विज्ञान, अभियांत्रिकी व तकनीकी के अनेक क्षेत्रों में समाज अथवा विभिन्न पदार्थों को आपस में जोड़ने की आवश्यकता अनिवार्य होती है और सम्पूर्ण इकाई की कार्यक्षमता व सेवाकाल का आंकलन जोड़ के गुणधर्मों पर ही निर्भर करता है। दो पदार्थों को जोड़ने की गलनीय वेल्डिंग, ब्रेजिंग व सोल्डरिंग (टकाई) जैसी प्रचलित विधियों की अपनी मर्यादाएं हैं, अतः इनका कार्य क्षेत्र भी कुछ सीमित पदार्थों के बीच ही सिकुड़ा हुआ है। पदार्थों को जोड़ने की अनोखी व नयी तकनीक, ‘विसरण जुड़ाई’ द्वारा विभिन्न गुणधर्मों व आकार वाले पदार्थों के परस्पर जोड़ बहुत कम लागत में, बगैर किसी प्रदूषण समस्या के संभव हैं। परीक्षण के आधार पर विसरण जोड़ को अन्य विधियों से बनाए गए जोड़ की तुलना में हर तरह से श्रेष्ठ पाया गया है। इस अनोखी विधि का हमने अपनी प्रयोगशाला में विकास व प्रयोग किया है। जरकलाॅय-जरकलाॅय व स्टेनलेस स्टील के बीच इस विधि द्वारा बनाया गया जोड़ हमारे देश की नाभिकीय भट्ठी में व्यावहारिक रूप से उपयोगी होने जा रहा है। प्रस्तुत लेख में विसरण जुड़ाई के विभिन्न पहलुओं और इसकी अपार उपयोगिता पर संक्षेप में प्रकाश डाला गया है।
आधुनिक अभियांत्रिकी में दो भिन्न अभिलक्षणिक पदार्थों को जोड़ने की आवश्यकता होती है। यह आवश्यकता सामान्य क्षेत्रों से लेकर नाभिकीय, अंतरिक्ष जैसे प्रगत क्षेत्रों में भी होती है। उदाहरण के तौर पर रसोई में स्टेनलेस स्टील के बर्तन उपयोग में लाए जाते हैं, जो साफ-सुथरे, संक्षारण प्रतिरोधक एवं पकाये जाने वाले पदार्थों पर अभिक्रियाहीन होते हैं। परन्तु स्टेनलेस स्टील का, ऊष्मा का अच्छा चालक न होने के कारण काफी मात्रा में ईंधन की खपत होती है। ईंधन की बचत करने के लिए ऐसे स्टेनलेस स्ील के बर्तनों के निचले हिस्से में तांबे जैसे ऊष्मा के सुचालक की परत लगा दी जाती है। उसी प्रकार नाभिकीय रिएक्टरों के क्रोड में न्यूट्रान गुणधर्मों के लिए जिलकालाय का प्रयोग होता है।
जिरकालाय स्टेनलेस स्टील की अपेक्षा मंहगा है। इसलिए क्रोड के बाहर स्टेनलेस स्टील का प्रयोग होता है और जिरकालाय को स्टेनलेस स्टील से जोड़ने की आवश्यकता होती है। जोड़े जाने वाले पदार्थों के भौतिक, रासायनिक तथा यांत्रिक गुण पूर्णतः भिन्न होते हैं। दो पदार्थों को जोड़ने की गलनीय वेल्डिंग, ब्रेजिंग जैसी प्रचलित विधियों की कुछ सीमाएं होती हैं और ये इन भिन्न गुणधर्मीय पदार्थों को जोड़ने के लिए उपयुक्त नहीं है। ऐसे पदार्थों की गलनीय वेल्डिंग करने पर गलन क्षेत्र में भंगुर धातुक संयुक्तों का निर्माण होता है, जिससे जोड़ों के बल का ह्रास होता है। इन पदार्थों के तापीय प्रसार गुणांक में काफी अंतर होने एवं स्फटिक संरचना में अंतर होने से जोड़ों में अवशिष्ट तनाव रहता है, जिससे उनको ठंडा करने पर जोड़ों में दरारें पड़ने की संभावना होती है। अत्यंत छोटे भिन्न गलनांक वाले पदार्थों को जोड़ने के लिए भी गलनीय वेल्डिंग का प्रयोग नहीं किया जा सकता है। इन कठिनाईयों को दूर करने के लिए एक नई तकनीक, जिसे विसरण जुड़ाई कहते हैं, का विकास हुआ है।
