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विविध आलेख
फुटबाल से लेकर मंगलयान तक विज्ञान की गूंज
(01-03-2015)

समय के साथ कई उपलब्धियाॅं हमारे जीवन के साथ जुड़ जाती हैं। 2014 में हमने क्या हासिल किया, इस पर सिलसिलेवार नजर डालें तो पाएंगे कि समय के साथ हमने एक मुकाम हासिल किया, जो भविष्य में हमारा मार्ग प्रशस्त करेगा।


वर्ष 2014 भारतीय विज्ञान के लिए सफलताओं का साल रहा। अंतरिक्ष में हमारे देश के वैज्ञानिकों ने नया इतिहास रचा। साल के शुरू में 5 जनवरी को स्वदेशी क्रायोजेनिक राकेट जियोसिंक्रोनस सेटेलाइट लांच वेहिकल डेवलपमेंट (जीएसएलवी डी-5) से संचार उपग्रह जीसैट-14 को सफलतापूर्वक विदा किया गया। इस उपलब्धि के साथ भारत दुनिया के उन पांच देशों की बिरादरी में शामिल हो गया, जिनके पास अपना क्रायोजेनिक राकेट है।
नववर्ष की शुरूआत में ही हमारे वैज्ञानिकों ने अपनी विलक्षण प्रतिभा का परिचय दिया। इसी वर्ष के पूर्वार्द्ध में हमें एक और शानदार सफलता मिली। हमने 30 जून को पीएसएलवी सी-23 के जरिए एक साथ पांच विदेशी उपग्रहों को अंतरिक्ष में भेज कर इतिहास रचा। इस अवसर पर   प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अंतरिक्ष वैज्ञानिकों से दक्षेस देशों के लिए उपग्रह विकसित करने का आव्हान किया।
मंगल अभियान सफल
इसी साल 24 सितम्बर को भारत के मार्स आर्बिटर यान ने मंगल ग्रह की कक्षा में प्रवेश किया। इस ऐतिहासिक सफलता पर भारतीय अंतरिक्ष        अनुसंधान संगठन ‘इसरो’ सहित पूरे देश ने खुशी मनाई। 5 नवम्बर 2013 के दिन मंगलयान ने दीपावली पर्व पर हमारी शुभकामनाएॅं लेकर अपनी यात्रा आरंभ की थी।
16 अक्टूबर को पीएसएलवी सी-26 के जरिए आईआरएनएसएस-1 सी उपग्रह का सफल प्रक्षेपण किया गया। दिसम्बर में संचार उपग्रह जी-सैट को विदाई दी गई। 18 दिसम्बर को हमें एक प्रक्षेपण से दो सफलताएॅं मिलीं। जीएसएलवी एमके-3 राकेट का प्रायोगिक प्रक्षेपण और मनुष्य को अंतरिक्ष में ले जा सकने वाले यान का परीक्षण भी सफल रहा।
कानफोकल माइक्रोस्कोप
वैज्ञानिक एवं औद्योगिक              अनुसंधान परिषद (सीएआईआर) की कोलकाता स्थित प्रयोगशाला के वैज्ञानिकों ने कम कीमत का कानफोकल माइक्रोस्कोप बना लिया है। कानफोकल माइक्रोस्कोप वह उपकरण है, जिसका उपयोग सूक्ष्म जीवाणुओं और उनसे होने वाली बीमारियों के अध्ययन के लिए किया जाता है। बाजार में इस प्रकार के माइक्रोस्कोप का मूल्य चार करोड़ रूपए है, जबकि हमारे देश के वैज्ञानिकों ने इसे मात्र डेढ़ करोड़ रूपए में तैयार किया है।
विज्ञान पत्रिका 100 वर्ष की
इसी वर्ष हिन्दी की प्रथम विज्ञान पत्रिका ‘विज्ञान’ का शताब्दी वर्ष मनाया गया। विज्ञान परिषद प्रयाग ने 1915 में इसका प्रकाशन शुरू किया था। इस दौरान विज्ञान की अनेक पत्र-पत्रिकाओं का जन्म और अवसान हुआ, लेकिन विज्ञान अविराम प्रकाशित हो रही है।
