भारत में संभाव्य ऊर्जा स्रोतों में कोयला कुल 170 अरब टन है, जिसमें सिद्ध 50 अरब टन, सूचित 70 अरब टन एवं अनुमानित 50 अरब टन है। इसी प्रकार खनिज तेल व गैस में सूचित 17 अरब टन। हाइड्रो (जल प्रपात) से अनुमानित 10 लाख मेगावाट है, वहीं यूरेनियम 70 हजार टन तथा थोरियम 3.60 लाख टन है।
भारत की स्थिति
भारत में प्रस्तुत बिजली क्षमता 55 हजार मेगावाट की है। भारत की जनता के जीवन स्तर को ऊंचा करने के लिए वर्ष 2050 में बिजली की मांग 04 लाख मेगावाट तक बढ़ जाएगी। लेकिन द्रुतगति से कोयले का इस्तेमाल अगर होता रहा, तो सिद्ध कोयला वर्ष 2050 तक खत्म हो जाएगा। देश में खनिज तेल व गैस बहुत कम हैं और इनकी अन्य जरूरतें भी हैं। हाइड्रो ऊर्जा सिर्फ 12 प्रतिशत उपलब्ध है। सौर, वायु, सागर, गोबर गैस आदि ऊर्जा का प्रयोग बहुत सीमित रहेगा, इसलिए भारत में सिर्फ नाभिकीय ऊर्जा ही पर्याय स्रोत हो सकता है। दुनिया में प्रस्तुत नाभिकीय ऊर्जा से बिजली की क्षमता इस प्रकार है-
स्थापित 3.12 लाख मेगावाट एवं निर्माणाधीन 1.24 लाख मेगावाट। फ्रांस में नाभिकीय ऊर्जा से बिजली उत्पादन 70 प्रतिशत तक हो रहा है।
भारत का नाभिकीय ऊर्जा कार्यक्रम
डॉ. भाभा ने भारत में नाभिकीय ऊर्जा कार्यक्रम तीन चरणों में आयोजित किया था।
पहला चरण
भारी जल अवमंदित रिएक्टरों का निर्माण, जिनमेें 10 से 15 हजार मेगावाट बिजली पैदा की जाएगी। इन रिएक्टरों में प्राकृतिक यूरेनियम का प्रयोग होगा और साथ में 3 टन प्लूटोनियम प्रतिवर्ष उत्पन्न होगा।
दूसरा चरण
प्लूटोनियम और क्षमित यूरेनियम का प्रयोग जो पहले चरण से मिलेंगे, दुत प्रजनक रिएक्टरों में किया जाएगा, जिनसे 3.50 लाख मेगावाट की बिजली पैदा हो सकेगी और साथ ही साथ अधिक प्लूटोनियम का उत्पादन भी होगा।
तीसरा चरण
इसमें थोरियम प्रजनक रिएक्टर बनाये जाएंगे, जिनसे 10 लाख मेगावाट की बिजली पैदा की जाएगी।
प्रजनक के सिद्धांत
नाभिकीय रिएक्टरों में विखंडनीय ईंधन च्न-239 और न्-233 का उत्पादन निम्नलिखित नाभिकीय अभिक्रियाओं से होता है।
प्रजनिक अनुपात की परिभाषा इस प्रकार है:-
तापीय रिएक्टरों में प्र. अ. 0.6- 0.7 तक ही होता है। द्रुत न्यूट्रानों द्वारा विखंडन से अधिक न्यूट्रानों की उत्पत्ति होती है। द्रुत रिएक्टरों में प्र.अ. 1.2 से 1.4 तक हो सकता है, जिससे नया ईंधन ज्यादा पैदा किया जा सकता है। द्रुत रिएक्टरों में न्-238 का विखंडन भी संभव है, जिससे नाभिकीय ऊर्जा न्-238 से भी पैदा हो सकती है। इस तरह द्रुत रिएक्टरों में यूरेनियम का प्रयोग 100 गुना अधिक हो सकता है और यूरेनियम का दक्षता पूर्वक प्रयोग किया जा सकता है। द्रुत प्रजनक रिएक्टरों से नाभिकीय शक्ति का उत्पादन अधिक हो सकेगा, जो कि सिर्फ अवमंदित रिएक्टरों के द्वारा नहीं हो सकता।
द्रुत प्रजनक रिएक्टरों के गुण
प्रचलित द्रुत प्रजनक रिएक्टरों को द्रव धातु शीतलित द्रुत प्रजनक रिएक्टर स्पुनपक उमजंस ;ेवकपनउद्ध बववसमक ंिेज इतममकमत तमंबजवत ;स्डथ्ठत्द्ध कहते हैं। ये दो तरह के होते हैं। पूल (तालाबी) रिएक्टर और लूप रिएक्टर।
द्रुत प्रजनक रिएक्टरों का कार्यक्रम
