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आवरण आलेख
उज्ज्वला योजना में भारत का उज्ज्वल भविष्य
(01-10-2017)

भारत की लगभग 40 फीसदी आबादी इतनी गरीब है कि वह रसोई गैस नहीं खरीद सकती। शहर व गांवों में रहने वाले करीब 40 करोड़ लोगों के परिवार को भोजन बनाने के लिए लकड़ी या कोयले की जरूरत रोज होती है। ऐसे गरीब परिवारों को लकड़ी मुहैया करवाने के लिए पेड़ लगातार काटे जा रहे हैं। ग्रामीण इलाकों के अधिकांश पेड़ ईंधन के लिए कट जाते हैं। शहरी क्षेत्र के परिवार भी गांवों पर आश्रित होते हैं, जहाॅं के छोटे-छोटे बाजार में लकड़ियां लाई जाती हैं। घुमन्तु जीवन व्यतीत करने वाले, झुग्गी झोपड़ी में रहने वाले परिवार के लिए लकड़ी, चारकोल एवं जीवाश्म ईंधन पदार्थ ही ईंधन के उपयोग में आते हैं। जंगलों से दूर स्थानों में खासकर कोयला खदानों के समीप के क्षेत्रों में घरेलू ईंधन के लिए कच्चे कोयले की भारी मात्रा में खपत होती है। वहीं शहरी क्षेत्रों में भी विकेटेड कोयले का उपयोग होता है।

लकड़ी, कोयला और प्लास्टिक

ईंधन के लिए लकड़ी, कोयला का उपयोग करने वाले प्लास्टिक का भी उपयोग करते हैं। चूल्हे में आग जलाने के लिए बहुत सारा प्लास्टिक लगता है, जिसके सहारे लकड़ी, कोयला आसानी से सुलग जाता है। जीवाश्म ईंधन का उपयोग करने बहुतेरे लोग प्लास्टिक को जलाते हैं। परिणामतः प्लास्टिक का खतरनाक धुआं हर रोज वातावरण में मिल रहा है।

लकड़ी के कोयले की बजाए पत्थर के कोयले का ज्यादा इस्तेमाल होता है। जिनको जलाने से समूचा वातावरण विषाक्त धुआं से भर जाता है। सुबह और शाम घर-घर जलती कोयले की सिगड़ी से इतना धुआं निकलता है कि उसके पार दिखना बंद हो जाता है। झुग्गी-झोपड़ी के इलाके से ऐसा धुआं हर ओर फैलता रहता है। ठंड के दिनों में कोयला का      धुआं खतरनाक हो जाता है, जिसके कारण स्माॅग की समस्या शुरू हो जाती है। स्माॅग वातावरण के प्रकाश को अवरूद्ध कर देता है, साथ ही हवा में जहरीली गैसों तथा धूल के स्तर को बढ़ा देता है। इस कारण सांस लेने में परेशानी होती है। ऐसे माहौल में रहने वाले सांस सम्बन्धी रोगों के शिकार बन जाते हैं।

चूल्हे के लिए कटते पेड़

भारत में ईंधन के लिए भारी तादाद में पेड़ काटे जाते हैं। ईंधन के लिए ही कई पेड़ लगाए जाते हैं। वहीं जो पेड़ बड़े हो जाते हैं, उन्हें ईंधन जरूरतों के लिए काट दिया जाता है। ईंधन के लिए दबाव इतना बढ़ जाता है कि फलदार वृक्षों को काट दिया जाता है। महुआ, आम, इमली, बेर, तेंदू, चार, डूमर जैसे दीर्घजीवी पेड़ भी ईंधन के लिए काटे जाते हैं, जिसके चलते अनेक फल के पेड़ गांवों से विलुप्त हो चुके हैं। ग्रामीण जरूरतों को पूरा करने उन्हें प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट प्रदान करने वाले कई फलों का उत्पादन ही खत्म हो रहा है। देश के अनेक गांवों में ऐसी ही स्थिति है।

जंगल होगा हरा-भरा

देश के एक तिहाई इलाके में हरीतिमा फैली है। देश के अधिकांश जंगल सरकार द्वारा संरक्षित हैं, जिनमें राष्ट्रीय अभ्यारण्य और संरक्षित वन हैं। वन विभाग का उत्पादन विभाग जंगलों से लकड़ी कटाई का कार्य करता है। ऐसी लकड़ी ईंधन के लिए व विभिन्न उद्योगों के लिए काम आती है। वन क्षेत्र के समीप बसे गांव के ईंधन की पूर्ति जंगलों से होती है, जो लगातार जंगलों के पेड़ों को ईंधन जरूरतों के लिए काटते रहते हैं। वन विभाग का एक बड़ा अमला लकड़ी चोरी रोकने के काम में लगा रहता है। 

