युद्ध के बीच संकट में मानवता

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EDITORS NOTE: Graphic content / TOPSHOT - A man carries a crying child as he walks in front of a building destroyed in an Israeli air strike in Gaza City on October 7, 2023. Palestinian militants have begun a "war" against Israel which they infiltrated by air, sea and land from the blockaded Gaza Strip, Israeli officials said, a major escalation in the Israeli-Palestinian conflict. (Photo by Mohammed ABED / AFP) (Photo by MOHAMMED ABED/AFP via Getty Images)

हमास के विरुद्ध इजरायल के युद्ध का दायरा बढ़ने के साथ अस्पतालों पर हमलों ने तय कर दिया है कि मानवता संकट में है। क्योंकि अब अस्पताल भी सुरक्षित नहीं रह गए हैं। डेढ़ साल से जारी रूस और यूक्रेन की लड़ाई में भी बड़े पैमाने पर स्वाथ्य संस्थानों पर हमले हुए हैं। संयुक्त राष्ट्र ने 21 साल पहले मानवता के विरुद्ध अपराधों पर अंकुश लगाए जाने के नजरिए से युद्ध अपराधियों पर मामले चलाने के लिए 1 जुलाई 2002 को अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय की स्थापना की थी। इसका मुख्यालय नीदरलैंड के हेग में है। इसे युद्ध के अपराध में लिप्त आरोपी व्यक्तियों की जांच के बाद दोषी पाए जाने पर मुकदमा चलाने का अधिकार है।

नरसंहार और मानवता के विरुद्ध किए अपराध को भी यह अदालत संज्ञान में ले सकती है। लेकिन देखने में आया है कि इसके अस्तित्व में आने के बाद बीते दो दशकों में दो देशों के बीच हुए युद्धों के अलावा आतंकी हमलों के अपराधी और आंतकवादियों को घोषित रूप से संरक्षण, शरण, प्रशिक्षण, धन व हथियार देने वाले देशों के खिलाफ यह अदालत कोई ठोस पहल करने में नाकाम ही रही है। जबकि इस दौरान भारत ने तो पाकिस्तान प्रायोजित आंतकी हमले झेले ही, अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और म्यांमार को भी हमलों से दो-चार होना पड़ा है।

साफ है, मानवता को शर्मसार करने वाली इन घटनाओं में अप्रत्यक्ष रूप से देशों की ही भूमिका निहित रहती है। इसीलिए दूसरे विश्व युद्ध के बाद संयुक्त राष्ट्र के पहले जिनेवा सम्मेलन की धारा 18 में कहा गया है कि किसी भी स्थिति में अस्पतालों, चिकित्सकों, नागरिकों और स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं पर हमले नहीं किए जाएं।

लेकिन डाक्टर्स विदआउट बार्डर संगठन के सहायक समन्वयक मिशियल हाफमैन का कहना है कि इन बीस सालों में स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं और सुविधाओं की सुरक्षा गारंटी के सिद्धांत को नजरअंदाज किया जा रहा है। यही कारण है कि युद्ध में घायलों का इलाज नहीं हो पा रहा है और युद्ध शरणार्थियों की संख्या दुनिया में बढ़ रही है। गाजा क्षेत्र से ही युद्ध के चलते 11 लाख लोगों को हाल ही में विस्थापन का दंश झेलना पड़ा है। अनेक देश इन शरणार्थियों को आश्रय देने की वजह से संकटों से घिरते जा रहे हैं।