डॉ. भाभा के दूसरे चरण के आयोजन को लागू करने के लिए कल्पक्कम में इंदिरा गांधी परमाणु अनुसंधान केन्द्र स्थापित किया गया। इस केन्द्र के मुख्य लक्ष्य द्रुत प्रजनक परीक्षण रिएक्टर (ंिेज इतममकमत जमेज तमंबजवत) का निर्माण और द्रुत प्रजनक रिएक्टर तकनीकी से संबंधित अनुसंधान व विकास कार्य हैं। यहॉं का द्रुत प्रजनक रिएक्टर द्रव सोडियम शीतलित, यूरेनियम प्लूटोनियम के मिश्र कार्बाइड ईंधन से चालित लूप किस्म का रिएक्टर है। यह रिएक्टर अक्टूबर 1985 में क्रांतिक हुआ। यह 40 मेगावाट (तापीय) और 13.5 मेगावाट (विद्युत) रिएक्टर है। यह संसार में यूरेनियम-प्लूटोनियम के मिश्र कार्बाइड ईंधन से चलने वाला एकमात्र रिएक्टर है। इसके मुख्य प्राचल सारणी-1 में दिए गए हैं। इस रिएक्टर के द्वारा भारतीय वैज्ञानिकों और अभियंताओं ने द्रव धातु शीतलित द्रुत प्रजनक रिएक्टरों के अभिकल्पन, निर्माण और संचालन के सभी पहलुओं का गहराई से अध्ययन किया और बहुमूल्य अनुभव प्राप्त किया।
द्रुत प्रजनक परीक्षण रिएक्टर के संचालन से प्राप्त अनुभव से इस केन्द्र के वैज्ञानिकों और अभियंताओं को व्यावसायिक द्रुत प्रजनक बिजलीघरों के अभिकल्पन व निर्माण के लिए आवश्यक ज्ञान एवं आत्मविश्वास मिला है। इसके आधार पर 500 मेगावाट क्षमता के प्रोटोटाइप द्रुत प्रजनक बिजलीघरों का अभिकल्पन किया गया है। इस रिएक्टर के प्राचल भी सारणी-1 में दिए गए हैं। यह रिएक्टर पूल किस्म का होगा। 500 मेगावाट क्षमता के इस बिजलीघर के निर्माण की दिशा में इस केन्द्र में कार्य आरंभ किया जा चुका है और इसका संचालन करने का आयोजन किया गया है।
रिएक्टर सुरक्षा
रिएक्टर सुरक्षा निम्नलिखित तीन स्तरों में की जाती है। (1) अभिकल्पन में अन्तनिर्हित सुरक्षा व्यवस्था जिसमें विभिन स्तर के अवरोधों का अभिकलप्न एवं ऋणात्मक अभिक्रियता गुणांक होते हैं। (2) संयंत्र संरक्षण तंत्र जिसमें नियंत्रण सुरक्षा छड़ों का प्रयोग एवं इंजीनियरी, संरक्षण का अभिकल्पन हैं। (3) रिएक्टर संरोधन (कंटेनमेंट) का प्रबंध।
रेडियोधर्मी द्रव्यों को पर्यावरण में जाने से रोकने के लिए रिएक्टरों में अलग-अलग स्तरों में अवरोध बनाए जाते हैं। पहला अवरोध ईंधन आवरण, दूसरा अवरोध रिक्टर पात्र, तीसरा दोहरे आवरण का अवरोध और चौथा सुरक्षा पात्र और पांचवा संरोधन भवन है। इन अवरोधों से किसी भी तरह की दुर्घटनात्मक परिस्थिति में रेडियोधर्मी द्रव्यों को पर्यावरण में जाने से रोका जा सकता है और जनता की सुरक्षा ठीक तरह की जा सकती है।
भारत के परमाण ऊर्जा कार्यक्रम के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि के तौर पर 500 डॅम प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (च्थ्ठत्) ने 6 अप्रैल 2026 को रात 08ः25 बजे सफलतापूर्वक ‘फर्स्ट क्रिटिकैलिटी’ (नियंत्रित विखंडन श्रृंखला अभिक्रिया की शुरूआत) हासिल कर ली है। यह उपलब्धि दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने और स्वदेशी परमाणु प्रौद्योगिकी क्षमताओं को आगे बढ़ाने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है।
स संजय गोस्वामी
यमुना जी/13, ए नगर, मुॅंबई