दिसम्बर में पेरू की राजधानी लीमा में जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में 190 देशों के प्रतिनिधियों ने कार्बन उत्सर्जन कम करने पर विचार-विमर्श किया। सम्मेलन में सभी देशों ने कार्बन उत्सर्जन कटौती के राष्ट्रीय संकल्प के मसौदे पर सहमति जताई। इसके साथ ही पेरिस में होने वाले महत्वाकांक्षी समझौते का मार्ग प्रशस्त हो गया।
हुदहुद से तबाही
यह वही वर्ष है, जब भारत के पूर्वी तट पर चक्रवाती तूफान हुदहुद ने हलचल मचाई, लेकिन उपग्रहों के जरिए मौसम विज्ञान विभाग पूर्वानुमानों के चलते जन हानि को रोकने में मदद मिली। जानकारों के अनुसार इस वर्ष जम्मू-कश्मीर में भारी वर्षा और परिणामस्वरूप झेलम में आई बाढ़ के कारण हिमालय क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन है। कुछ वैज्ञानिकों ने इस त्रासदी का कारण प्रकृति में हस्तक्षेप और अंधाधुंध विकास को भी माना है।
तारामंडल की जयंती
इसी वर्ष पुणे स्थिति कुसुमबाई मोतीचंद तारामंडल की स्थापना की हीरक जयंती मनाई गई। यह भारत का पहला तारामंडल है, जिसकी स्थापना 18 सितम्बर 1854 को की गई थी। तारामंडल विज्ञान संचार में अहम भूमिका निभा सकते हैं। वर्ष 2014 में कोलकाता के चैरंगी इलाके में स्थित इंडियन म्यूजियम के दो सौ साल पूरे हुए। यह एशिया का सबसे बड़ा बहुआयामी म्यूजियम है, जिसकी स्थापना 2 फरवरी 1984 को की गई थी।
भटनागर पुरस्कार
सीएसआईआर ने वर्ष 2014 के शांतिस्वरूप भटनागर पुरस्कारों के लिए दस वैज्ञानिकों का चयन किया। वर्ष 1957 में स्थापित यह देश का प्रतिष्ठित विज्ञान पुरस्कार है। अभी तक 503 वैज्ञानिकों को शांतिस्वरूप भटनागर पुरस्कार दिया गया है। भारत में इसे नोबेल पुरस्कार जैसी प्रतिष्ठा प्राप्त है।
साहित्य अकादमी पुरस्कर
दिसम्बर में साहित्य अकादमी ने विख्यात वैज्ञानिक व विज्ञान लेखक जयंत विष्णु नार्लीकर को वर्ष 2014 का पुरस्कार देने की घोषणा की। उन्हें यह प्रतिष्ठित सम्मान मराठी साहित्य में आत्मकथा पर केन्द्रित पुस्तक के लिए दिया गया है। जयंत नार्लीकर ने मराठी में कई विज्ञान कथाएॅं लिखी हैं, जिनका हिन्दी में अनुवाद किया गया है। इसी वर्ष साइंस जर्नलिस्ट पल्लव बागला को कृषि विज्ञान पत्रकारिता में उत्कृष्ट योगदान के लिए चैधरी चरण सिंह सम्मान प्रदान किया गया। पल्लव बागला लगभग दो दशकों से प्रतिष्ठित अमेरिकी साप्ताहिक पत्रिका साइंस के संवाददाता और एनडीटीवी में साइंस एडीटर हैं।
क्रिस्टेलोग्राफी वर्ष
पूरे विश्व में 2014 अंतर्राष्ट्रीय क्रिस्टेलोग्राफी वर्ष के रूप में मनाया गया। इसका उद्देश्य आम लोगों के बीच क्रिस्टेलोग्राफी के प्रति जागरूकता बढ़ाना और क्रिस्टेलोग्राफी में शिक्षण और शोध को प्रोत्साहित करना था। क्रिस्टेलोग्राफी की औषधि निर्माण और पदार्थ विज्ञान के अध्ययन में अहम भूमिका है। गुजरा साल दुनिया भर में कुटुम्ब कृषि वर्ष के रूप में मनाया गया। इसे मनाने का उद्देश्य गरीबी कम करने में कुटुम्ब कृषि के महत्व को रेखांकित करना और वैश्विक खाद्य सुरक्षा को बेहतर बनाना था।
