भारत में जनसंख्या वृद्धि से ऊपजी पर्यावरणीय एवं ऊर्जा सम्बन्धी समस्या एवं समाधानः आलेख-2

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भारत एक विकासशील देश है, जिसकी आबादी 2 दशकों में बहुत तेजी से बढ़ी है और करीब 1.4 अरब की जनसंख्या को पार कर गई है। एशिया में चीन की जनसंख्या को पछाड़ते हुए आज हम विश्व में आबादी के हिसाब से नम्बर एक पर पहुॅंच गए हैं।

भारत में जैसे-जैसे आबादी बढ़ रही है, उस हिसाब से मनुष्यों के रहने के लिए आवास की सुविधा, शुद्ध पेयजल, रहन-सहन एवं बिजली की समस्या उत्पन्न हो रही है। चूॅंकि इस बढ़ती आबादी के लिए रहने योग्य भूमि की कमी होती जा रही है, जिसके फलस्वरूप मनुष्य वनों एवं जंगलों की कटाई कर रहने योग्य भूमि का निर्माण कर रहे हैं। फलस्वरूप पर्यावरणीय क्षति हो रही है। साथ ही शहरीकरण एवं औद्योगीकरण के कारण जो ग्रीन हाउस गैसें उत्पन्न हो रही हैं, उससे भी काफी पर्यावरणीय क्षति हो रही है।

भारत में ऊर्जा के लिए जो परम्परागत साधन हैं, वह कोयला आधारित हैं। चूॅंकि भारत में कोयला सीमित मात्रा में उपलब्ध है और बढ़ती हुई आबादी के कारण ऊर्जा की मांग बढ़ रही है, जो आज की तारीख में 240 अरब मेगावाट है और आने वाले वर्षों में इसकी मात्रा बढ़ती जाएगी। अतएव कोयले की सीमित मात्रा में उपलब्धता के कारण इसकी पूर्ति करना संभव नहीं दिख रहा है। अतः भारत में तेजी से बढ़ती आबादी के कारण उपरोक्त पर्यावरणीय एवं ऊर्जा संबंधित चुनौतियां हमारे समक्ष उत्पन्न हो गई है, जिसका समाधान करना अत्यंत आवश्यक है।

पर्यावरण संबंधित चुनौतियां
भारत में तेजी से बढ़ती जनसंख्या पर्यावरण क्षरण का प्राथमिक कारण है। जनसंख्या वृद्धि उपभोक्ता उत्पादों के उत्पादन की आवश्यकता को बढ़ाती है और यह आवश्यकता बदले में पर्यावरण संसाधनों के अति दोहन और दुरूपयोग की प्रवृत्ति को तीव्र करती है।

भारत में पर्यावरण की कई समस्याएं हैं। वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, कचरा और प्राकृतिक पर्यावरण के प्रदूषण, भारत के लिए चुनौतियां हैं। बढ़ती हुई जनसंख्या, अविकास और पर्यावरणीय क्षरण के बीच के समस्याजनक संबंधों को और मजबूत कर देती है। इसके अलावा निर्धनता प्रवासन को बढ़ावा देती है, जो शहरी क्षेत्रों की दृष्टि से अस्थिर या असंवहनीय बनाता है। ये दोनों ही परिणाम संसाधनों पर दबाव बढ़ाते हैं और नतीजतन पर्यावरणीय गुणवत्ता बदतर होती जाती है। उत्पादकता का ह्रास होता है और निर्धनता और गहरी होती जाती है। पर्यावरणीय सिद्धांतों की उपेक्षा एक प्रमुख कारण है कि प्राकृतिक आपदाएं परिहार्य हताहतों की बड़ी संख्या का कारण बनती है। किसी क्षेत्र पर प्राकृतिक खतरों के जोखिम का वैज्ञानिक आंकलन करने का कोई भी अभ्यास पूर्णतः लागू नहीं किया जाता है। अनियंत्रित उत्खनन और पहाड़ी ढलानों की अवैज्ञानिक तरीके से कटाई मृदा कटाव का खतरा बढ़ा देती है, जिसके परिणामस्वरूप भूस्खलन का खतरा बढ़ जाता है।

भारी निर्माण के कारण सभी नदियों के बेसिन में भी परिवर्तन आ रहा है। इसके परिणामस्वरूप प्राकृतिक वनस्पति आच्छादन के अंतर्गत अपक्षय और मृदा निर्माण के माध्यम से विकसित क्षेत्रों के स्वरूप में भारी परिवर्तन हुआ है। इसके साथ ही नदी जल ग्रहण क्षेत्र के जल अवशोषण क्षमता समाप्त होती जा रही है, जिसके सतही अपवाह में वृद्धि हो रही है और भूजल पुनर्भरण में कमी आ रही है। पहाड़ी क्षेत्रों में सड़क निर्माण (भले ही वह ढलान काटते हुए किए जाते हैं) भी भूदृश्य को अस्थिर बना रहा है और भूस्खलन के लिए अनुकूल परिस्थितियों का निर्माण करता है।

