावित विप्लव या जल प्रलय के लिए कोई चेतावनी क्यों नहीं देते?
इस युग का सबसे बड़ा अभिशाप ही यही है कि पृथ्वी पर विकसित सभ्यताओं द्वारा संचालित अर्थव्यवस्था के द्वारा प्रकृति एवं पर्यावरण के उन सभी निःशुल्क (मुफ्त) संसाधनों को अपने कब्जे में ले लिया है, जो आम मनुष्य तथा अन्य जीव-जंतु, वनस्पतियों का, प्रकृति के द्वारा प्रदत्त स्वास्थ्य और सुरक्षित पर्यावरण प्रदत्त करते थे। स्वच्छ जल, स्वच्छ वायु, कोलाहल मुक्त वातावरण, शीतल परिवेश, शुद्ध भोजन जो सभी प्राणीमात्र के लिए सर्वत्र सुलभ थे, आज वह ऐश्वर्यमय जीवन का या आर्थिक समृद्धि का प्रतीक बन गया है। मनुष्य तकनीकी तिलस्म के मायाजाल में अपने को उलझाकर इस प्रकार से फंस गया है कि उससे मुक्त होने का कोई सहज मार्ग उसे दिखाई नहीं देता। पढ़े-लिखे लोग इस भ्रम में जीते हैं कि प्रकृति – पर्यावरण का संरक्षण केवल कानूनों से संभव है और वह सरकार का काम है। अदालतों का ऐसा विश्वास पता नहीं क्यों है कि उनके द्वारा दंडारोपण से ही प्रकृति तथा पर्यावरण सुरक्षित हो सकता है। समाज के सुधी लोग, पर्यावरणविद भी इस बेकार की कानूनी बहस में उलझे रहते हैं कि इस दुर्दशा के लिए जो जिम्मेदार हैं, उसे दंडित करके ही स्थिति को सुधार सकते हैं। पर गंभीरतापूर्वक चिंतन करने से यह समझ में आता है कि हम सभी जिम्मेदार हैं। जिस प्रकार से एक वृत्त में बैठे अनेकों सांपों में से एक सांप अपने सामने वाले सांप की दुम को मुॅंह में दबा रखा है, तो उसके सामने वाले की दुम को पीछे वाले सांप ने दबा रखा है। इस प्रकार से वृत्त में बैठे सभी सांपों के दुम पीछे के सांप के द्वारा दबे हुए हैं। आशय यह है कि प्रदूषण रोकने या पर्यावरण संरक्षण के लिए कानून यदि कारखाना बंदी का आदेश देता है तो कारखाने बंद होते हैं, तो इससे बेरोजगारी पनपती है। बेरोजगारी आती है तो जनतंत्र पर संकट आता है, जनप्रतिनिधि का दबाव कानून पर आता है और यह भ्रम चक्र घूमता रहता है, स्थिति यथावत बनी रहती है। तदैव मुक्ति का एकमात्र मार्ग सामाजिक चेतना के द्वारा जनसंख्या नियंत्रण, ऊर्जा संरक्षण, उपभोग नियंत्रण, सादा जीवन, संयमित जीवन के द्वारा ही ज्यादा सफल और सहज प्रतीत होता है। इस हेतु सादगीपूर्ण जीवन के द्वारा जीवन के आर्थिक लागत को भी कम करना आवश्यक है। कानून अपना काम कर रहा है ओर करेगा, विधायिका अपना काम कर रही है और करेगी, हमें अपने सामाजिक जन-जागृति के द्वारा स्वच्छ जीवन, धारणीय विकास के मार्ग को प्रशस्त करने हेतु धारणीय जीवन के मूल्यों को धारण करने हेतु समाज को प्रेरित करना होगा।
आगामी विश्व पर्यावरण दिवस पर अनेकों-अनेक आयोजन किए जावेंगे। विज्ञान एवं तकनीकी के माध्यम से हरितकारी गैसों के उत्सर्जन को कम करने के उपाय भी बताए जावेंगे। वहीं बाजार में कार्बन कैप्चर एवं उसके उपयोग पर भी बहस होगी। निश्चित रूप से ये सारे कृत्य स्वागतयोग्य हैं, पर एक बात जो सदा से छूट जाती है, और वह फिर छूट जाएगी कि वर्तमान आधुनिक युग में वैज्ञानिक तकनीकी के माध्यम से प्रकृति संरक्षण के स्थान पर उपभोग मुक्त संस्कृति और सादे जीवन के माध्यम से प्रकृति एवं पर्यावरण संरक्षण के प्रयासों को लागू करने हेतु सामाजिक जागृति, शिक्षण, प्रशिक्षण एवं संस्कारण के मार्ग में आने वाले अवरोधों को कैसे दूर किया जा सकता है?
भारतवर्ष एक प्रकृति द्वारा शुभाशीष प्राप्त देश है, जहॉं उपलब्ध ऋतुओं और मौसमों के द्वारा तथा सूर्य के प्रकाश, पवन के वेग तथा सामुद्रिक लहरों की शक्ति के साथ, कृषि एवं नगरीय अपशिष्ठों से हम पर्याप्त नवीनीकृत ऊर्जा उत्पन्न कर हम अपने देश को ऊर्जा आत्मनिर्भर देश बना सकते हैं। आज के इस आधुनिक युग में कृत्रिम मेधा (।तजपपिबपंस पदजमससपहमदबम) के बढ़ते प्रयोग से भी देश में और विदेश में ऊर्जा की मांग में भारी वृद्धि हो रही है। इसलिए विश्व शांति के अग्रदूत तथा भारत को विश्वगुरू की भूमिका में बने रहने के लिए भी सम्पूर्ण ऊर्जा आत्मनिर्भरता जरूरी है। इस दिशा में प्रत्येक भारतीय नागरिक के द्वारा ऊर्जा संरक्षण के समस्त प्रयास किए जाने चाहिए। सामग्री उपभोग को न्यूनतम करते हुए, अपशिष्ठ उत्पत्ति को कम से कम करते हुए, पुनःचक्रण के सभी प्रयासों को पुरजोर समर्थन देने का प्रयास करना चाहिए।
यह एक सुखद संयोग है कि भारतवर्ष में विद्युत वाहनों का बहुत तेजी से प्रसार हो रहा है, जिससे निजी यात्री वाहनों के संचालन में उपभोग होने वाले आयातित ईंधन में अवश्य भारी बचत होगी। शासन द्वारा 85 प्रतिशत एथेनाल या 100 प्रतिशत एथेनाल से चलने वाले इंजनों के निर्माण पर भी भारी समर्थन दिया जाने वाला है। फलस्वरूप भारत का ऊर्जा आत्मनिर्भरता का मार्ग शीघ्र ही सिद्ध होगा। इसे कार्बन उदासीन और धारणीय स्तर तक बनाए रखने के लिए जन-जागृति जरूरी है। जिसमें रसोई गैस की खपत कम करने से लेकर घर-घर में सौर ऊर्जा के उत्पादन में उपयोग भी शामिल है। आईए! हम भारत को विश्व का सर्वाधिक धारणीय ऊर्जा आत्मनिर्भर देश बनाने के संकल्प को सिद्ध करने में अपना पूरा-पूरा सहयोग दें। सभी सुधी पाठकों को आगामी ‘‘विश्व पर्यावरण दिवस’’ (05 जून 2026) के लिए अग्रिम शुभकामनाएं।
-संपादक
