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प्रकृति संरक्षण को समर्पित एकमात्र पत्रिका आम आदमी की भाषा में
कृषि तकनीकी
पालीहाउस: पौध रोगों का समेकित प्रबंधन
(01-03-2015)

यद्यपि खुले खेतों की फसलों की तुलना में पाॅलीहाउस में बीमारियों की संख्या कम होती है, परन्तु जब भी बीमारी के बीजाणु पालीहाउस के अनुकूल वातावरण में घुस जाते हैं तो वे बड़ी तेजी से बढ़ते हैं व पौधे की ज्यादा सघनता के कारण तीव्रता से फैलकर फसल को नष्ट तक कर देने की क्षमता रखते हैं।


पिछले कुछ समय से पालीहाउस प्रौद्योगिकी में एक विशेष क्रांति आई है। पालीहाउस में लगने वाली विभिन्न प्रकार की नगदी फसलें जैसे सब्जियाॅं, फूल एवं पौधे इत्यादि की तीव्रीकरण प्रक्रिया के कारण यहाॅं का वातावरण बहुत सी बीमारियों के बीजाणुओं के विकास के लिए अनुकूल होता है, इसलिए किसान इनसे उत्पन्न बीमारियों की वजह से बहुत नुकसान उठा रहे हैं। समुचित लाभ अर्जित करने के लिए पालीहाउस की नगदी फसलों की विभिन्न बीमारियों  की रोकथाम के लिए अभिरक्षक एवं नियंत्रण के तरीकों को अपनाना चाहिए। सबसे पहले पालीहाउस में बीमारियों से संबंधित कारणों को जान लेना आवश्यक है।
संवातन
ज्यादातर पालीहाउस का निर्माण एक सुरंग के रूप में किया जाता है, जिसकी वजह से इनमें संवातन (वेन्टीलेशन) अति सीमित होता है। ऐसे हालात में वायुवाहित बीमारियां बड़ी तेजी से फैलती हैं व इनका नियंत्रण बहुत मुश्किल होता है। सीमित संवातन के कारण अंदर का वातावरण ज्यादा आर्द्र होता है व द्रवण प्रक्रिया के कारण पानी की बूंदे बन जाती हैं। इन बूंदों में बीजाणु शीघ्रता से अंकुरित होते हैं व बढ़ते हैं। अंदर का वातावरण आर्द्र व गर्म होता है, जो बहुतायत से फफूंदों की वृद्धि के लिए बहुत उपयुक्त होता है। ऐसे में बीमारियां तेजी से फैलकर फसलों में बहुत नुकसान पहुॅंचाती है, जैसे मृदुरोमिल आसिता रोग, तना गलन रोग, भूरी आसिता रोग, झुलसा रोग, पर्ण धब्बा रोग इत्यादि।
सिंचाई व्यवस्था
फसलों की उत्पादन क्षमता को बढ़ाने व वातावरण की अति आर्द्रता को कम करने के लिए सुचारू रूप से सिंचाई करना अति आवश्यक है। ज्यादातर सिंचाई खांचा विधि से की जाती है, जिससे पौधे की जड़ों के किनारे आक्सीजन गैस की कमी हो जाती है। इस तरह जड़ रोगों व     सूत्रकृमियों के आक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। पानी की मात्रा भी ज्यादा लगती है व हवा में आर्द्रता भी बढ़ जाती है। अतः इस विधि से पालीहाउस में पानी का सही प्रयोग नहीं हो पाता है। इसके अतिरिक्त सिंचाई की दूसरी प्रणाली है, जिसे ‘ड्रिप प्रणाली’ कहा जाता है। यह आजकल अत्यधिक प्रयोग में लाई जा रही है। इससे पानी का उपयोग सही व प्रभावकारी ढंग से होता है। यदि ड्रिप सिंचाई के साथ-साथ जमीन को घास-पात से ढक दिया जाए तो हवा में आर्द्रता कम हो जाती है, जिससे बीमारियों के बीजाणु तेजी से बढ़ नहीं पाते। कई बार पानी में खाद व कीटनाशकों को भी मिश्रित कर दिया जाता है, जिससे कम खर्चे होने के साथ-साथ खेती की सफलता की संभावनाएॅं काफी बढ़ जाती हैं।
मृदा एवं जल अम्लीयता
मृदा एवं जल में अम्लीयता होने से, पालीहाउस में लगने वाली फसलें बीमारियों के लिए ज्यादा संवेदनशील हो जाती हैं। ऐसी परिस्थितियों में कुछ रोगजनक कवक जैसे फ्यूजेरियम व वर्टीसीलियम इत्यादि रोग अवरोधी किस्मों को भी संवेदनशील बना देते हैं। इसलिए पालीहाउस की मिट्टी व इसमें प्रयोग लाए जाने वाले पानी की जांच सही समय में करवा कर उचित उपचार कर लेना चाहिए।
फफूंदनाशक रसायनों का प्रयोग