ऊर्जा संबंधित चुनौतियां
सम्पूर्ण मानव समाज की बुनियादी जरूरतों की पूर्ति करने और विकास को बढ़ावा देने में ऊर्जा एक इंजन का कार्य करता है। भारत में जनसंख्या बढ़ने के साथ-साथ ऊर्जा की मांग भी बढ़ती जा रही है। एक अनुमान के अनुसार वर्ष 2040 तक देश में बिजली की खपत 1280 टेरावाट प्रति घंटा हो जाएगी। ऐसे में सीमित जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा स्रोत हमारी भविष्य की मांग को पूरा करने में सक्षम नहीं हैं। भारत में जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा स्रोतों का जिस खतरनाक दर से उपभोग किया जा रहा है, उससे स्पष्ट है कि निकट भविष्य में वे अवश्य ही समाप्त हो जाएंगे और यह भी सच है कि इन्हें अल्पकाल में पुनः प्राप्त करना संभव नहीं है।

जीवाश्म ईंधन से ग्रीन हाउस गैसें जैसे मीथेन, कार्बनडाई आॅक्साइड आदि का उत्सर्जन होता है, जो पर्यावरण के साथ-साथ जलवायु परिवर्तन व मानव जीवन के लिए भी हानिकारक है। भारत स्वयं के इस्तेमाल किए जाने वाले कच्चे तेल का 85 प्रतिशत और अपनी प्राकृतिक गैस की आवश्यकता का 54 प्रतिशत आयात करता है, इस कारण भारत की अर्थव्यवस्था जीवाश्म ईंधन की कीमतों में अप्रत्याशित उतार-चढ़ाव से प्रभावित भी होती रहती है। ऐसे में जीवाश्म ईंधन का अत्यधिक प्रयोग भारत को विश्व के कुछ विशेष देशों पर निर्भर भी बना दिया है। अतः उपरोक्त सभी ऊर्जा संबंधित समस्याएं भारत के लिए एक चुनौती है, जिसके समाधान की नितांत आवश्यकता है।

पर्यावरण से संबंधित समाधान
अपने पर्यावरण को बेहतर बनाने के लिए हमें सबसे पहले अपनी मुख्य जरूरत ‘जल’ को प्रदूषण से बचाना होगा। कारखाने का गंदा पानी, घरेलू गंदा पानी, नालियों में प्रवाहित मल, सीवर लाइन का गंदा निष्कासित पानी समीपस्थ नदियों और समुद्रों में गिरने से रोकना होगा। कारखानों के पानी में हानिकारक रसायनिक तत्व घुले रहते हैं, जो नदियों के जल को विषाक्त कर देते हैं। परिणामस्वरूप जलचरों के जीवन को संकट का सामना करना पड़ता है और उसी प्रदूषित पानी को सिंचाई के काम में लेने से उपजाऊ भूमि भी विषैली हो जाती है।

साथ ही वायु प्रदूषण भी हमारे पर्यावरण को बहुत हानि पहुॅंचाता हे। बड़े-बड़े कारखानों की चिमनियों से लगातार उठने वाला धुआं, रेल व विभिन्न प्रकार के डीजल व पेट्रोल से चलने वाली वाहनों से निकलने वाली गैसों तथा धुआं, जलाने वाला हाईकोक, एसी, इन्वर्टर, जेनरेटर आदि से कार्बन डाईआॅक्साइड, नाइट्रोजन, सल्फ्यूरिक एसिड, नाइट्रिक एसिड प्रतिक्षण वायुमंडल में घुलते रहते हैं। अतः इसके कम से कम उपयोग को बढ़ावा देना आवश्यक है। साथ ही ध्वनि प्रदूषण के कारण हमारे पर्यावरण को काफी नुकसान होता है, जिस पर रोक लगाने की आवश्यकता है। अतः पर्यावरणीय चुनौती को हल करने के लिए अधिक से अधिक वृक्षारोपण एवं वन संरक्षण की आवश्यकता है।

ऊर्जा से संबंधित समाधान
देश की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों की पूर्ति हेतु ऊर्जा के नवीकरणीय संसाधनों पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत से तात्पर्य ऐसे स्रोतों से है, जो उपयोग के साथ समाप्त नहीं होते हैं। ये प्राकृतिक स्रोत से प्राप्त होते हैं और जिनकी खपत की तुलना में पुनःभरण की उच्च दर होती है। आम नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों में सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, भूतापीय ऊर्जा, पनबिजली, महासागर और जैव ऊर्जा शामिल हैं। अतः भारत में बदलती जनसंख्या की जरूरतों की पूर्ति हेतु नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों के उपयोग की आवश्यकता है।

उपसंहार
भारत में बदलती जनसंख्या की जरूरतों की पूर्ति हेतु भविष्य में नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों के अधिक से अधिक उपयोग की आवश्यकता है, जो पर्यावरण अनुकूल होती है तथा इसमें न्यूनतम या लगभग शून्य कार्बन व ग्रीन हाउस उत्सर्जन होता है।

स पूर्वी साहू
कक्षा-9वीं, देशबंधु इंग्लिश मीडियम सकूल, स्टेशन रोड, रायपुर (छ.ग.)