जनसंख्या वृद्धि मानव समाज के लिए एक गंभीर समस्या बनकर उपस्थित हुई है, जिसका प्रभाव भविष्य में प्रत्येक मनुष्य के रोजमर्रा के जीवन क्रम पर पड़ रहा है और पड़ेगा। विश्व जनसंख्या दिवस संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) की पहल से 11 जुलाई 1989 को पहली बार मनाया गया था। जब से प्रत्येक वर्ष विश्व के अलग-अलग स्थानों में जनसंख्या दिवस का आयोजन किया जाता है। जिसका उद्देश्य लोगों को जनसंख्या वृद्धि तथा पर्यावरण एवं मानव जीवन के विभिन्न पहलुओं पर इसके होने वाले प्रभाव के प्रति जागरूक करना है।
विश्व में जनसंख्या वृद्धि
जनसंख्या वृद्धि का आशय है किसी आबादी में लोगों की संख्या में वृद्धि। दुनिया की आबादी बीसवीं सदी के मध्य की तुलना से तीन गुना से भी ज्यादा है। 15 नवम्बर 2022 को वैश्विक मानव आबादी 800 करोड़ तक पहुॅंच गई।
भारत में जनसंख्या वृद्धि
भारत के संदर्भ में देखा जाए तो यह आंकड़े और भी भयावह हैं। भारतवर्ष की जनसंख्या जनगणना के अनुसार 1955 में आबादी 39.85 करोड़ थी, जो कि वर्ष 2000 में बढ़कर 105 करोड़ पहुॅंच गई। इन 35 वर्षों में भारत की जनसंख्या में 65 करोड़ लोगों की वृद्धि हो गई। वर्तमान में भारत की जनसंख्या 144 करोड़ हो चुकी है। याने सिर्फ 23 साल में ही 39 करोड़ लोग भारत में और बढ़ गए हैं। अभी की जनसंख्या वृद्धि दर 0.92 प्रतिशत है। अगर इसी गति से जनसंख्या बढ़ती रही तो वर्ष 2050 तक भारतवर्ष में 185 करोड़ पहुंच जाएगी, वहीं वर्ष 2100 तक 286 करोड़ लोग भारत में होंगे। अतः जनसंख्या वृद्धि को शून्य स्तर पर लाना अत्यंत अनिवार्य है।
जनसंख्या वृद्धि और पर्यावरण
प्राचीनकाल से ही मानव अपनी जीविका और विकास के लिए प्रकृति पर निर्भर रहा है। भारत में पर्यावरण क्षरण का एक प्रमुख कारण जनसंख्या में तीव्र वृद्धि है, जो प्राकृतिक संसाधनों और पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रही है। जनसंख्या बढ़ने से वनों का कटाव होगा, रिहायशी इलाके बढ़ने से खेती की जमीन खत्म होगी, उपभोग में वृद्धि होने से प्राकृतिक संसाधनों का अतिदोहन होगा, जो कि पहले सही सीमित हैं। जनसंख्या वृद्धि दर संसाधनों के वृद्धि दर अधिक है, जबकि संसाधन सीमित हैं। जनसंख्या बढ़ने के साथ-साथ पर्यावरण पर दबाव प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है। जनसंख्या बढ़ने से पर्यावरण पर कई प्रभाव पड़ रहे हैं, जिनमें से मुख्य कुछ इस प्रकार हैं।
ग्लोबल वार्मिंग पर प्रभाव
देश की बढ़ी आबादी और तेजी से बढ़ता ऊर्जा उपभोग ग्लोबल वार्मिंग में एक महत्वपूर्ण और बड़ी भूमिका निभाता है। नेचर क्लाईमेट चेंज की एक रिपोर्ट के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्र के स्तर में बढ़ोत्तरी के साथ-साथ चन्द्रमा की कक्षा डगमगाने से पृथ्वी पर विनाशकारी बाढ़ आने की संभावना है। भारतीय प्रौद्योगिक संस्थान, बेंगलुरू और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान कानपुर के शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन में पाया कि हाल के वर्षों में गंगा बेसिन में विनाशकारी भूस्खलन और बाढ़ की आवृत्ति बढ़ी है। जलवायु परिवर्तन और बांध बनाने जैसी मानव निर्मित गतिविधियां गंगा को प्रभावित कर रही हैं।
वायु प्रदूषण पर प्रभाव
वायु प्रदूषण पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य के लिए सबसे बड़े खतरों में से एक बन गया है, जिससे लोगों तक स्वच्छ हवा की पहुॅंच एक वैश्विक मुद्दा बन गई हैं लगातार बढ़ रही वैश्विक आबादी की उपभोगवादी जीवनशैली ग्रीन हाउस गैस उत्सज्रन को तेज कर रही है, जिसके परिणामस्वरूप वायु गुणवत्ता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
