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दूध के चक्कर में गायों की आफत
(01-03-2015)

दुनिया भर के कई देशों में डेयरी उद्योग ने गायों की हालत खस्ता कर दी है। जर्मनी, अमेरिका और भारत के ही कई डेयरी फार्मों में गायें पांच साल के भीतर दम तोड़ देती हैं। जर्मनी की तीन युवा रिसर्चर इसे रोकना चाहती हैं। भारत में औसतन एक गाय साल भर में करीब एक हजार लीटर दूध देती है। वहीं जर्मनी और अमरीका में दस हजार लीटर। एक सदी पहले की तुलना में यह चार गुना ज्यादा है। कम वक्त में जितना ज्यादा दूध, मुनाफा भी उतना ही ज्यादा। हरियाणा के कई फार्मों में विदेशी ब्रीड की गायों की डिमांड बढ़ गई है। कहा जाता है कि ये ज्यादा खाती हैं। पर सच्चाई यह है कि इन्हें ज्यादा खिलाया जाता है और महज पांच साल की उम्र तक इनकी जान चली जाती है।
जर्मन शहर ब्रेसविग होलस्टाइन के फार्म में गायें, पौष्टिक कहा जाने वाला चारा ‘‘परमानेंट’’ खा रही हैं। इससे गायें स्वस्थ भी रहेंगी और ज्यादा दूध भी देंगी। ‘‘परमानेंट’’ युवा रिसर्चरों की कम्पनी ने तैयार किया है। ब्रेसविग होलस्टाइन में नए चारे का परीक्षण हो रहा है। गायों के खून व मूत्र की जांच की जाएगी। रिसर्चरों में से एक हाना-सोफी ब्राउन पेशे से पशु चिकित्सक हैं। वो अपनी साथी रिसर्चर के साथ आए दिन फर्म में आती हैं, जिनका टेस्ट नहीं हुआ है, उन्हें हमने मार्क किया है। उन पर इस तरह का गुलाबी निशान है। जिन पर हरा निशान है, उनके मूत्र का परीक्षण हो चुका है। परमानेंट कम्पनी के संस्थापकों में से एक यूलिया रोजेनडाल आम डेयरी फार्मों के बारे में अच्छी राय नहीं रखतीं। वहाॅं गायों को बहुत ज्यादा चारा दिया जाता है, ताकि वे ज्यादा से ज्यादा दूध दे सकें। हमारा फूड सप्लीमेंट के बारे में बेहतर इस्तेमाल में गायों की मदद करेगा। जर्मनी में करीब हर दूसरी गाय अत्यधिक चारे की वजह से बीमार हो जाती है। 10 से 15 की उम्र मे बावजूद गायें, पांच साल से ज्यादा नहीं जी पातीं। ब्राउन कहती हैं, बड़े फार्म में हर दिन उत्पादकता बढ़ाने पर जोर दिया जाता है। वो हर दिन चालीस की बजाए पचास लीटर दूध की मांग करते हैं। हम ऐसा बिल्कुल नहीं कर रहे हैं। परमानेंट सप्लीमेंट को बाजार में उतारने के लिए तीनों रिसर्चरों ने अपनी कम्पनी बनाई। उन्हें 4.40 लाख यूरो की मदद मिली। जर्मनी के वित्त मंत्रालय ने भी मदद की। परमामेंट गाय को सेहतमंद रखने के साथ किसानों की मुश्किल भी कम करेगा।

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