गाजा पट्टी पर इजरायली हमले और उत्तरी इलाके को खाली करने के हुक्म के बाद गाजा में हाहाकार मचा हुआ है। हर तरफ तबाही का मंजर है। यही स्थिति फिलिस्तीन की है। मिस्र ने शरुआत में विस्थापितों को राफा सीमा पर रास्ता देने से मना कर दिया था। बाद में दवाब पड़ने पर मार्ग खोला, जबकि मिस्र मुस्लिम देश है। इसी बीच जार्डन के राजा अब्दुल्ला ने ऐलान किया है कि वे फिलिस्तीनी शरणार्थियों को आश्रय नहीं देंगे। उन्होंने यह ऐलान बर्लिन में जर्मनी के चांसलर ओलाफ स्कोल्ज़ के साथ एक बैठक में कही। यहां विचारणीय प्रश्न है कि जब मुस्लिम देश ही इन्हें शरण देने से बच रहे हैं। मध्य-पूर्व के देश भी महज बयानबाजी करके फिलिस्तनियों का हित साधना चाहते हैं। हमास जैसे क्रूर आंतकी संगठन के कथित हिमायती देश ईरान, कतर और तुर्की ने भी शरणार्थियों को शरण देने का कोई आमंत्रण नहीं दिया है। ये देश दवा और खाद्यान्न भी उपलब्ध कराने में मदद नहीं कर रहे हैं, जबकि भारत ने राहत साम्रगी की बड़ी खेप फिलस्तीन पहुंचा भी दी है।

यूरोप पहले ही शरणार्थी संकट से जूझ रहा है। बावजूद यूरोपीय देशों में शरणार्थियों के समूह दाखिल हो रहे हैं। इटली ने तो शरणार्थियों को अपनी सीमा पर ही रोकने के लिए बड़ी संख्या में पुलिस की तैनाती कर दी है। जबकि इटली की प्रधानमंत्री जियोर्जिया मेलोनी प्रवासियों की भीड़ से निपटने का वादा कर सत्ता में आई थीं, लेकिन वे इसमें सफल नहीं हो पाई हैं। फ्रांस ने आतंकवाद पर लगाम के लिए कठोर कदम उठाए हैं। शरण के नाम पर फ्रांस में रह रहे 20 हजार से ज्यादा मुस्लिम कट्टरपंथियों को देश निकाला देने की तैयारी शुरू कर दी है। फ्रांस ने यह पहल एक शिक्षक की हत्या के बाद की है। आरोपी युवक मुस्लिम कट्टरवाद से प्रेरित था।

संयुक्त राष्ट्र में शरणार्थियों के मामलों से जुड़े ‘यूनाइटेड नेशन्स हाई कमिशनर और रिफ्यूजी’ (यूएनएचसीआर) की ग्लोबल ट्रेंडस रिपोट्स को जिनेवा में जारी करते हुए संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी के प्रमुख फिलिपो ग्रैंडी ने कहा कि ‘युद्ध, उत्पीड़न और मानवाधिकारों के उल्लंघन के कारण करीब 11 करोड़ लोगों को अपना घर छोड़ना पड़ा है। यह हमारी वैश्विक स्थिति पर कलंक है। 2022 में करीब 1.9 करोड़ लोग विस्थापित हुए, जिनमें से 1.1 करोड़ से अधिक लोगों ने यूक्रेन पर रूस के आक्रामण के चलते अपना घर छोड़ा।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से पहली बार इतनी बड़ी संख्या में लोग जंग के कारण विस्थापित हुए हैं। यह आपात स्थिति का संकेत है। कुछ समय के भीतर ही 35 प्रकार की आपात स्थितियां सामने आई हैं, जो बीते कुछ सालों की तुलना में तीन से चार गुना अधिक हैं। इनमें से कुछ ही मीडिया की सुर्खियां बनी, बांकी नजरअंदाज कर दी गई।

