ईंटों से बने बहुमंज़िला घर, एक जैसी गलियां, जल निकासी की बेहतरीन व्यवस्था और फ़्लशिंग टायलेट्स। यह आपको किसी आधुनिक शहर की निशानियां लग रही होंगी, लेकिन असल में यह हज़ारों साल पहले की सिंधु घाटी सभ्यता की पहचान है। इसके बारे में कहा जाता है कि यह उसी दौर में थी, जब प्राचीन मिस्र की सभ्यता अपने उत्कर्ष पर थी। लेकिन सिंधु घाटी सभ्यता के बारे में हम प्राचीन मिस्र की तुलना में बहुत कम जानते हैं। कई विशेषज्ञों का मानना है कि यह समाज (सिंधु घाटी सभ्यता) उस समय दुनिया में मौजूद कई दूसरे समाजों से बेहतर था और उसका रहन-सहन व आधुनिकता इसे दूसरी सभ्यताओं से अलग करती थी।
सिंधु घाटी सभ्यता के बारे में कहा जाता है कि इसके विकास का दौर 2600 से 1900 ईसा पूर्व तक फैला हुआ था। यूनिवर्सिटी आफ़ आक्सफ़ोर्ड और यूनिवर्सिटी कालेज लंदन के लेक्चरर डाक्टर संगारालिंगम रमेश कहते हैं कि चार हज़ार ईसा पूर्व से पहले भी इस सभ्यता का अस्तित्व था। इसका केंद्र सिंधु नदी के आस-पास का वह क्षेत्र था जो अब पाकिस्तान और भारत में बंटा हुआ है। इसमें ग्रामीण किसान समुदायों के साथ-साथ 1400 से ज्यादा क़स्बे और शहर शामिल थे। यहां सबसे बड़ा इलाक़ा हड़प्पा और मोहनजोदड़ो का था। सिंधु घाटी सभ्यता प्राचीन मिस्र और प्राचीन मेसोपोटामिया (आज का इराक़) की सभ्यताओं से बहुत बड़ी थी। 80 हज़ार बस्तियों वाली इस सभ्यता में लगभग दस लाख लोग रहते थे। कई वजहों से सिंधु घाटी सभ्यता को बहुत विकसित माना जाता था।
आधुनिक टाउन प्लानिंग
सिंधु घाटी सभ्यता की गिनती उन सबसे शुरुआती बस्तियों में होती है जहां ईंटों से घर बनाने का सिलसिला शुरू था। यहां के लोग घर बनाने के लिए एक ही साइज़ की ईंटों का इस्तेमाल करते थे। यहां शहरों को एक जैसी गलियों और नब्बे डिग्री के ऐंगल पर बनाया गया था। यहां कुएं भी थे, घरों में शौचालय (बाथरूम) थे और एक बेहतरीन सीवेज सिस्टम भी मौजूद था। बाथरूम की निर्माण शैली और सीवेज सिस्टम से पता चलता है कि यह सभ्यता गंदे पानी से होने वाली बीमारियों को लेकर जागरूक थी और साफ़-सफ़ाई पर बहुत ज़ोर देती थी। इस सभ्यता में शहरी आबादी के फैलाव से पता चलता है कि यहां ट्रांसपोर्ट के अच्छे साधन भी थे। इनसे व्यापार का रास्ता भी आसान रहता था। सिंधु घाटी सभ्यता के लोग प्राचीन मेसोपोटामिया के साथ लकड़ी, मोतियों, तांबे, सोने और कपास का व्यापार करते थे।
सामूहिक सरकार
इमारतों के अवशेषों से पता चलता है कि वहां शहरी क्षेत्रों की तर्ज़ पर एक बेहतरीन नागरिक सरकार मौजूद थी। यह इस बात का सबूत है कि वहां एक अच्छी तरह से काम करने वाली शहरी अथारिटी थी, जो शहरों और बस्तियों के बुनियादी ढांचे की देखभाल और निर्माण के लिए ज़िम्मेदार थी। उनके शासन का तरीक़ा किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं था। यानी कोई शासक कुलीन वर्ग नहीं था बल्कि इसमें सामूहिकता की झलक मिलती थी। इसका मतलब है कि ज्यादा से ज्यादा लोग शासन व्यवस्था को संभाल रहे थे।