कार्बन उत्सर्जन में कमी होगी

प्रधानमंत्री की उज्ज्वला योजना बहुमुखी लाभ की योजना साबित होगी। देश के हर परिवार को खाना पकाने के लिए रसोई गैस मिल जाएगी तो पेड़ कटने बंद हो जाएंगे। जीवाश्म पदार्थों को ईंधनों के रूप में इस्तेमाल करने में भारत अग्रणी देश है। उज्ज्वला योजना के क्रियान्वयन से जीवाश्मीय पदार्थों से वातावरण में फैलती कार्बन डाईआॅक्साइड पूरी तरह खत्म हो जाएगी। कार्बन डाईआॅक्साइड उत्सर्जन को सर्वाधिक रूप से कम करने में भारत का अभिनव योगदान उज्ज्वला योजना से होगा।  इसका लाभ देश की जनता को होगा। जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव से जो संकट गहरा रहा है, उसमें भारी कमी आएगी। शहर ही नहीं गांवों को भी धुएं से मुक्ति मिल जाएगी। लकड़ी और कोयला का धुआं इतना फैल जाता है कि सांस लेने में तकलीफ होती है। रसोई गैस के उपयोग से वातावरण स्वच्छ होगा। प्राकृतिक आबोहवा में रहने के कारण लोगों के बीच फैलते श्वांस सम्बन्धी रोगों में कमी आएगी। शहरी क्षेत्रों में आसपास के गांवों का धुआं, झुग्गी-झोपड़ी से उठता धुआं लगातार फैलता है। यह शीत ऋतु में खतरनाक स्माॅग बनता है। इसमें अत्यधिक कमी आएगी। 2016 में दिल्ली में ऐसा ही स्माॅग फैला था, जिसके खतरे को देखते हुए सरकार कई कदम उठा रही है।

उज्ज्वला योजना गरीबों के भोजन पकाने की सुविधा प्रदान करेगी। वहीं देश की हरितिमा को नूतन रूप प्रदान करेगी। भोजन पकाने के लिए जब पेड़ ही नहीं कटेंगे, तो वे लगे रहेंगे। देश के कटते जंगल बचे रहेंगे। चोरी छिपे लकड़ी कटाई बंद हो जाएगी। गांवों में लगे पेड़ बढ़ेंगे। खासकर फलदार पेड़ों के होने से फल ग्रामीणों को उपलब्ध होंगे। बढ़ती जनसंख्या की ईंधन जरूरतों के लिए जंगलों पर दबाव बढ़ता जा रहा था। उज्ज्वला योजना के क्रियान्वयन से जंगल फिर से आबाद होने लगेंगे। 

रसोई गैस से स्वच्छ वातावरण

भोजन बनाने के लिए लकड़ी के साथ कई ऐसे पदार्थों का उपयोग किया जा रहा है, जिससे देश की आबोहवा कहीं-कहीं खतरनाक स्तर पर पहुॅंच गई है। खासकर चूल्हा जलाने के लिए प्लास्टिक का इस्तेमाल खत्म हो जाएगा, जो लकड़ी को सुलगाने के लिए उपयोग करते हैं। भारत के अनेक शहर की हवा खतरनाक स्थिति में पहुॅंच चुकी है। लेकिन जीवाश्मीय ईंधन का सर्वाधिक उपयोग करने वाले गांवों की दशा भी शहरों से बदतर है, जहाॅं प्लास्टिक और पत्थर के कोयले भारी मात्रा में इस्तेमाल किए जाते हैं। रसोई गैस पहुंचने से इन सब पर रोक लगेगी और स्वच्छ बयार बहेगी। हवा की विषाक्तता से ग्रामीण जनों में जो रोग पनपते रहे हैं, ऐसी स्थिति पूरी तरह खत्म हो जाएगी।

देश के हर घरों में रसोई गैस पहुॅंचने से महिलाओं को सम्मान देने की महती पहल प्रधानमंत्री ने की है। उज्ज्वला योजना को वैश्विक स्तर पर सम्मान मिलेगा, जिसके क्रियान्वयन से जीवाश्म ईंधन से निकलता कार्बन उत्सर्जन अप्रत्याशित रूप से कम हो जाएगा। वहीं जंगलों व ग्रामों में पेड़-पौधों को संरक्षण मिलेगा। देश में विषाक्त होती हवा काफी हद तक कम हो जाएगी। भारत के उज्ज्वल भविष्य के लिए           प्रधानमंत्री की उज्ज्वला योजना घर-घर पहुॅंचेगी और भारत दुनिया के लिए एक मिसाल बनेगा।

 रविन्द्र गिन्नौरे

पर्यावरण ऊर्जा टाइम्स

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