ग्रैंडी ने तर्क दिया कि ‘सूडान से पश्चिम नागरिकों को निकाले जाने के बाद वहां हो रहे संघर्ष की खबर अधिकांश अखबारों से गायब रहीं। सूडान में इस संघर्ष के चलते अप्रैल 2023 के बाद से अब तक 20 लाख लोग विस्थापित हुए हैं। वहीं कांगो गणराज्य, इथोपिया और म्यांमार में संघर्श के चलते करीब 10-10 लाख लोग अपने मूल आवास और देश छोड़ने को विवश हुए है। हालांकि उन्होंने सकारात्मक जानकारी देते हुए संतोष जाहिर किया कि ‘2022 में एक लाख 14 हजार शरणार्थियों का पुनर्वास किया गया, जो 2021 की तुलना में दोगुना है। लेकिन यह संख्या अब भी समुद्र की मात्र एक बुंद के बराबर है। इधर गाजा पट्टी और फिलस्तीन से 11 लाख लोगों को युद्ध के चलते पलायन को मजबूर होना पड़ा है।

संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायोग (एनएचसीआर) ने रूस-यूक्रेन युद्ध के दस दिन पूरे होने के बाद रिपोर्ट दी थी कि हवाई एवं मिसाइल हमलों से बचने के लिए दस लाख से ज्यादा नागरिक यूक्रेन से पलायन कर चुके हैं। बीती एक शताब्दी में इतनी तेज गति से कहीं भी पलायन देखने में नहीं आया है। देश छोड़ने वाले लोगों का यह आंकड़ा यूक्रेन की कुल आबादी का दो प्रतिशत से अधिक है। ये लोग रोमानिया, पोलैंड, मोलडोवा, स्लोवाकिया, हंगरी और बेलारूस में शरण ले रहे हैं। इनमें सबसे ज्यादा 6.5 लाख लोग पोलैंड की शरण में हैं। कुछ लोग निकटवर्ती रूस के सीमा क्षेत्र में भी चले गए हैं। सबसे कम शरणार्थी बेलारूस पहुंच रहे हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि बेलारूस रूस का सहयोगी देश है। विश्व बैंक के मुताबिक 2020 के अंत में यूक्रेन की आबादी 4.4 करोड़ थी। एनएचसीआर ने आशंका जताई है कि यदि हालात और बिगड़ते हैं तो 40 लाख से भी ज्यादा यूक्रेनी नागरिकों को पड़ोसी देशों में शरण लेने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। युद्ध शरणार्थियों ने इससे पहले 2011 में सीरिया में छिड़े गृहयुद्ध के चलते बड़ी संख्या में पलायन का सिलसिला शुरू हुआ था, जो 2018 में अमेरिका द्वारा किए हमले तक जारी रहा था। लेकिन अब युद्ध चलते रहने के डेढ़ साल बाद यूक्रेन के एक लाख दस करोड़ लोग युद्ध शरणार्थी का दंश झेल रहे हैं।

अमेरिका ने अपने मित्र देश ब्रिटेन और फ्रांस के साथ मिलकर सीरिया पर मिसाइल हमला बोला था। सीरिया में मौजूद रासायनिक हथियारों के भंडारों को नष्ट करने के मकसद से 105 मिसाइलें दागी गईं थीं। अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस की ये मिसाइलें राजधानी दमिश्क और होम्स शहरों पर बरसाई गईं थी। इसमें रासायनिक हथियारों के भंडार और वैज्ञानिक शोध केंद्रों को निशाना बनाया गया था। इन हमलों के परिणामस्वरूप कई इमारतों में आग लग गई थी। दमिश्क धुएं के गुबार से ढक गया था। ऐसे ही दृष्य हम आजकल यूक्रेन में रूसी और इजरायल व हमास के हमलों में देखने में आ रहे हैं। हमले में कितनी जनहानि हुई , यह तो आजतक तय नही हुई, लेकिन सीरिया ने इसे अंतरराष्ट्रीय कानून और अपनी संप्रभुता का उल्लंघन बताया था।

वहीं रूस, चीन और ईरान ने कड़ा विरोध जताया था। इनका कहना था कि पहले रासायनिक हथियार रखने और उनका इस्तेमाल किए जाने तथा किसके द्वारा इस्तेमाल किए गए, इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए थी ? अमेरिका ने ईराक पर भी जैविक एवं रासायनिक हथियारों की उपलब्धता संबंधी आशंका के चलते हमला बोला थ। लेकिन बयानबाजी से इतर युद्ध रोकने की ठोस पहल किसी देश ने नहीं की थी। यही गाजा के संदर्भ में दिख रहा है।