विधि
विसरण जुड़ाई एक ऐसी विधि है, जिसमें जोड़ने जाने वाले पदार्थों को उच्च तापमान और दाब पर अपेक्षित समय तक रखने से सम्पर्क सतह पर विसरण होकर जोड़ का निर्माण होता है। विसरण जोड़ का निर्माण एक निर्वात तत्प दाब क्षेत्र में सम्पन्न होता है। जोड़े जाने वाले पदार्थों की सतहों को 01 माइक्रोमीटर तक परिमार्जित किया जाता है। एक निर्वात कक्ष में सज्जित सतहों को सम्पर्क में रखा जाता है।
पदार्थों पर द्रवचालित पद्धति से दबाव दिया जाता है। सम्पर्क सतह के रिक्त स्थानों को भरने तथा सुदृढ़ सम्पर्क बनाने के लिए पर्याप्त दाब दिया जाता है। भट्ठी का तापमान शीघ्र गलीय घटक के गलनाक के 50 प्रतिशत से 70 प्रतिशत तक बढ़ाया जाता है। संघटक को इस दाब तथा तापमान पर यथा आवश्यक समय तक रखा जाता है। इतने समय में सम्पर्क सतह के आरपार परस्पर विसरण हो कर जोड़ बन जाता है।
विसरण जोड़ तीन विधियों से बनाए जा सकते हैं- (1) ठोस अवस्थीय विसरण जोड़ (2) परिवर्तनीय द्रवण क्रांतिक तरल प्रावस्थीय जोड़ तथा (3) परिवर्तनीय तरल तरल प्रावस्थीय जोड़।
ठोस अवस्थीय विसरण जोड़ प्रणाली
इस प्रणाली में दोनों पदार्थ ठोस अवस्था में होते हैं। जब दोनों धातुओं में परस्पर विसरण होता है, तब उनके रासायनिक गुणधर्मों के अनुसार ठोस विसरण बनता है या अंतराधातुक संयुक्त बनते हैं। ये अंतराधतुक संयुक्त भंगुर होते हैं तथा विसरण क्षेत्र में धारियों में बनते हैं। इन संयुक्तों के निर्माण से जोड़ कमजोर होता है। प्रावस्था आरेख देखकर कुछ स्थितियों में योग्य तापमान पर जोड़ने की क्रिया करने से या योग्य अंतस्था परतों का प्रयोग करके इन अंतराधातुक संयुक्तों का बनना रोका जा सकता है। इन परतों का चयन उनकी विसरणशीलता एवं प्रावस्था आरेखों का अध्ययन करके किया जाता है।
इसके अलावा कुछ अन्य परिस्थितियों में भी अंतस्थ परतों का प्रयोग अनिवार्य होता है। उच्च तापीय मिश्र धातु, टूल, स्टील जैसे बहुत कठोर पदार्थों की सतह को सामान्य दाब से समतल बनाना असंभव होता है। इन परिस्थितियों में सहज विसरौण परतों का उपयोग करके सतह के रिक्त स्थानों को भरकर सुदृढ़ सम्पर्क बनाते हैं। जोड़े जाने वाले दोनों पदार्थों के तापीय प्रसार गुणांक में यदि अधिक अंतर हो तो मध्यवर्ती तापीय प्रसार गुणांक वाली परत का उपयोग करके जोड़ों में अवशिष्ट तनाव कम करते हैं।
मूल तत्वों के विसरण से मूल पदार्थों की रासायनिक रचना बदल सकती है। योग्य अंतस्थ परत को विसरण अवरोध के रूप में प्रयोग करके अवांछनीय मूल तत्वों का हानिप्रद विसरण रोका जा सकता है। जोड़े जाने वाले पदार्थों परस्पर विसरण असंभव हो तो ऐसे पदार्थ की परत काम में लायी जाती है, जिसका दोनों मूल पदार्थों में परस्पर विसरण संभव हो।?