यही बात सिंधु घाटी सभ्यता को दूसरे समाजों और सभ्यताओं से अलग करती थी। यहां के खंडहर बताते हैं कि मिस्र के फ़िरऔन (फ़राओ) या मेसोपोटामिया के राजाओं जैसा कोई शासक नहीं था और न ही कोई बड़े शाही महल या इमारतें थीं। मिस्र और मेसोपोटामिया में सत्ता और शक्ति एक व्यक्ति में केंद्रित थी। उन सभ्यताओं की पुरानी इमारतों में भी यही झलक दिखती है जहां नौकरशाही और शाही नुमाईश की बात भी साफ़ थी।
शांतिपूर्ण क्षेत्र
इस बात के सबूत मौजूद हैं कि सिंधु घाटी में कुछ हद तक सामाजिक दर्जाबंदी थी। लेकिन यह उस वक्त के दूसरे समाजों के मुक़ाबले बहुत कम थी। पुरातत्वविदों को कुछ ऐसे मानव कंकाल मिले हैं, जिनसे हिंसा के कुछ सबूत मिलते हैं। हालांकि कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि सिंधु घाटी की सभ्यता दूसरे समाजों की तुलना में अधिक शांतिपूर्ण थी। यहां किसी बड़े युद्ध की निशानी नहीं मिलती, जबकि दूसरे प्राचीन समाजों में यह आम था। हिंसा के निशान नहीं मिलते तो इसका मतलब यह नहीं है कि यहां ऐसा कभी हुआ ही नहीं होगा। अगर कोई समाज अपने युद्धों को प्रमुखता से नहीं दिखाता या इतिहास में उसका कोई निशान नहीं छोड़ता तो हम यह समझने में ग़लती कर सकते हैं कि वह शांतिपूर्ण थे या नहीं।
रहस्यमयी अवशेष
हम अब भी सिंधु घाटी सभ्यता के बारे में बहुत कुछ नहीं जानते हैं। अभी बहुत सी खुदाई होना बाक़ी है। अब भी पश्चिमी भारत में ऐसी जगहों की तलाश की जा रही है, क्योंकि यह प्राचीन सभ्यता अफ़ग़ानिस्तान तक फैली हुई थी। अफ़ग़ानिस्तान के आज के हालात की वजह से इस वक्त वहां के खंडहरों की खुदाई करना बहुत कठिन है। मिस्र और मेसोपोटामिया की सभ्यताओं के अवशेषों से वहां की संस्कृतियों के बारे में जानकारी जुटाना आसान था, क्योंकि उन्होंने पत्थर के टिकाऊ स्मारक छोड़े हैं। लेकिन दूसरी ओर सिंधु सभ्यता में बड़े पैमाने पर मिट्टी की ईंटों और पकी ईंटों का इस्तेमाल किया गया था। बड़े पत्थरों, महलों या शाही मक़बरों के बिना सिंधु सभ्यता के बारे में बहुत जानना मुश्किल है। और यह इसलिए भी कठिन है क्योंकि हम यहां की स्क्रिप्ट को भी पूरी तरह से समझने में कामयाब नहीं हो पाए हैं।
इस सभ्यता के साथ क्या हुआ?
सिंधु घाटी सभ्यता के पतन के प्रमुख सिद्धांतों में से एक जलवायु परिवर्तन है। इन जगहों को 1900 ईसा पूर्व के आसपास छोड़ा जाने लगा था और पुरातत्वविद व जलवायु परिवर्तन विशेषज्ञ इसका कारण मानसून के पैटर्न में आने वाले बदलावों को मानते हैं। मोहनजोदड़ो में खुदाई से यह सबूत भी मिले हैं कि इस सभ्यता के ख़त्म होने से पहले लोग बाढ़ के असर को कम करने की कोशिश कर रहे थे। सिंधु घाटी सभ्यता को समझने से आधुनिक समाजों पर पड़ रहे प्रभाव को समझा जा सकता है क्योंकि अगर हिमालय के ग्लेशियर आज तेज़ी से पिघलते हैं तो इतिहास ख़ुद को दोहरा सकता है।
सिंधु घाटी सभ्यता में चलने वाली आम सहमति पर आधारित शासन शैली उन्हें बचाने के लिए काफ़ी नहीं थी। हालांकि आज के दौर के आधुनिक समाज जलवायु परिवर्तन से बचने के लिए कहीं बेहतर क़दम उठा सकते हैं। सिंधु सभ्यता के लोगों के पास यह जानने की तकनीक नहीं थी कि असल में क्या हो रहा था। लेकिन आज हमारे पास यह तकनीकी क्षमता मौजूद है। हम अपनी तकनीक का इस्तेमाल ज्यादा समझदारी से कर सकते हैं ताकि हमारी सभ्यता बनी रहे।
स विकास ठाकुर