करीब साढ़े सात साल चले सीरिया के युद्ध में पांच लाख से भी ज्यादा लोग मारे गए थे। एक करोड़ लोगों ने तत्काल शरणार्थी के रूप में विस्थापन का दंश झेला, इनमें से 67 लाख आज भी अनेक देशों में शरणार्थी बने हुए हैं। ये शरणार्थी जिन देशों में रह रहे हैं, उनमें भी अपनी इस्लामिक कट्टरता के चलते संकट का सबब बने हुए हैं।

जर्मनी ने सबसे ज्यादा विस्थापितों को शरण दी थी। अब यही जर्मनी इनके धार्मिक कट्टर उन्माद के चलते रोजाना नई-नई परेशानियों से रूबरू हो रहा है। दरअसल 7 अप्रैल 2018 को 70 नागरिकों की रासायनिक हमले से मौत के बाद डोनाल्ड ट्रंप ने जबावी कार्यवाही करने का बीड़ा उठाया था। अपनी सनक के चलते इसे उन्होंने अंजाम तक भी पहुंचा दिया था। शायद इसीलिए रूस के उप प्रधानमंत्री आर्केडी वोरकोविच ने तब ट्रंप को जवाब देते हुए कहा था कि ‘अंतरराष्ट्रीय संबंध एक शख्स के मिजाज पर निर्भर नहीं होने चाहिए?’ लेकिन रूस ने यूक्रेन पर हमला करके अमेरिका का ही अनुकरण किया है। दरअसल रासायनिक हमले में सरीन और क्लोरीन गैस का प्रयोग किया जाता है। नतीजतन इसके प्रभाव में आने वाले व्यक्ति की कुछ ही समय में मौत हो जाती है। लेकिन यूक्रेन से छिड़े युद्ध में ट्रंप जैसा मिजाज ब्लादिमीर पुतिन भी दिखा रहे हैं और शक्तिषाली अमेरिका जैसे देश इस आग में घी डालने का काम कर रहे हैं।

यूक्रेन की एनएचसीआर प्रतिनिधि कैरोलिना ने कहा है कि ‘दुनिया उन लोगों के आंकड़ों पर गौर कर रही है, जिन्होंने पड़ोसी देशों में शरण ली हुई है, लेकिन यह समझना जरूरी है कि प्रभावित लोगों की सबसे बड़ी संख्या यूक्रेन के भीतर अभी भी मौजूद है। हमारे पास इन आंतरिक विस्थापित नागरिकों के कोई विश्वसनीय आंकड़े नहीं हैं। एनएचसीआर का अनुमान है कि लाखों लोग देश के भीतर ही विस्थापन का दंश और दहशत झेलने को विवश हैं, जो फिलहाल किसी तरह अपने प्राण बचाने की जद्दोजहद से जूझ रहे हैं।

संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी की वैष्विक रिपोर्ट की मानें तो 20 साल पहले की तुलना में विस्थापन का संकट दोगुना बढ़ गया है। 2019 तक आंतरिक रूप से विस्थापितों की कुल संख्या 4 करोड़ 13 लाख थी। इनमें से 1 करोड़ 36 लाख लोग ऐसे हैं, जिन्हें 2018 में ही विस्थापन का दंश झेलना पड़ा था। यह सही है कि विकसित या पूंजीपति देश अपने वर्चस्व के लिए युद्ध के हालात पैदा करते हैं, जैसा कि हम यूक्रेन के परिप्रेक्ष्य में अमेरिका और रूस के वर्चस्व की लड़ाई देख रहे हैं।

