छत्तीसगढ़ का प्रथम हरित शिखर सम्मेलन

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रायपुर के दीनदयायल उपाध्याय आडोटोरियम में 3 से 5 अक्टूबर तक राज्य का प्रथम हरित शिखर सम्मेलन आयोजित किया गया। सम्मेलन का में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा कि पया्रवरणसंकट और जलवायु परिवर्तन वर्तमान में राष्ट्रीय चिंतन का विषय बन गया है। हम सभी को मिलकर इस समस्या से निपटने के लिए सहभागिता निभानी होगी।

प्रदेश का 44 प्रतिशत हिस्सा वनाच्छादित है और हम इसे सहेजने का काम गंभीरता के साथ कर रहे हैं। उक्त उद्गार से मुख्यमंत्री हरित शिखर सम्मेलन के शुभारंभ कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। मुख्यमंत्री साय ने कहा कि इस वर्ष देश में गर्मी ने पिछले सारे रिकार्ड तोड़ दिएं दुबई जैसे रेगिस्तानी इलाके में अत्यधिक बारिश होने से पूरा शहर बाढ़ की चपेट में आ गया। ये सब क्लाईमेट चेंज से हो रहा है। हम इसलिए वनों से सहेज रहे हैं।

कार्यक्रम में मुख्यमंत्री ने बताया कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने 4 करोड़ वृक्ष लगाने का जो लक्ष्य रखा था, वह छत्तीसगढ़ ने पूरा कर लिया है। गुरू घासीदास तमोर पिंगला को टाइगर रिजर्व बनाकर वन्यजीवों के संरक्षण और पर्यावरण के संवर्धन को बढ़ावा दे रहे हैं। जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए छत्तीसगढ़ में अनेक कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं। वृक्षारोपण को बढ़ावा देने के लिए किसान वृक्ष मित्र योजना चलाई जा रही है। उन्होंने बताया कि नया रायपुर में ‘‘पीपल फार पीपल’’ अभियान चलाया गया है, जिसके अंतर्गत हजारों पीपड़ के पेड़ों का रोपण किया गया है।

छत्तीसगढ़ के वन मंत्री केदार कश्यप ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि हर क्षेत्र में हम आगे बढ़े, लेकिन प्रकृति से हमने दूरी बना ली। हमने प्रकृति का साथ छोड़ा हैं हम विकृति की ओर बढ़ने लगे हैं। उन्होंिने जलवायु परिवर्तन सहित पर्यावरण संरक्षण और संवर्धन के उद्देश्य से राज्य शासन की आगामी कार्य योजनाओं और प्रयासों की जानकारी दी।

प्रज्ञा प्रवाह के अखिल भारतीय संयोजक जे. नन्दकुमार ने कहा कि भारतीय संस्कृति को आरण्यक संस्कृति कहा गया है। भारतीय संस्कृति का आदर्श रूप वनवासियों के जीवन में हमें दिखता है। हमारे लोक जीवन और लोक परम्पराओं में प्रकृति और मानव के बीच सम्बन्ध के अनेक सुंदर उदाहरण देखने को मिलते हैं उन्होंने कहा कि आने वाले वर्षों में ग्रीन समिट का मोटो परस्पर जीना अर्थात सह अस्तित्व होना चाहिए। हमें पंचभूत को अपना मानकर इसकी रक्षा करनी चाहिए।

कार्यक्रम को पर्यावरण संरक्षण गतिविधि के राष्ट्रीय समन्वयक गोपाल आर्य वन बल प्रमुख वही श्रीनिवास राव ने भी संबोधित किया। एमिटी यूनीवसिर्टी के कुलपति पीयूषकांत पांडे ने आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम में बोटेनिकल सर्वे आफ इंडिया के निदेशक डाॅ. असीसो माओ, एनआईटी रायपुर के डायरेक्टर एन वी रामन्ना राव, पद्मश्री जागेश्वर यादव, एमिटी वाटर वूमेन आफ इंडिया सुश्री शिप्रा पाठक सहित गणमान्य नागरिक शुभारंभ कार्यक्रम में उपस्थित थे।

कार्यक्रम में पद्मश्री जागेश्वर यादव को आमंत्रित किया गया था। बगीचा ब्लाक के भितघरा गांव में पहाड़ियों व जंगल के बीच रहने वाले जागेश्वर यादव साल 1989 से ही बिरहोर जनजाति के लिए काम कर रहे हैं। उन्होंने जशपुर जिले में एक आश्रम की स्थापना की है। वे बताते हैं, मेरे आदिवासी भाई जानवरों से नहीं इंसान से डरते थे। शेर के पंजे से नहीं इंसानी पैरों से डरते थे। जंगल में रहते थे, इसलिए शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार से वंचित थे। उनके जीवन को बदलने के लिए मुझे उनके बीच रहना पड़ा। उन्होंने कहा कि, मैं चप्पल नहीं पहनता था, इसलिए उन्होंने मुझे स्वीकार कर लिया। मैंने उनकी भाषा और संस्कृति सीखी और शिक्षा की अलख जगाकर उन्हें स्कूलों में भेजने के लिए प्रोत्साहित किया। नतीजतन आज वे भी समाज की मुख्यधारा में शामिल हैं।