अधिकतर पालीहाउसों के मालिक समझते हैं कि ज्यादा से ज्यादा फफूंदनाशक दवाइयों का प्रयोग करने पर ही बीमारियों पर नियंत्रण पाया जा सकता है। कई बार लोग एक फसल पर 10 से 15 बार छिड़काव कर देते हैं। ऐसा करने से लाभ होने के बजाए कई तरह के नुकसान झेलने पड़ जाते हैं। फलों व सब्जियों में जहरीले रसायनों के अवशेष रह जाते हैं, जो खाने वालों के स्वास्थ्य के लिए घातक सिद्ध होते हैं। ये रसायन मिट्टी व वातावरण में भी चले जाते हैं। मिट्टी में मित्रजीवों का नाश करने के साथ-साथ ये पीने वाले पानी में भी मिश्रित हो जाते हैं।
मिट्टी की प्रतिरोधी क्षमता कम हो जाती है। एक जैसी दवाईयों का ज्यादा व नियमित प्रयोग करने के कारण कई रोगजनक बीजाणुओं में रसायनों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती है। ऐसा होने से रसायन का छिड़काव बीमारी का कोई नियंत्रण नहीं कर पाता है। ज्यादा समझ न होने के कारण किसान ज्यादा मात्रा में छिड़काव करता है व बहुत नुकसान झेलता है। पालीहाउस की मिट्टी का ध्रूम्रीकरण करने के अधिकांश व्यक्तियों पर जहरीला असर पड़ता है। इसका प्रयोग कम से कम करना चाहिए व सही जानकार से प्रशिक्षण ले लेना चाहिए।
कृषि विधियाॅं
पालीहाउस में प्रायः कुछ ही फसलों को बार-बार उगाया जाता है, जो नगदी हों। ज्यादातर सब्जी की फसलें आलू-वर्गीय या कद्दू वर्गीय परिवार से संबंधित होती हैं। इसलिए बीमारी के बीजाणु एक फसल से दूसरी फसल में रोग पैदा करते व बढ़ते रहते हैं। इसलिए पालीहाउस में फसल चक्र या पालीहाउस चक्र अपना भी लिया जाए तो भी सफलता नहीं मिल पाती है, क्योंकि अधिकांश वैकल्पिक फसलें रोगजनक सूक्ष्मजीवों के लिए संवेदनशील होती हैं। इसके साथ ही फसलों के बीच में रोगजनक सूक्ष्मजीवों का पोषण करती है, इसलिए इनका नियंत्रण भी जरूरी है। प्रायः वर्टीसिलियम फफूंद घास में निवास करते हैं। इसी तरह दूसरी प्रबंधन प्रणालियाॅं जैसे पौध प्रबंधन फसल के अवशेषों का सही निष्कासन, बीजाई व रोपण का सही समय, रोगरोधी किस्मों का चुनाव, पौधे में उचित दूरी इत्यादि का सही उपयोग नहीं किया जाता है।
बीज की गुणवत्ता
पालीहाउस में लगने वाली फसलों का बीज प्रायः बीज कम्पनियों से आयातित होता है, जो कि अधिकांशतः प्रमाणित होता है। परन्तु, कई बार यह पाया गया है कि कुछ मात्रा में रोगजनक बीजाणु इस बीज में जीवित रहते हैं, जो थोड़े समय में बढ़कर खतरनाक रोग पैदा कर देते हैं, जैसे फ्यूजेरियम इत्यादि। बीज जनक रोग स्वस्थ मिट्टी को भी निष्क्रिय कर देते हैं व इसी तरह बीमारी की नई प्रजातियों के आयात का खतरा भी बढ़ जाता है।                      अधिकांशतः यह भी देखा गया है कि मिट्टी के धूम्रीकरण के बाद बीजजनक रोग ज्यादा नुकसान पहुॅंचाते हैं।
रोगरोधी किस्मों का चुनाव
प्रायः जो किस्में बाजार में            उपलब्ध होती हैं, वे रोगरोधी नहीं होती हैं। इनका प्रयोग तभी किया जाता है, जब वे किसी विश्वविद्यालय या शोध केन्द्र में उपलब्ध हों।
एकीकृत समेकित/रोग   प्रबंधन युकितयाॅं
पालीहाउस में फसलों को रोगों से बचाने के लिए व रोगजनक को नियंत्रण में रखने के लिए एकमात्र उपाय       एकीकृत रोग प्रबंधन है। इस विधि में सभी उपयुक्त तकनीकों को अनुकूल तरीकों से इस तरह प्रयोग में लाया जाता है कि विनाशकारी रोगजनक सूक्ष्म जीवों की संख्या को आर्थिक हानि पहुॅंचाने वाली स्थिति से नीचे रखा जा सके। रोगजनक सूक्ष्म जीवों की जनन स्थिति के आधार पर जिन युक्तियों का चुनाव किया जाता है, वे निम्नलिखित हैं।
(अ) बीजजनित रोग