ये वही देश हैं, जिन्होंने 1993 तक तीसरी परमाणु शक्ति रहे देश यूक्रेन को 1994 में बुडापेस्ट परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर कराकर उसके सभी परमाणु हथियार समुद्र में नष्ट करा दिए थे। अमेरिका और ब्रिटेन ने यूक्रेन को इस समझौते के लिए राजी किया था और इन्हीं देशों के साथ रूस ने भी सहमति जताते हुए यूक्रेन की सुरक्षा की गारंटी ली थी। लेकिन अब रूस ने सीधा यूक्रेन पर हमला बोल दिया और अमेरिका व ब्रिटेन दूर खड़े रहकर न केवल तमाशा देख रहे हैं।

इसी तरह से आतंकवादी संगठन हमास को ईरान जैसे मुस्लिम देशों ने उकसाया, हथियार एवं तकनीक हासिल कराए और इजरायल पर हमला बोल दिया, जिसमें निर्दाेष नागरिक मारे गए। अब हमास और फिलस्तीन इजरायल की आक्रामकता झेल रहे हैं, लेकिन उकसाने वाले देश मदद को आगे नहीं आ रहे हैं।

जबकि वे भारत और अन्य अमीर देश हैं, जो सबसे ज्यादा युद्ध व पर्यावरण शरणार्थियों को शरण देते हैं। 2015 में सीरिया में जो हिंसा भड़की थी, उससे बचने के लिए लाखों लोगों ने जान जोखिम में डालकर भूमध्य सागर को महिलाओं व बच्चों के साथ पार किया और ग्रीस एवं इटली में शरण ली थी। इन दोनों देशों ने तब कहा था कि समय के मारे शरणार्थियों को आश्रय देने की नीति बनाई जाना आवश्यक है। वेनेजुएला में राजनीतिक और आर्थिक अस्थिरता के चलते चालीस लाख से ज्यादा लोगों ने पलायन किया था। इनमें से बमुश्किल पांच लाख लोग ही औपचारिक शरणार्थियों के दर्जे में हैं। युद्ध एवं गृहयुद्ध के हालातों के चलते सबसे ज्यादा सीरिया के 67 लाख, अफगानिस्तान के 27 लाख, दक्षिण सूडान के 23 लाख, म्यांमार के 11 लाख और सोमालिया के 9 लाख लोग शरणार्थियों के रूप में विभिन्न विकसित देशों के सीमांत इलाकों में शरण लिए हुए हैं। भारत में बांग्लादेश और म्यांमार के गृहयुद्ध से पलायन किए करीब चार करोड़ लोगों ने घुसपैठ की हुई है। भारत इनकी धार्मिक कट्टरता का संकट भी झेल रहा है। स्थानीय संपदा पर वर्चस्व जमाने के चलते मूल भारतीय नागरिक और इनके बीच खूनी संघर्ष भी देखने में आते हैं।

संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी की 2019 में आई रिपोर्ट के मुताबिक कुल सात करोड़ 95 लाख विस्थापितों में से 4 करोड़ 57 लाख घरेलू सांप्रदायिक, नस्लीय, जातीय हिंसा और पर्यावरणीय एवं प्राकृतिक आपदाओं के कारण अपने ही देश में विस्थापन का दंश झेल रहे हैं। इसे जीवन की विडंबना ही कहा जाएगा कि ताकतवर देशों की सनक के चलतेे कमजोर देश पर युद्ध थोपे जाएं और लाखों लोग शरणार्थी का अभिशापित जीवन जीने को विवश हो जाएं। उन विस्थापितों पर क्या गुजरती होगी, जो अपना आबाद घर व्यवस्थित रोजगार और जमीन-जायदाद छोड़कर किसी अन्य देश के शरणार्थी शिविरों में अपने मूल देश की राह टकटकी लगाए देखते रहने को मजबूर कर दिए गए हों? ये हालात पूरी मानवता के लिए परेशानी का सबब हैं।
स प्रमोद भार्गव