बीते वर्ष के उत्तरार्द्ध में यूरोपीय स्पेस एजेंसी का रोसेटा यान एक        धूमकेतु पर सफलतापूर्वक उतरा। अंतरिक्ष विज्ञान के इतिहास में पहली बार धूमकेतु पर पहुॅंचने में सफलता मिली। वैज्ञानिक लगभग दस वर्षों से इस दिशा में प्रयत्नशील थे। यह          धूमकेतु 20 सितम्बर 1969 को खोजा गया था। विदा हो चुके साल में अमेरिका का मोवेन यान भी मंगल ग्रह तक पहुॅंचा। बीते वर्ष पांच अफ्रीकी देशों में इबोला वायरस का आतंक दिखाई दिया। यह वायरस पहली बार 1976 में कांगो गणराज्य में देखा गया था। चिकित्सा वैज्ञानिकों ने अभी तक इसकी पांच किस्मों का पता लगाया है।
नोबल पुरस्कार
गुजरे साल में एक महिला समेत नौ वैज्ञानिकों को नोबेल सम्मान मिला। चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार मस्तिष्क में जीपीएस प्रणाली सम्बन्धी अनुसंधान के लिए तीन वैज्ञानिकों एडवर्ड मोजर, मे-ब्रिट मोजर और जाॅन ओ कीफ को सुयुक्त रूप से प्रदान किया गया। भौतिकी का पुरस्कार नीली एलईडी लाइट की खोज के लिए जापान के इसामू अकासाकी और हिरोशी अमानो और अमेरिका के शूजी नाकामुरा को दिया गया। इस साल का रसायन शास्त्र का नोबेल सम्मान एरिक बेत्जिग, विलियम माएरनर और स्टीफन हेल को मिला है, जिन्होंने अति सूक्ष्म वस्तुओं को देखने के लिए अत्यधिक शक्तिशाली फ्लोरेसेंट सूक्ष्मदर्शी का विकास किया है।
गणितज्ञों का मेडल
वर्ष 2014 में गणित का सबसे बड़ा सम्मान दी फील्ड्स मेडल चार गणितज्ञों को प्रदान किया गया, जिनमें भारतीय मूल के मंजुल भार्गव भी हैं। प्रिंसटन विश्वविद्यालय में प्राध्यापक मंजुल भार्गव ने गणित के क्षेत्र में नम्बर थ्योरी में विशेष योगदान दिया है। पहली बार वैज्ञानिकों ने मानव जीनोम में डीएनए सम्पादन द्वारा एक चूहे की आनुवंशिक चिकित्सा की। जीन सम्पादन की यह तकनीक बीमारियों के लक्षण दूर कर सकती हैं डेनमार्क और चीन के शोधकर्ताओं द्वारा मकड़ी के जीनोम पर शोध में मनुष्य और मकड़ी के जीनोम में कुछ समानता दिखाई दी।
समुद्री एनीमोन के जीनोम के     अध्ययन से पता चला कि यह जन्तु और वनस्पति दोनों के नियामक व्यवहार को दर्शाता है। अतः आनुवंशिकी रूप से यह आधा जंतु और आधा पौधा है। समुद्री एनीमोन फूलों जैसा दिखाई देता है, लेकिन परभक्षी जंतु है। वैज्ञानिकों ने घरेलू मक्खी (मस्का डोमेस्टिका) के जीनोम का अनुक्रम तैयार कर लिया। नेचर पत्रिका में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार वैज्ञानिकों ने एक नई तकनीक द्वारा डीएनए पर स्थित एपीजेनेटिक मार्कर का मानचित्र तैयार किया है। इस अध्ययन से डीएनए पर पर्यावरण के प्रभावों की व्याख्या में मदद मिली है।
चक्रेश जैन
भोपाल (मध्यप्रदेश)

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