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नई तकनीकी
हाई-स्पीड इंटरनेट के जनक पालराज को ‘नोबल’
(01-05-2014)

अमरीका के स्टैनफर्ड यूनिवर्सिटी में काम कर रहे भारतीय मूल के प्रोफेसर वैज्ञानिक आरोग्यास्वामी जोसेफ पालराज को वायरलेस तकनीक में उनके सहयोग के लिए साल 2014 का मारकोनी पुरस्कार दिया गया है। इस पुरस्कार को आम बोलचाल की भाषा में टेकनोलाजी नोबेल भी कहा जाता है।

पुरस्कार देने वाली मारोकनी सोसाइटी का कहना है कि सिगनल रिसीव और ट्रांस्मिट करने के लिए एक से ज्यादा एंटीना का प्रयोग करने की प्रोफेसर पालराज की थ्योरी आज की आधुनिक हाई स्पीड वाई-फाई और 4जी तकनीक की जान है।

संस्था के अध्यक्ष प्रोफेसर सर डेविड पेन ने कहा, ‘‘वायरलेस तकनीक के क्षेत्र में पाल (प्रोफेसर पालराज) का अभूतपूर्व योगदान है और इससे इंटरनेट यूजर्स को जो फायदा पहुंचा है उस पर किसी को शक नहीं है। हर वाई-फाई राउटर और 4जी फोन में पाल की मीमो (MIMO) टेक्नोलाजी का प्रयोग होता है।’’

4जी और वाई-फाई तकनीक

सर डेविड पेन का कहना है कि प्रोफेसर पालराज के काम ने हजारों नए रिसर्चरों को शोध की एक नई दिशा दी है। प्रोफेसर पालराज कहते हैं, ‘‘मीमो तकनीक का प्रयोग 4जी मोबाइल और वाई-फाई में हो रहा है। इस तकनीक को पाने के लिए दुनियाभर के हजारों रिसर्चर और इंजिनियरों ने मदद की। उनके सहयोग के मुकाबले इस तकनीक को मेरा सहयोग काफी छोटा है।’’

प्रोफेसर पालराज की जीवन कहानी भी कम रोचक नहीं है। आरोग्यास्वामी जोसेफ पालराज का जन्म तमिलनाडु के कोयंबटूर में हुआ था। भारत में जन्में प्रोफेसर पालराज शुरू से ही एक अच्छे विद्यार्थी थे और सिर्फ 15 साल की आयु में ही उन्होंने स्कूल की पढ़ाई पूरी कर ली थी। मारकोनी सोसाइटी के अनुसार पढ़ाई के बाद पालराज कुछ समय के लिए भारतीय नौसेना में भी शामिल हुए। उन्होंने नौसेना की इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग ब्रांच में जाने का निश्चय किया। उन्हें नौसेना में हथियारों के नियंत्रण का काम मिला, लेकिन उनका मन कुछ नया करने का था। उन्होंने नियंत्रण तकनीक, संचार और सिगनल सिस्टम के बारे में आगे की पढ़ाई शुरू की।

नौसेना से आईआईटी

पालराज के काम से नौसेना में उनके वरिष्ठ इतने खुश हुए कि साल 1969 में नौसेना ने उन्हें आगे की पढ़ाई (एमएस) के लिए आईआईटी दिल्ली भेज दिया। आईआईटी में भी उनका काम बेहतरीन रहा और वहां के प्रोफेसर पीवी इंदिरेसन ने उन्हें पीएचडी के लिए भर्ती कर लिया। इसके लिए प्रोफेसर पीवी इंदिरेसन ने नौसेना को खुद मनाया। आईआईटी में आगे की पढ़ाई के इस मौके ने पालराज की जिंदगी बदल दी।

उन्हें पढ़ने देने का फल भारतीय नौसेना को भी मिला। मारकोनी सोसाइटी के अनुसार 1971 में पाकिस्तान के साथ युद्ध में भारतीय नौसेना की ‘सोनार’ तकनीक में भी खामियां पता चली। पालराज ने इस तकनीक पर काम किया और सिगनल प्रोसेसिंग की कई नई थ्योरी की खोज की। तीन साल बाद ही इस तकनीक को भारतीय नौसेना के बेड़ों में इस्तेमाल किया गया।

मारकोनी सोसाइटी के मुताबिक, भारतीय नौसेना से सेवानिवृत एडमिरल आरएच ताहिलियानी ने कहा, ‘‘भारतीय नौसेना पालराज की उपलब्धियों पर गौरवांवित महसूस करती है और एपीएसओएच सोनार के क्षेत्र में उनके किए कार्य के लिए हमेशा उनकी शुक्रगुजार रहेगी।’’ रेडियो की खोज करने वाले गुगलिएल्मो मारकोनी के नाम पर ये पुरस्कार हर साल दिया ऐसे लोगों को दिया जाता है जिन्होंने संचार और सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में कोई बड़ा काम किया हो, जिससे सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक क्षेत्र का उद्धार हुआ हो। (बीबीसी न्यूज)

प्रीती सिंह

वीर सावरकर नगर, हीरापुर, रायपुर (छ.ग.)

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