बहुत सारे रोग बीजजनित होते हैं। जैसे मिर्च व टमाटर का झुलसवा, कई फसलों का फ्यूजेरियम विगलन व बैक्टीरियल रोग। ऐसे रोगों से बचाव के लिए प्रमाणित बीजों की सिफारिश की जाती है, परन्तु ऐसे बीज का रोगरहित होने का दावा भी नहीं किया जा सकता। रोगजनक सूक्ष्मजीवों के आधार पर इस बीज का उपचार बोने से पहले ही कर लेना चाहिए।
(ब) मृदाजनित रोग
बहुत सारे रोगजनक जीवाणु मृदाजनित होते हैं। जैसे राइजोकेनिया, स्क्लैरोटिनिया, फ्यूजेरियम, पीथियम, सूत्रकृमि इत्यादि। इन्हें नियंत्रित करने के लिए रोगरोधी किस्मों का चयन, बीज उपचार, पौधे में उचित दूरी के अलावा मिट्टी का फार्मेलिन या मिथइल ब्रोमाइड से धूम्रीकरण की सिफारिश की जाती है। परन्तु, इस प्रक्रिया के निराशाजनक परिणाम भी हो सकते हैं, जिनका विवरण पहले दिया गया है।
सौर ऊर्जा द्वारा मृदा की आंशिक निर्जीवीकरण प्रक्रिया, एक आशाजनक तकनीक है, जो कि तुलनात्मक रूप में सस्ती व प्रभावशाली है। इससे स्वास्थ्य को भी कोई खतरा नहीं है व मिट्टी में उपस्थित सूक्ष्मजीवों की संरचना को इस प्रकार बदलती है कि पैदावार 2-3 वर्षों तक उत्कृष्ट रहती है। परन्तु स्थानीयता के आधार पर कुछ तथ्यों को जान लेना चाहिए।
(स) वायुजनित रोग
ऐसे रोगों से पालीहाउस की फसलों का बचाव करना ज्यादा मुश्किल है। फिर भी स्वच्छता के आधार पर कुछ सीमा तक इन्हें नियंत्रित किया जा सकता है। पालीहाउस में लगाने वाली सब्जियों व प्रयुक्त खूॅंटियों का गर्मियों के दिनों में सौर जनित ऊर्जा से निर्जीवीकरण कर लेना चाहिए। इन रोगों के बचाव के लिए पहले रोग व इसके कारक को पहचानने के बाद फफूंदनाशकों का प्रयोग करना चाहिए। ध्यान रखना चाहिए कि इनके लगातार व अत्यधिक प्रयोग से कई नई समस्याएॅं खड़ी हो सकती हैं, जैसे रसायन प्रतिरोधिता, खाने वाले फल व सब्जियों में इनके अवशेष, मिट्टी व पानी में मिलावट इत्यादि। साथ ही किसानों को सुरक्षित व सही प्रयोग की पूरी जानकारी होनी चाहिए।
निष्कर्ष
एकीकृत रोग प्रबंधन के लिए पालीहाउस के मालिक का उचित फैसला बहुत महत्वपूर्ण होता है व उसे निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए।
(क) बीजजनित रोग: सूची के अनुसार बीजोपचार करें।
(ख) मृदाजनित रोगों के लिए: पालीहाउस के स्थान का सही चयन व मिट्टी का नियमित सौर निर्जीवीकरण, फसल व पालीहाउस चक्र, जैविक नियंत्रण।
(ग) बीज की क्यारियों मेंः सही किस्म, बीज की गुणवत्ता, बीज उपचार, बीजाई का समय, पौध घनत्व, छिड़काव।
(घ) फसल मेंः मिट्टी की तैयारी, छंटाई, छिड़काव, पौध को रस्सी या खूंटी से बांधना इत्यादि।
विभिन्नि रोगों में एकीकृत रोग प्रबंधन का विवरण नीचे दिया गया है-
1. मुरझान रोगः प्रतिरोधी किस्में, प्रमाणित बीज व बीज उपचार, मिट्टी का निर्जीवीकरण, फसल चक्र, घास का न होना, फसल के अवशेषों का नाश करना।
2. झुलसाः अच्छा संवातन, निचले पत्तों को तोड़कर जला देना, फसल चक्र, छिड़काव, प्रमाणित बीज का प्रयोग करना।
3. चूर्णिल आसिताः छिड़काव, प्रतिरोधी किस्में, स्वच्छता, घास का न होना।
4. मृदुरोमिल आसिताः पौधे में उचित दूरी, पानी का निकास, संवातन, अच्छी धूप, प्रतिरोधी किस्में, छिड़काव।
5. काला विगलनः प्रमाणित बीज, बीज उपचार, घास का न होना, छिड़काव।
6. विषाणु रोगः प्रतिरोधी किस्में, प्रमाणित बीज, घास का न होना, रोगाणुवाहक कीटों का नाश। (साभारः विज्ञान)
डाॅ. जे.एन. श्रीवास्तव, डाॅ. गिरीश चन्द एवं उपमा दत्ता
पादपरोग विज्ञान विभाग, बिहार कृषि विश्वविद्यालय सबौर, भागलपुर, बिहार एवं पादपरोग विज्ञान विभाग, शेर ए कश्मीर कृषि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, जम्मू

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