हेनरी बेसमेर ब्रिटिश फौज के लिए तोप के गोले बनाते थे। मजबूत स्टील की मांग बढ़ रही थी। मगर लोहे को गलाकर अशुद्धियां हटाने की तकनीक सीमित थी। इसलिए स्टील कमजोर होता था। बेसमेर कुछ नया तलाश रहे थे। उन्होंने पिघली धातु में हवा भरी तो बुलबुले उठने लगे। बेसमेर को लगा लोहा खरा हो गया, मगर हवा भरना जारी रखा। पिघला लोहा और चमकदार होने लगा। ठंडा हुआ तो बेहद मजबूत था। बेसमेर ने नया आविष्कार कर दिया था।
इस प्रयोग से लोहे से अतिरिक्त कार्बन निकालकर मजबूत स्टील बनाने की राह खुल गई थी। 1856 में उन्होंने इसका पेटेंट लिया। 19वीं सदी के अंत में यूरोप-अमेरिका में औद्योगिक रेलवे क्रांति हुई, तो उसके पीछे बेसमेर प्रोसेस से बनी स्टील ही थी, जिसने दुनिया बदल दी।
यह किस्सा मौजूं है, क्योंकि जिस कार्बन को आबोहवा में छोड़कर करोड़ों टन स्टील बना, औद्योगिक क्रांतियां हुईं, वही नामुराद कार्बन अब बदला ले रहा है। इसने पर्यावरण का सत्यानाश कर दिया। दुनिया कार्बन को हटाने-रोकने पर मजबूर है। लेकिन डि-कार्बनाइजेशन स्टील की मंहगाई लेकर आएगा। स्टील मंहगा तो सब मंहगा। अब दुनिया अपने उत्पादन पर कार्बन टैक्स लगाने जा रही है।
भारतीय वणिज्य मंत्रालय के अधिकारी उलझन में हैं। निर्यातक उनका दरवाजा घेरे हैं यूरोपीय समुदाय ने कार्बन टैक्स लगाने का एलान कर दिया है। यह यूरोपीय समुदायन को भेजे जाने वाले माल पर लगेगा। भारत प्रदूषक उद्योगों का गढ़ है। इसलिए निर्यात पर बड़ा खतरा है। लम्बी चर्चा के बाद यूरोपीय समुदाय के देश विश्व का पहला कार्बन बार्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (सीबीएएम) लागू करने पर राजी हुए हैं। यह कार्बन लीकेज रोकने की व्यवस्था है, ताकि कहीं भी अगर कोई सीमा से अधिक कार्बन उगल रहा है तो सख्ती की जाए। यूरोपीय समुदाय ने ग्रीनहाउस गैसों को 50 प्रतिशत कम करने के लिए 2030 का लक्ष्य रखा है। यानी उत्सर्जन को 1990 के स्तर तक घटाया जाएगा। इसी रास्ते से 2050 तक डी- कार्बनाइजेशन किया जाएगा।
सीबीएम 01 अक्टूबर 2023 से अमल में आया है। इसमें कार्बन इंटेंसिव यानी कार्बनखोर उद्योगों पर खास टैक्स लगेगा। यूरोप इसे दो चरणों में लागू करेगा। पहले चरण में कार्बन के इस्तेमाल की सूचनाएं जुटाने का तंत्र बनाया जाएगा। यूरोप को माल बेचने वालों को विस्तृत कार्बन इन्फार्मेशन रिटर्न भरने होंगे। इस कागजी व्यवस्था की लागत देखकर ही निर्यातकों का कलेजा हलक को आ गया है।
टैक्स तो 2026 में आएगा, जब सीमा से अधिक उत्सर्जन पर 90 डालर प्रति टन कार्बन के पैमाने पर टैक्स चुकाना होगा। इससे बचने के लिए नई तकनीकें अपनानी होंगी। फिलहाल यह स्टील, सीमेंट, उर्वरक, बिजली, एल्युमीनियम और कोयले के इस्तेमाल से बनने वाली हाइड्रोजन पर लगेगा। इन उद्योगों के उत्पादन से बनने वाले नट-बोल्ट तक। 2026 तक केमिकल और प्लास्टिक समेत सभी और कारें भी इस टैक्स के दायरे में होंगी।
लेकिन डी-कार्बननाइजेशन की खीर बड़ी टेढ़ी है। 2050 तक नेट जीजो का लक्ष्य अर्थव्यवस्था, राजनीति, रोजगार बाजार में बहुत कुछ बदल देगा। मेकेंजी का एक अध्ययन बताता है कि 2050 तक नेट जीरो कार्बन का लक्ष्य पाने के लिए तेल और गैस का उत्पादन वर्तमान के स्तर से 55 से 70 फीसदी कम करना होगा। 2050 तक कोयले का प्रयोग बंद हो जाएगा। यानी इतनी ऊर्जा साफ-सुथरे स्रोतों से लानी होगी। इंटरनल कंबशन इंजन वाली सभी कारें 2050 तक बंद करनी होंगी। इनकी जगह बैटरी वाहन लेंगें। स्टील का उत्पादन बढ़ेगा, पर 2050 तक सभी तरह की स्टील कार्बन कंजूस होंगी।
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केंजी का मानना है कि 2050 तक शून्य कार्बन के लक्ष्य के लिए अगले तीन दशक में करीब 275 ट्रिलियन डालर का निवेश करना होगा। अर्थात 2023 से 2050 तक करीब 9.2 ट्रिलियन डालर प्रतिवर्ष का खर्च। यह राशि अगले तीन साल में ब्लोबल जीडीपी के अनुपात में 7.5 प्रतिशत होगी।
नेट जीरो लक्ष्य के लिए खर्च का करीब 75 प्रतिशत इन उद्योगों को सुधारने में जाएगा, जो कार्बन उगल रहे हैं। इनमें बिजली, अटोमोबाइल, स्टील, सीमेंट आदि हैं। कार्बन खपत घटाने के लिए स्टील और सीमेंट उद्योगों की लागत में 25 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी होगी। कार्बन मुक्ति पर अधिकांश खर्च तत्काल चाहिए। यानी पर्यावरण तकनीकों पर खर्च को आज के स्तर से 60 प्रतिशत बढ़ाना होगा। कार्बन गहन ऊर्जा स्रोतों जैसे कोयले और गैस का विकल्प सस्ता नहीं है। मौजूदा कोयला संयंत्रों को बदलकर कार्बन रहित बिजली बनानी होगी।
स अंशुमान तिवारी
