वसुधैव कुटुंबकम् : समस्त जीवन का साझा भविष्य

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पृथ्वी पर मौजूद समस्त जीव- जंतु, पशु -पक्षी का अपना एक विशेष महत्व है और वे सभी एक दूसरे पर अवलंबित हैं। प्राकृतिक संसाधन सहित मरुस्थल और हिम आच्छादित पर्वत शिखर, नदियां आदि सब कुछ मानव जीवन के लिए जरूरी है। जीवन की गुत्थियां एक दूसरे पर आश्रित है। किसी एक जीव के खत्म हो जाने के खतरे को आज के वैज्ञानिक समझने लगे हैं। यही कारण है कि धरती के कोने कोने में जैव विविधता संपदा को सहेजा, संवारा जाने लगा है।
विलुप्त होती जैव विविधता
पृथ्वी पर 5 से 30 मिलियन प्रजातियां होने का अनुमान वैज्ञानिक लगाते हैं। अभी तक 1.5 मिलियन प्रजातियों को ही पहचाना जा सका है। बढ़ता प्रदूषण बढ़ती आबादी और अंधाधुंध विकास से होते विनाश से जैव संपदा को अत्यधिक क्षति पहुंच रही है। दुनिया की ज्यादातर प्रजातियां को हम जान नहीं सके हैं उनके विलुप्त होने का खतरा ज्यादा हो गया है। प्राकृतिक रूप से भी प्रजातियां भी विलुप्त हो रही है। इंसानी हस्तक्षेप के कारण विलुप्तिकरण की दर एक हज़ार से दस हजार गुना ज्यादा हो रही है। प्रजातियों को बचाये रखने के लिए दुनिया में अब बायोस्फीयर रिजर्व स्थापित किए जा रहे हैं।
धरती पर मौजूद पेड़- पौधे और जीव-जंतुओं के बीच संतुलन बनाए रखने तथा जैव विविधता के मुद्दों के बारे में लोगों में जागरूकता और समझ बढ़ाने के लिए हर बरस 22 मई को अंतर्राष्ट्रीय जैव विविधता दिवस मनाया जाता है। 22 मई 1992 को नैरोबी एक्ट में जैव विविधता को 193 देशों ने स्वीकार किया और इस दिन को जैव विविधता दिवस घोषित किया।
भारतीय संस्कृति में विद्यमान
भारतीय संस्कृति में जैव विविधता को बचाए रखने के लिए धार्मिक रूप से विधान बनाए गए हैं। वेद सहित दूसरे धार्मिक ग्रंथों में पेड़ -पौधे, नदी -पहाड़, कुआं- तालाब, पशु -पक्षी, सभी के संरक्षण और संवर्धन के लिए विधान बनाए गए हैं। भारतीय पर्व और त्योहारों में, रीति रिवाजों में प्रकृति को सहेजा गया है। संपूर्ण भूमंडल को एक कुटुंब की संज्ञा दी गई है यही कारण है कि भारतीय संस्कृति समूची दुनिया से अनूठी है और विश्व को एक समृद्ध दृष्टिकोण भी प्रदान कराती है।
सभी जीवन के लिए
जैव विविधता दिवस 2022 की थीम है, ‘‘सभी जीवन के लिए एक साझा भविष्य का निर्माण।“
हमारी जैव विविधता संपदा तेजी से खत्म हो रही है जिन्हें बचाए रखने के लिए वर्ष 2011-2020 के दशक को यू एन जी ए द्वारा संयुक्त राष्ट्र के जैव विविधता दशक घोषित किया था। ताकि जैव विविधता पर एक राजनीतिक योजना के कार्यान्वयन को बढ़ावा दिया जा सके। प्रकृति के साथ सद्भाव से रहने की समग्र दृष्टि को बढ़ावा दिया जा सके। वर्ष 2021- 2030 को संयुक्त राष्ट्र द्वारा सतत विकास हेतु ‘‘महासागर विज्ञान दिवस“ और पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली पर संयुक्त राष्ट्र संघ के रूप में घोषित किया।
भारत में जैव संपदा
जैव विविधता के नजरिए से भारत एक समृद्ध देश है। विश्व का 2.4 फीसदी भूभाग होने के बावजूद दुनिया की 7-8 प्रतिशत प्रजातियों का पर्यावास है। इन प्रजातियों में 45000 पादप और 91000 जीव- जंतु हैं। दुनिया के 34 जैव विविधता हाटस्पाट में से चार भारत में है। भारत में जैव विविधता के कई आकर्षक वैश्विक केंद्र हैं। उदाहरण के लिए सिक्किम में पक्षियों की 422 प्रजातियां और तितलियों की 697 प्रजातियां, फूलों के पौधों की 4500 प्रजातियां, पौधों की 362 प्रजातियां और सुंदर आर्किड फूलों की समृद्धि विविधता है।
भारत दुनिया के लिए कई मायनों में उदाहरण माना जा सकता है। जो देश एक अरब 30 करोड़ लोगों की आबादी को स्थाई रूप से भोजन उपलब्ध कराता है यह एक मिसाल है! चुनौतियां भी है कि भूमि, मिट्टी और जल संसाधनों और देश की समृद्ध विविधता को नष्ट किए बिना शहरों में प्रदूषण की धुंध पैदा किए बिना, किस तरह उपलब्धि बरकरार रखी जा सकती है।
भारत के राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण ने संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम की मदद से ग्रामीणों की आजीविका में बेहतरी के लिए नए मापदंड स्थापित किए हैं ।
जैविक विविधता अधिनियम और नियमों के कार्यान्वयन को सुदृढ़ कर उसकी पहुंच और लाभ साझाकरण पर ध्यान देकर परियोजना बनाई गई है। परियोजना का उद्देश्य जैविक संसाधनों तक बेहतर पहुंच बनाना उनके आर्थिक मूल्य का आंकलन करना और स्थानीय लोगों के बीच उस उनके लाभों को बेहतर ढंग से साझा करना है। देश के 29 राज्यों में से 10 राज्य आंध्र प्रदेश, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम, पश्चिम बंगाल, गोवा, कर्नाटक, उड़ीसा और तेलंगाना में परियोजना चलाई जा रही है।
भारत अपनी सांस्कृतिक विरासत को समेटे हुए एक बेहतर भविष्य का निर्माण कर रहा है जैव विविधता को संजो कर उसे कैसे जीवन्त बनाए रखना है यह भारत की संस्कृति में विद्यमान हैं उसका अनुसरण करते हुए सब का मार्ग प्रशस्त कर रहा है। ‘‘वसुधैव कुटुंबकम“ का उदघोष करता हुआ भारत ‘‘सभी जीवन के लिए एक साझा भविष्य का निर्माण“ करने की ओर अग्रसर हो रहा है।
रविन्द्र गिन्नौरे