राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस व रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता

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भारतीय परमाणु ऊर्जा आयोग की स्थापना 3 अगस्त 1948 को महान वैज्ञानिक डा. होमी जहांगीर भाभा की अथ्यक्षता में की गई। भारत सरकार द्वारा पारित एक प्रस्ताव ने बाद में 1 मार्च 1954 को ‘‘भारत के परमाणु ऊर्जा आयोग“ द्वारा परमाणु ऊर्जा विभाग के तहत डा. होमी जहांगीर भाभा के साथ सचिव के पद पर की गई 1954 में, भारत केमहान परमाणु वैज्ञानिक डा. होमी जहांगीर भाभा के नेतृत्व में परमाणु ऊर्जा प्रतिष्ठान, ट्राम्बे की स्थापना भारत के पूर्व प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल लाल नेहरू ने किया, जो द्वितीय विश्व युद्ध की शुरुआत से ठीक पहले था।
एईईटी, जिसे बाद में इसके संस्थापक निदेशक डॉ. होमी भाभा के नाम पर भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (बीएआरसी) का नाम दिया गया था, इसे मुख्य रूप से एक अनुसंधान केंद्र के रूप में स्थापित किया गया था, जिसमें परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग हेतु पावर रिएक्टरों से बिजली पैदा करना व जनहित के लिए रिसर्च रिएक्टरों से रेडियो आइसोटोप विकसित करना व पावर रिएक्टरों के विकास के लिए शोध करना है।
परमाणु ऊर्जा 1957 में भारत के संसद में भारत के पहले प्रधान मंत्री पं जवाहरलाल नेहरु ने कहा था कि, भारत में प्राकृतिक यूरेनियम की बड़ी आपूर्ति का अभाव है, और इसलिए लंबी अवधि में अपनी स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए परमाणु ऊर्जा एक वैकल्पिक उर्जा की आवश्यकता है। भाभा की योजना को साकार करने की दिशा में पहला कदम था अप्सरा अनुसंधान रिएक्टर का निर्माण जिसे भारत व यूनाइटेड किंगडम की सहायता से सन 1956 में अप्सरा रिएक्टर क्रांतिक यानी चालु हो गया व यूनाइटेड किंगडम द्वारा आवश्यक ईंधन यूरेनियम की आपूर्ति की गई। यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि यह स्वमिंग पुल रिएक्टर है जिसके उपर से सभी नाभिकीय अभिक्रिया दिखाई देता है व इसके द्वारा न्यूट्रॉन रेडियोग्राफी किया जाता है।
अप्सरा रिएक्टर के पूरा होने से पहले, साइरस रिएक्टर के निर्माण की योजनाएँ तैयार की गईं। कनाडा के सहयोग से भारत के मुंबई स्थित भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र में सन 1955 में साइरस (ब्प्त्न्ै ) रिएक्टर के निर्माण कार्य प्रारंभ हुआ इसमें ईंधन व भारी पानी की आपूर्ति में यू.एस. की भागीदारी आई। बाद में भारत में ही रिएक्टर के लिए भारी पानी ड्यूटोरियम, फरवरी 1982 में भारी पानी बोर्ड, परमाणु ऊर्जा विभाग द्वारा बनाए जाने लगा।
रेडियो आइसोटोप विकसित करने के अनुसंधान रिएक्टरों की जरूरत होती है जिसमें विखंडित कृत्रिम तत्व जैसे प्त.192,ब्व-60,ज्ब-199, भ्-3,ज्स-70,ब्े-137,।उ-239, आदि रेडियो आइसोटोप बनाया जाता हे जिससे गामा या अल्फा किरणें निकलती है, गामा किरणों के प्रभाव से कैंसर के सेल को खत्म किया जाता है व इन किरणों के प्रभाव से फसल की पैदावार को बढ़ना व खाद्य पदार्थों को बहुत दिनों तक सुरक्षित रखना इसके अलावा वेल्डिंग त्रुटि को पहचान हेतु औधौगिक रेडियोग्राफी में बहुतायत में उपयोग किया जाता है। जैसे गामा-किरणों के विकिरण में आइसोटोप से उत्सर्जित ऊर्जा कृत्रिम रूप से उत्पादित आइसोटोप में से कुछ सामान्य आइसोटोप ब्व-60, प्त-192, ब्े-137, ैम-75,ल्इ-169,ज्स-70 का गामा रेडियोग्राफी के क्षेत्र में उपयोग होता हैं। लेकिन सभी जगह रेडियोग्राफी में इरीडियम 192 या कोबाल्ट-60 का ही उपयोग होता हैं। अन्य रेडियो आइसोटोप की ऊर्जा बहुत अधिक होती है रेडिएशन डोजो के कारण उनका उपयोग नहीं होता है। ये सब गामा एमिटर हैं।
