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सोयाबीन से कैंसर विशेषज्ञों की खामोशी?
01-09-2014

सोयाबीन को कोई जादुई अन्न समझ कर अंधविश्वास में उठाए जा रहे सरकारी कदम इस देश को गहरे संकट की ओर ले जा रहे हैं, जिसकी कल्पना भी करना असम्भ्व है। दुख का विषय यह है कि इस ओर ध्यान आकर्षित करने के बाद भी सरकारी वैज्ञानिक इस सच को स्वीकार करने की बात तो दूर उसको सुनने और समझने को भी तैयार नहीं हैं। 

पोषक नहीं रोगजनक

आज देश में सोयाबीन के साथ यही हो रहा है। हमारे वैज्ञानिक न जाने क्यों सोयाबीन को ऐसा अनाज बताने में लगे हैं, जो देश की कुपोषण से लेकर सारी समस्याओं का हल सोयाबीन में खोज रहे हैं, जबकि सच्चाई यह नहीं है।

सोयाबीन का साधारण अनाज की तरह दैनिक आहार में उपयोग हानिकारक है। सोयाबीन के सेवन से स्वास्थ्य पर विपरीत असर को लेकर नए-नए शोध सामने आ रहे हैं। सबसे बड़ा खतरा तो कैंसर जैसे असाध्य रोगों का है। देश में कैंसर जैसे  असाध्य रोगों के मरीज बढ़ रहे हैं, पर इनके कारणों की गहराई में जाने को कोई तैयार नहीं है। वास्तव में देखा जाए तो कैंसर के विशेषज्ञ आनकालोजिस्ट की चुप्पी ही कैंसर रोग को बढ़ा रहा है। आज सोया प्रोटीन और सोया आइसोफ्लेवन की खुराक को कैंसर के जादुई उपार के रूप में आगे बढ़ाया जा रहा है। बीमारियों से मौत में कैंसर सबसे बड़ा कारण बन रहा है। उसमें मरीजों को सोयाबीन के उपयोग सलाह देना खतरे से खाली नहीं है।

कैंसर को बढ़ावा

कई अध्ययन सामने आ रहे हैं, जो यह बतलाते हैं कि सोयाबीन कैंसर के उपचार का नहीं, बल्कि उसको बढ़ाने का कार्य करता है। सन् 2005 में अमेरिका की सोया उत्पादन बनाने वाली व्यावसायिक कम्पनी सोले ने वहाॅं के खाद्य और औषधि प्रशासन से अपने सोया उत्पादन को कैंसर के रोकथाम में सहायक के रूप में प्रचारित करने की अनुमति मांगी थी। उसके दावे पर व्यापक अध्ययन हुआ और अमेरिकी एफडीए की प्रयोगशाला के वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन में इस दावे पर संदेह व्यक्त किया और सोसाबीन के अधिक उपयोग को स्वास्थ्य के लिए खतरा होने की आशंका जताई। उसके बाद उस कम्पनी को अपना दावा वापस लेना पड़ा।

सच्चाई यह है कि सोयाबीन को लेकर हो हो-हल्ला मचा है वह खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों व सरकारी एजेंसियों की मिलीभगत से फैले भ्रष्टाचार का नतीजा है। हमारे बुजुर्ग जानते हैं कि सोयाबीन की कहानी बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में सामने आई, जब बड़े उद्योगों ने उसे कमाई का बड़ा जरिया बनाना शुरू किया। सरकारी  अधिकारियों की सांठ-गांठ से इस कागजी खेल में किसान और जनता फंसती जा रही है।

विशेषज्ञों की खामोशी

नागपुर की एकेडमी आफ न्यूट्रीशन इम्प्रूव्हमेंट ने जनता, सरकार एवं वैज्ञानिकों का ध्यान आकर्षित करने का प्रयास शुरू किया। एकेडमी ने इस सम्बन्ध में दुनियाभर में हो रहे अनुसंधानों और पीड़ित लोगों के अनुभवों का अध्ययन और विश्लेषण किया। सोयाबीन के इसी पक्ष को लेकर हाल ही में अमेरिका की वैज्ञानिक डाॅ. कायला डी. डेनियल की पुस्तक की ओर उनका आकर्षित किया। यहां तक कि उस पुस्तक की प्रतियों को सभी को उपलब्ध कराई। महाराष्ट्र मेडिकल कौंसिल के चेयरमैन डाॅ. किशोर टावरी ने तत्काल प्रतिक्रिया दी और इंडियन कौंसिल आफ मेडिकल रिसर्च को पत्र लिख कर पुस्तक के तथ्यों पर विचार का आग्रह किया, लेकिन बाकी लोगों की चुप्पी आश्चर्यजनक है।

सोयाबीन तेल व प्रोसेस्ड एवं प्रिज्वर्ड फूड सहित भारतीय स्थानिक आहार को अपनाने से देश में कैंसर का रोग बढ़ रहा है। आजादी के करोड़ों वर्षों पूर्व काल तक परम्परागत भारतीय भोजन, संस्कृति व समाज व्यवस्था को अपनाने से समस्त प्राणी जाति को असाध्य रोगों से दूर रखा था। इस तरह का आनकोलाजिस्ट द्वारा व्यवहार करना दुख है। एकेडमी आफ न्यूट्रीशन इम्प्रूवमेंट के वैज्ञानिक यह बतलाना चाहते हैं कि वे सोयाबीन, सोयाबीन प्रोडक्ट व सोयाबीन के नाम से बनी दवाईयों का उपयोग नहीं करके कैंसर को रोकने में मदद कर सकते हैं।

स डाॅ. शांतिकाल कोठारी

अध्यक्ष- एकेडमी आफ न्यूट्रीशन इम्प्रूव्हमेंट, सोयामिल्क काम्पलेक्स, वर्धा रोड, सीताबर्डी, नागपुर-440012

 

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