भारत की बढ़ती आबादी का वायु गुणवत्ता पर स्पष्ट दुष्प्रभाव देखा जा सकता है। देश वैश्विक प्रदूषण सूचकांक में तीसरे स्थान पर हैं ‘वल्र्ड एयर रिपोर्ट 2020’ के अनुसार दुनिया के 30 सबसे प्रदूषित शहरों में से 22 शहर भारत के हैं।
वनों पर प्रभाव
बढ़ती आबादी के लिए शहरीकरण और औद्योगीकरण के परिणामस्वरूप वनों की तेज कटाई हुई है। औद्योगिक इकाईयों और आवासीय परियोजनाओं के लिए बड़ी संख्या में पेड़ों को काटा गया है, एवं जंगलों को साफ किया गया है, जिससे पारिस्थितिकी असंतुलन पैदा हो रहा है।
जनसंख्या वृद्धि से पेड़ों की कटाई में और अधिक तेजी से वृद्धि हुई है, जो देश के समग्र वन क्षेत्र को गंभीर रूप से प्रभावित कर रही है। नेचर जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, भारत में 2261 वर्ग किलोमीटर में फैले 350 करोड़ पेड़ हैं। 144 करोड़ की आबादी के साथ प्रति व्यक्ति के लिए मात्र 24 पेड़ उपलब्ध हैं। भारत ने वर्ष 2000 से अब तक 23.33 लाख हेक्टेयर वृक्ष क्षेत्र खो दिया है।
जमीन पर दबाव
भारत में जनसंख्या वृद्धि चिंताजनक स्थिति की ओर बढ़ रही है। भारत में विश्व की 18 प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है, जबकि वैश्विक तुलना में इसका भूभाग प्रतिशत मात्र 2 प्रतिशत है। भारत की जनसंख्या में लगातार वृद्धि हो रही है, जबकि भारत के भूभाग में कोई वृद्धि नहीं होगी। इतनी विशाल जनसंख्या के लिए भूभाग कहां से लायेंगे।
जनसंख्या का ऊर्जा पर दबाव
जैसे-जैसे जनसंख्या का आकार बढ़ता जा रहा है, वैसे-वैसे उसकी ऊर्जा खपत भी बढ़ती है। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ऊर्जा उपभोग करने वाला देश है। भारत अपने 144 करोड़ लोगों की जरूरतों को पूरा करने के लिए कोयले और तेल का अधिक से अधिक उपभोग कर रहा है। भारत सरकार की योजना 2030 तक घरेलू कोयला उत्पादन को दोगुना करने की है।
वर्ष 1947 में मात्र 1362 मेगावाट ऊर्जा की आवश्यकता थी, जो बढ़कर मार्च 2020 के अंत में लगभग 448.11 गीगावाट हो गई है। प्रति व्यक्ति विद्युत खपत में भी तीव्र बढ़ोत्तरी हुई है। वर्ष 1947 में यह मात्र 16.3 यूनिट प्रति व्यक्ति थी जो 2019-20 में बढ़कर 1208 यूनिट प्रति व्यक्ति हो गई। अगर इसी दर से मांग बढ़ती रही तो आपूर्ति के वर्तमान स्रोत से इसे पूरा करना काफी मुश्किल साबित होगा।
समाधान
जनसंख्या से होने वाले प्रतिकूल प्रभावों को कम करने का एक ही उपाय है, वह यह कि हम अपनी संख्या वृद्धि दर को शून्य स्तर पर लायें। इसके अलावा अन्य समाधानों में नवाचार और प्रौद्योगिकी को महत्वपूर्ण स्थान देना होगा। इसका उपयोग कर हम न केवल पृथ्वी की मानव वहन क्षमता को बढ़ा सकते हैं, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति के जीवन की गुणवत्ता में सुधार ला सकते हैं। जनसंख्या वृद्धि को रोकने के लिए महिलाओं को उच्च शिक्षित करना एवं उन्हें आत्मनिर्भर बनाना एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।
उपसंहार
जनसंख्या वृद्धि एक ऐसी समस्या है, जिसे नजरंदाज नहीं किया जा सकता है। हम सब अपना-अपना योगदान देकर इस समस्या से निजात पा सकते हैं। विश्व की सरकारों ने समस्या को गंभीर रूप में देखना शुरू कर दिया है एवं इसके रोकथाम के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाने की पहल कर चुके हैं। लेकिन इन प्रयासों का धरातल पर कोई प्रभाव परिलक्षित दिखाई नहीं देता है। इस प्रयास को संभव बनाने के लिए व्यक्तियों, समुदायों और सरकारों के संयुक्त और समन्वित प्रयास की आवश्यकता है।
स भाव्या सिंह
कक्षा-12वीं, नगरमाता बिन्नीबाई सोनकर
सेजेस स्कूल, भाठागांव, रायपुर (छ.ग.)