इस प्रणाली में सतह की पूर्व सज्जा आवश्यक है और यह जोड़ साधारण तापमान पर तथा लम्बे समय के लिए करते हैं, जिससे विसरण में सुविधा होती है।
परिवर्तनीय द्रवण क्रांतिक तरत प्रावस्थ्यी जोड़ प्रणाली
इस प्रणाल में जोड़ने की क्रिया को निम्नतम द्रवण क्रांतिक गलन तापमान से ऊपर के तापमान पर सम्पन्न किया जाता है। इस विधि में सम्पर्क सतह पर द्रवण क्रांतिक द्रव तैयार होता है। द्रवण क्रांतिक अभिक्रिया से अंतरा-धातुक संयुक्तों का निर्माण होता है। परन्तु अभिक्रिया कम समय में पूर्ण होने से अंतराधातुक संयुक्त कम मात्रा में तैयार होते हैं। इसके अलावा ये संयुक्त धारियों में बनने की अपेक्षा द्रवण क्रांतिक द्रव में बिखरे हुए होते हैं। इससे जोड़ों को प्रबलता मिलती है। प्रयोग में लाए गए दाब से ज्यादातर द्रव निष्काषित किया जाता है।
इससे संयुक्तों की मात्रा और कम हो जाती है। यद्यपि इस विधि में ठोस अवस्थीय जोड़ प्रणाली की अपेक्षा उच्च तापमान लगता है, परन्तु तरल अवस्था में शीघ्र विसरण के कारण क्रिया प्रायः कम समय में पूर्ण होती है। इस विधि में सतह की पूर्व सज्जा आवश्यक नहीं होती। जटिल एवं अनियमित ज्यामितीय आकार की वस्तुओं पर एक समान दाब देना असंभव होता है। ऐसी वस्तुओं को इस प्रणाली से जोड़ा जा सकता है। इस विधि में तैयार हुआ द्रव रिक्त स्थानों में बहकर उत्तम सम्पर्क बनाता है और एक अच्छा जोड़ तैयार होता है।
परिवर्तनीय तरल प्रावस्थीय जोड़ प्रणाली
अंतराधातुएं, दुर्गलनीय धातु जैसे उच्च तापीय पदार्थों को जोड़ने के लिए यह विधि काम में लाई जाती है। ऐसे पदार्थों को ठोस अवस्थ्यीय प्रणाली में जोड़ने के लिए काफी उच्च तापमान की आवश्यकता होती है। इस विधि में कम तापमान पर पिघलने वाली अंतस्थ परत का प्रयोग किया जाता है। परत पिघलने से सतह पर योग्य सम्पर्क बनता है तथा दाब के कारण ज्यादातर द्रव निष्कासित किया जाता है और कम तापमान पर एक अच्छा जोड़ बनता है।
परीक्षण
विसरण जोड़ों की संरचनात्मक एकरूपता, रिसाय दृढ़ता एवं यांत्रिक सामथ्र्य की जांच की जाती है। इन गुणधर्मों को जांचने के लिए जोड़ों पर विविध परीक्षण किए जाते हैं।
अपर्याप्त सज्जा या दाब के कारण जोड़ की सतह पर धातुप्राणीद, ग्रीज, बाह्य कण आदि रह जाते हैं और अंततः विसरण क्षेत्र में प्रवेश करते हैं। इससे जोडों में दरारें पड़ती हैं तथा अपर्याप्त विसरण होता है। फलतः जोड़ कमजोर हो जाते हैं। जोड़ों की धातुकर्मीय अनुरूपता, दरारें, रंध्रों, बाह्यकणों या अंतराधातुक संयुक्तों के निर्माण को जांचने के लिए अनुप्रस्थ परिच्छेद का प्रकाशीय सूक्ष्मदर्शी और क्रमवीक्षण इलेक्ट्रान सूक्ष्मदर्शी द्वारा अवलोकन किया जाता है।