वेट लैंड पर समिटि
ग्रीन समिटि में आडीटोरियम के अन्य संकल्प, सिद्धि आदि कांफ्रेस रूम में भी सतत आयोजन चलाए गए। जिसमें सिद्धि में आयोजित ग्रीन समिट 2024 के वेटलैंड रिस्टोरेशन अर्बन ग्रीनिंग लैंड स्केप (आद्रभूमि संरक्षण और हरित नगरीय क्षेत्र) कैसे हों विषय पर अपने उद्गार प्रगट करते हुए समाज चिंतक व पर्यावरण के क्षेत्र मे लंबे समय से कार्य करने वाले प्रभात मिश्र ने कहा कि नगरीय क्षेत्रों मे तालाबों का अस्तित्व सीवरेज के पानी से खतरे मे है एवं ग्रामीण क्षेत्रों मे ट्यूबवेल के बेतरतीब कार्य करने से भूमिगत जल स्तर अस्तित्व को लेकर संकट में है। भूमिगत जल हजारों वर्षो की प्रक्रिया के बाद बनते हैं इसका दोहन होना चाहिए न कि शोषण। नगरीय क्षेत्रों के तालाबों मे प्रदूषित जल को छोङे जाने से पूर्व उपचारित किया जाना चाहिए एस टी पी बनाकर तब कही जाकर हमारे ये तालाब सुरक्षित रह पाएंगे।

मिश्र ने आगे बताया कि रायपुर सरोवरों का नगर हुआ करता था जल राशि को बढाने मे कलचुरी हैहय वंशी राजाओं का सर्वाधिक योगदान रहा, साथ ही उन परंपराओ का योगदान भी सर्वाधिक रहा जिसमे अनेक अनाम लोगों ने तालाब किसी की स्मृति मे खुदवाए बनवाए इसका कुल अर्थ मिश्र ने बताया कि तालाब बनवाने वालो की एक श्रेणी थी वहीं दूसरी ओर बनाने वालों की,

हमारे छत्तीसगढ मे 1300 मिलीमीटर वर्षा होती है इस दृष्टिकोण से वर्षा जल का समायोजन कर हम इसके उपयोग को बेहतर बना सकते हैं अपने वक्तव्य मे पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1988 के अंतर्गत वेटलैंड अधिनियम 2017 के अनुपालन मे राज्य शासन ने 17/12/2018 से इसे लागू किया है आगे के व वर्तमान समय को देखते हुए तालाबो को व नेचुरल वेटलैंड को संरक्षण देने की आवश्यकता है। इस परिचर्चा मे अरावली पर्वत श्रृंखला के लिए कार्य करने वाले विजय धसमाना, आसाम से डाक्टर शांतनु दत्ता सदस्य सचिव प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड उपस्थित थे।

कार्बन क्रेडिट पर समिटि
इसी कड़ी में छत्तीसगढ़ ग्रीन समिट (फस्र्ट एडिषन) के तहत बेनीफिट शेयरिग मेकानिज्म- बायोडावर्सिटी एवं कार्बन के्रडिट के व्याख्यान माला का आयोजन पंडित दीनदयाल आडिटोरियम के संकल्प हाॅल में दिनांक 05 अक्टूबर 2024 को किया गया जिसमें देष भर से इस क्षेत्र में आये हुए विषेषज्ञों ने अपने विषय पर अभी तक के कार्याें के बारें बताया।

इस व्याख्यान माला में इस संदर्भ में पेरिस एग्रीमेंट के महत्व पर प्रकाष डाला तथा भारत सरकार के 2070 तक शून्य कार्बन उत्सर्जन के लक्ष्य के हासिल करने की दिषा में किए जा रहे कार्यों तथा उसमें सामुदायिक भागीदारी की आवष्यकता के महत्व को समझाया। इस आयोजन में किसी प्रकार सामुदायिक क्षेत्र में कार्बन उत्सर्जन कम करने के आर्थिक तथा पर्यावरणीय लाभकारी उपायो को अपना कर लाभ साझा करने के संदर्भ में जानकारी भी दी गई।

छत्तीसगढ़ हरित शिखर सम्मेलन के समापन में राज्यपाल रमेन डेका शामिल हुए। उन्होंने कहा, पानी होगा तो पेड़ रहेगा और पेड़ होगा तो पानी रहेगा, इसलिए दोनों को बचाकर रखना है। हर व्यक्ति को एक पेड़ मां के नाम लगाना है। प्राकृतिक सुंदरता से भरपूर छत्तीसगढत्र राज्य में इको टूरिज्म को बढ़ावा दिया जाएं साथ ही जल संरक्षण के लिए भी सभी को ध्यान देने की जरूरत है।

राज्यपाल ने कहा, 140 करोड़ जनसंख्या वाले हमारे देश में हर व्यक्ति एक पेड़ लगाएगा तो देश का परिदृश्य बदल जाएगा। पेड़ लगाने के बाद उसका संरक्षण भी करना होगा। आज जंगलों में अंधाधुंध पेड़ों के काटे जाने से वहां रहने वाले जानवरों को भोजन की दिक्कत हो रही है, इसलिए वे भोजन की खोज में आबादी वाले क्षेत्रों में आते हैं।

उन्होंने आगे कहा, जल संरक्षण भी बहुत जरूरी है। इस पर सभी को ध्यान देना होगा, तभी मानव सभ्यता कायम रहेगी। राज्यपाल डेका ने अपील करते हुए कहा, हम मिलकर यह संकल्प लें कि हम अपने प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करेगे।

पर्यावरणीय चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार रहेंगे और सतत विकास की राह पर चलेंगे। इस अवसर पर पर्यावरण के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वाले व्यक्तियों को ग्रीन अवार्ड से सम्मानित किया गया।

इस कार्यक्रम मंे छत्तीसगढ़ के अनेक महाविद्यालयों तथा विषय में रूचि रखने वाले प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। स