यहां एक ध्यान देने वाली बात है इरीडियम का हाफ लाइफ 74 दिन होता है जबकि कोबाल्ट.60 का 5.2 साल (ईयर) है लेकिन प्त-192 की ऊर्जा कोबाल्ट -60 से काफी कम होता है अतः उसका रेडियोग्राफी इमेज काफी साफ होता है लेकिन 74दिन में ही सोर्स घटकर आधा ही जाता है अतः इंडस्ट्रीयल रेडियोग्राफी हेतु कोबाल्ट 60 का उपयोग बहुतायत में वेल्ड के कंट्रोल कंट्रोल के लिए किया जाता है। अल्फा एमिटर का उपयोग पेसमेकर, सैटेलाइट बैटरी, व स्मोक डिटेक्टर में किया जाता है।
बहुत से परमाणु विकसित देशों ने 24 सितंबर 1996 को सीटीबीटी यानी कांप्रेहेन्सिव टेस्ट बैन ट्रीटी नामक एक समझौता लागू किया गया जिसके जरिए परमाणु परीक्षणों करने के लिए प्रतिबंधित लागू किया गया है यह संधि अस्तित्व उस समय अस्तित्व में आई जब भारत परमाणु परीक्षण के लिए पुरी तरह से तैयार हो गया था।
उस समय इस पर 71 देशों ने हस्ताक्षर किया था। अब तक इस पर 189 देशों ने हस्ताक्षर कर दिए हैं। भारत और पाकिस्तान ने सीटीबीटी पर अब तक हस्ताक्षर नहीं किया है। इसके तहत परमाणु परीक्षणों को प्रतिबंधित करने के साथ यह प्रावधान भी किया गया है कि न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप (छैळ) उसी को नाभिकीय ईंधन की आपूर्ति परमाणु बिजली के लिए करेगा जिसने सीटीबीटी पर हस्ताक्षर की होगी एनएसजी दरअसल बहुत से देशों का एक समूह है। जो नाभिकीय ऊर्जा बिजली पैदा करने के लिए देता है वह परमाणु निरस्त्रीकरण के लिये हो यानि इससे कोई परमाणु अस्त्र न बना पाए जिसकी निगरानी आईएईए करता है।
इस कार्य के लिये यह समूह नाभिकीय शस्त्र बनाने योग्य सामग्री के निर्यात को सीटीबीटी पर हस्ताक्षर कराकर परमाणु परीक्षण के लिए प्रतिबंधित करती है। इसका वास्तविक लक्ष्य यह है कि जिन देशों के पास नाभिकीय अस्त्र नहीं है, वे इसे अर्जित न कर सकें। यह समूह ऐसे परमाणु उपकरण, सामग्री और तकनीक के निर्यात पर रोक लगाता है जिसका प्रयोग परमाणु शस्त्र बनाने में होना है और इस प्रकार यह परमाणु प्रसार को रोकता भी है ।
1995 तक भारत परमाणु परीक्षण को लेकर इसे पुनः परीक्षण के लिए भारत के मशहूर वैज्ञानिक डॉ. एपीजे कलाम व डॉ. आर चितंबरम इसे कई बार उस समय के सरकार के पास जाकर उन्हें जानकारी दी थी लेकिन सीटीबीटी व अमेरिका व अन्य देशों के डर के कारण रोक दिया गया था। जब 1998 में स्व. पूर्व प्रधानमंत्री अटल जी की सरकार आई तो इसका नेतृत्व करते महान भारतीय वैज्ञानिक एपीजे अब्दुल कलाम को पूरी छूट दी। उन्होंने कहा आप सभी वैज्ञानिक जब चाहें तब करें मुझे ऐ मत बताइए कब करना है। उन्होंने साफ कहा कि पार्टी रहे या नहीं रहे इसकी चिंता नहीं है देश सर्वोपरि है। अतः आप जैसे चाहे वैसे करें देश की रक्षा सर्वोपरि है। इसके लिए देश के पास परमाणु अस्त्र जरुरी है। इसकी भनक अमेरिका को लगी इसके लिए अमेरिका ने नासा में उस समय डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम को बुलाया और निदेशक पद का आफर दिया स्व डॉ. कलाम सर ने उन्हें मना तो नहीं किया लेकिन यह मामला फंस गया। बने या न बने उन्होंने इसलिए ऐसा किया क्योंकि वो जानते थे मेरे लिए देश सर्वोपरि है, और मैं अकेला हूं, अतः वो वहां जाकर ऐ जान गए कि भारत के परमाणु परीक्षण को लेकर अमेरिका ने सैटेलाइट लगा दिया है। अतः भारत आने के बाद उन्होंने इस कार्यक्रम की रुपरेखा तैयार की। उन्होंने परमाणु परीक्षण से जुड़े सभी वैज्ञानिकों को बताया कि यहां सैन्य अभ्यास की तैयारी कर उस मिशन को पूरा करने की कोशिश की जाए।
पूर्व प्रधान मंत्री स्व. अटलजी ने देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए बहुत बड़ा कदम 11मई 1998 में बिना किसी के डर के देश के महान वैज्ञानिक व पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए पी जे के बाद एक पांच परमाणु परीक्षण कर दिया और सारे देश में खुशी की लहर दौड़ गई और पूरा विश्व दंग रह गया। स्व. पूर्व प्रधानमंत्री अटलजी ने इस अवसर पर 11मई को हर साल नेशनल टेक्नोलाजी डे का ऐलान भी किया और जय जवान, जय किसान के साथ जय विज्ञान का नारा भी दे दिया। जिससे देश आत्मनिर्भर व प्रौद्योगिकी के विकास के लिए दूसरे देश को निर्भर नहीं रहेगा, जिससे देश के विज्ञान में आगे रहेगा व अर्थव्यवस्था में सुधार होगा।
संजय गोस्वामी
यमुना जी 13, अणुशक्ति नगर, मुम्बई