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प्रकृति संरक्षण को समर्पित एकमात्र पत्रिका आम आदमी की भाषा में
ऊर्जा संरक्षण
मरूथल में अपारम्परिक ऊर्जा स्रोत
(01-03-2015)

विद्युत उत्पादन और उसे दूरस्थ क्षेत्रों में पहुॅंचाना कठिन होता है। मरूस्थलीय क्षेत्रों में सौर ऊर्जा तकनीक को सुलभ बनाने की और अधिक आवश्यकता है। सौर ऊर्जा से सबको हर समय सस्ती, प्रदूषण रहित बिजली मिल सकेगी।


शुष्क क्षेत्रों की विषम परिस्थितियों के कारण यहां ऊर्जा के व्यवस्थित उपयोग का विशेष महत्व है। इन क्षेत्रों में जल विद्युत नहीं है। बिजली की उपलब्धता अनिश्चित है। दूर-दराज के गांवों में ईंधन पहुॅंचाना कठिन है।
किसान और विद्युत
बिजली के उत्पादन में आजादी के समय 1360 मेगावाट से अब तक करीब 215000 मेगावाट से अधिक तक की बढ़ोत्तरी हुई है। परन्तु 13-15 प्रतिशत की कमी रहती है। इसी के कारण बिजली में कटौती होती है। कई गांवों में बिजली अब तक नहीं पहुॅंची है, जिससे किसान विद्युत से चलने वाले उपकरणों का इस्तेमाल नहीं कर पाते हैं। डीजल की उपलब्धता भी सीमित है तथा उससे प्रदूषण भी होता है। अतः हमें यदि विकास की दर कायम रखनी है तो ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों की जरूरत पड़ेगी।
प्रकृति पर निर्भरता
मरूस्थलीय इलाकों में कृषि मुख्यतः वर्षा पर आधारित है। हालांकि राजस्थान में नहर आने से पानी की उपलब्धता बढ़ी है, परन्तु उसका समुचित उपयोग न करने पर, जल का टिकाव तथा लवणीयता की समस्याएॅं उत्पन्न हो रही हैं, जैसा कि नहर के प्रथम चरण के इलाकों में हुआ। इसके अलावा फसल कटाई के बाद खाद्यान्न प्राप्त करने में प्रयुक्त होने वाली मशीनों के अभाव में किसान कृषि उत्पादों से शीघ्र लाभ प्राप्त नहीं कर पाते। साथ ही कृषि कार्यों से निवृत्त होने के बाद किसान लम्बे समय तक खाली बैठे रहते हैं। ये सभी तथ्य ऊर्जा के स्रोतों की कमी के कारण उपलब्ध उपकरणों का इस्तेमाल न कर पाना दर्शाते हैं। लेकिन इस क्षेत्र में सौर ऊर्जा एवं पवन ऊर्जा पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है। इन ऊर्जा के अपारम्परिक स्रोतों को प्रयोग में लाकर ऊर्जा की समस्याओं का निवारण किया जा सकता है।
सौर ऊर्जा
इस संदर्भ में सौर ऊर्जा का अत्यधिक महत्व हो रहा है। सौर ऊर्जा प्रकृति में मुफ्त उपलब्ध है। सौर ऊर्जा से अधिक तापमान पैदा कर तापक, सौर चूल्हे, प्रकाश वोल्टीय प्रणाली पर आधारित सौर लालटेन व सौर पम्प आदि बाजार में उपलब्ध हैं। हमारे देश में जवाहरलाल नेहरू सोलर मिशन के तहत 2022 तक 20000 मेगावाट के सोलर पाॅवर प्लांट लगाए जा रहे हैं। पश्चिम राजस्थान तो सोलर हब बन गया है। चूॅंकि हमारे इस क्षेत्र में सूर्य की अत्यंत तीव्रता है, करीब 6 किलोवाट हावर प्रतिदिन प्रतिवर्ग मीटर पर सौर ऊर्जा उपलब्ध है।
इसको ध्यान में रखते हुए काजरी जोधपुर में इस प्राकृतिक स्रोत सौर ऊर्जा के दोहन द्वारा ऊर्जा की कमी को पूरा करने का प्रयास किया गया है। इस संदर्भ में शुष्क कृषि के लिए उपयोगी यंत्र बनाने के लिए विशेष प्रयास किए गए। उनमें से कुछ प्रमुख तकनीकें जैसे फोटोवोल्टाइक पम्प से चलने वाली बूॅंद-बूॅंद सिंचाई की प्रणाली, सोलर डस्टर मय स्पेयर, सोलर विनोवर मय ड्रायर, कई किस्म के एकीकृत बहुउद्देश्यीय सौर संयंत्र, सोलर पालिश मशीन आदि। इनकी संरचना में  सुधार भी किए गए हैं तथा अतिरिक्त प्रणालियाॅं भी जोड़ी गई हैं, ताकि इन उन्नत यंत्रों को किसान आसानी से अपना सकें। इन सबके प्रसार के लिए समाज के सभी वर्गों का समन्वित प्रयास जरूरी है।
पीयूष चन्द्र पाण्डे
प्रधान वैज्ञानिक एवं विभागाध्यक्ष, केन्द्रीय मरूक्षेत्र अनुसंधान संस्थान, जोधपुर (राजस्थान)

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