जोड़ों की सतह के आर-पार विसरण की मात्रा नापने के लिए तथा अंतराधातुक संयुक्तों के निर्माण की जांच करने के लिए ऐसी सतहों का इलेक्ट्रान प्रोव सूक्ष्म विश्लेषक द्वारा अध्ययन किया जाता है। जोड़ों की रिसाव दृढ़ता की जांच हीलियम रिसाव परीक्षण द्वारा की जाती है। जोड़ों से बनाई गई नलिका को वायुरहित करके उस पर हीलियम का स्प्रे किया जाता है। द्रव्यमान स्पेक्ट्रोस्कापी द्वारा हीलियम का रिसाव नापा जाता है। जोड़ों का बल निर्धारित करने के नमूने का निर्माण किया जाता है। नमूने के निर्माण में यह ध्यान दिया जाता है कि जोड़ नमूने की लम्बाई के मध्य में हों।
विसरण जोड़ स्वचालित पद्धति से बनाए जा सकते हैं। उत्पादन के दौरान परिसमाप्त रिसाव दृढ़ता के लिए परीक्षण किया जाता है। विसरण जोड़ों में दोषों की संख्या अति अल्प (0.01 – 0.001ः तक) होने से इनकी जांच सामान्य क्ष-किरण या गामा किरण उपकरणों द्वारा नहीं की जा सकती। अतः इनका परीक्षण पराश्रव्य तरंगों से किया जाता है। वेधी द्रव, भंवर धारा या चुंबकीय कण ऐसे अन्य अविनाशी परीक्षणों से भी जोड़ों की संरचनात्मक एकरूपता परखी जा सकती है।
अनुप्रयोग
समान अथवा भिन्न पदार्थों को जोड़ने के लिए विसरण जुड़ाई का प्रयोग किया जा सकता है। सिमेंटित कार्बाइड को दूसरे सिमेंटित कार्बाइड से या स्टील के आधार से इस विधि द्वारा जोड़ा जा सकता है। परिक्षेपित कार्बाइड्स का विसरण न होने से सिमेंटित कार्बाइड की अपनी रासायनिक स्थिति बनी रहती है। सरंध्री सेरेमेटों की विशाल वस्तु के निर्माण के लिए एक सरंध्री सेरमेट को वैसे ही दूसरे सरंध्री सेरमेट से या ठोस धातु के आधार से जोड़ा जाना इस विधि से संभव है। आधुनिक अभियांत्रिकी में अर्धचालक, फेराइटस, कांच, सिरेमिक्स, ग्रेफाइट आदि पदार्थों को धातु या मिश्रधातु से जोड़ने की आवश्यकता होती है।
इन पदार्थों को विसरण जुड़ाई की विधि से उत्तम तरके से जोड़ा जा सकता है। जब पदार्थों की रासायनिक रचना, स्फटिक रचना और बनावट महत्वपूर्ण होती है, जैसे कि नाभिकीय रिएक्टरों में जिरकालाय जिकालाय की, ऐसे समय जिकोनियम भौतिक विज्ञान के लिए महत्वपूर्ण है।
स संजय गोस्वामी
यमुना जी/12, अणुशक्ति नगर, मुॅंबई-94
