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प्रकृति संरक्षण को समर्पित एकमात्र पत्रिका आम आदमी की भाषा में
आवरण आलेख
जल आज और कल के लिए
(01-03-2015)

पानी निर्मल हो नदियों में गंदगी न दिखे। अस्तित्व में रहते हुए तालाब जनजीवन को सहेजे। वर्षा के अनमोल जल का हम सब सदुपयोग करें। ‘मनसा वाचा कर्मणा’ से धरती का जल बचा रहेगा, जिससे इंसान ही हर जीव-जंतु की प्यास बुझा सकेगा। पानी कमी, जल प्रदूषण, असमान वितरण के कारण हो रही है, इसे जानें और समझें।

आज पूरा देश पीने के पानी की कमी और प्रदूषित पानी के खतरे से जूझ रहा है। सर्वाधिक खतरा प्रदूषित पानी से है। ऐसे जल के सेवन से अनेक रोग फैल रहे हैं। पानी के प्रति हमारी समझदारी शिक्षित होने के बाद भी कम होती जा रही है। भारत में प्राचीन समय से पानी के लिए समाज-परिवार संवेदनशील था। देश के धर्म, संस्कृति, परम्परा में जल संरक्षण-संवर्धन को प्रमुखता दी गई थी, जिसका ताना-बाना हमारी बदलती जीवनशैली में खत्म हो चला है। पानी अनमोल है, जिसे सहेजने के लिए पहले समाज एकजुट हो जाता रहा। कविवर रहीम ने इस पर कहा ही है-
‘‘रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून। पानी गए न उबरे, मोती, मानस, चून।।’’
नहीं बदला जलचक्र
बरसात का पानी हमें हर साल मिलता है, जिसे हर क्षेत्रों में अपने-अपने तौर-तरीकों से सहेजा जाता रहा। हमें हर बरस लगभग 40 करोड़ हेक्टेयर मीटर पानी वर्षा से मिलता है। यह तीन प्रकार से खर्च होता है। 7.00 करोड़ हेक्टेयर मीटर भाप बन कर उड़ जाता है, 11.05 करोड़ हेक्टेयर मीटर नदियों आदि जल स्रोतों से होकर बहता है। बाकी 21.05 करोड़ हेक्टेयर मीटर जमीन में जज्ब हो जाता है। जिसका कुछ भाग भूजल संवर्धन के लिए होता है। यह प्राकृतिक प्रक्रिया है। इन तीनों के बीच परस्पर कुछ लेन-देन भी चलता है। यही पानी वापस वातावरण में लौट आता है। इसे जल चक्र भी कहा जाता है।
नदी सभ्यता
नदियां वर्षाकाल में जल से भर उठती हैं। पानी की उपलब्धता के कारण नदियों के किनारे ही बड़े-बड़े नगर बने, जो आज भी हैं। नदियों से दूर बसे गांव-कस्बों में परिस्थितियों के अनुकूल तालाब, कुएं, और झीलें बनीं, जो लोगों को पेयजल और निस्तार के लिए पानी उपलब्ध कराते रहे। प्राकृतिक तौर पर प्राचीन काल में पानी के संरक्षण, संवर्धन की तकनीक अपनाई गई, जो आज भी उपयोगी है।
बांधों से बिगड़ी नदियाॅं
विकास के दौर में नदियों पर बहुउद्देश्ीय बांध बनाने का सिलसिला  उन्नीसवीं सदी के दौरान चला। ऐसे बांधों से दूरगामी परिणाम बेहतर नहीं मिले, जिसकी अपेक्षा की गई थी। वहीं नदियों में जल प्रदूषण ज्यादा फैला। जल जनित जीवों के साथ जैव विविधता संपदा को भी क्षति पहुॅंची। बांधों के कारण भूकंपीय क्षेत्रों में भी वृद्धि हुई, जिनके बनने से लोग उजड़े, बाढ़ के कारण जन-धन का नुकसान हुआ। अब यह जान लिया गया है कि बड़े बांध वास्तव में उतने उपयोगी नहीं है, जिसके कारण नदियां भी खत्म हो रही हैं। खतरों को देखते हुए अब     बांधों को तोड़ जा रहा है। विदेशों में तेजी से बांधों को हटाकर नदियों को उन्मुक्त बहने दिए जाने से परिणाम अच्छे मिले हैं।
भूजल का उपयोग
जमीन में जज्ब होने वाले 21.05 करोड़ हेक्टेयर मीटर जल में से 16.5 करोड़ हेक्टेयर मीटर पानी मिट्टी में नमी बनाए रखता है। बाकी 5 करोड़ हेक्टेयर मीटर जल भूमिगत जल स्रोतों में जा मिलता है। भूजल भंडार इसी तरह बनता रहा। पेयजल के लिए गांव-कस्बों में कुंए बनाए जाते थे, जिसके बाद नलकूप स्थापित किए गए। कुंए और नलकूपों से पानी खींचा जाने लगा। खेतों में सिंचाई के लिए नलकूप वरदानी सिद्ध हुए। 1930 के दशक से नलकूप बनने शुरू हुए। 1974 में 55 लाख 60 हजार हेक्टेयर लगभग 17 फीसदी खेती की सिंचाई नलकूपों से होने लगी। इस समय देशों में कुओं में सिंचित भूमि 75 लाख हेक्टेयर थी।
नलकूपों से भूजल दोहन इतनी अधिक मात्रा में होने लगा कि देश के कई इलाकों में भूजल स्तर खतरनाक स्थिति तक गिर गया। पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश के मालवा क्षेत्र में भूजल स्तर गिरने के कारण पेयजल समस्या विकराल हो गई। भूजल का उपयोग खेती के अलावा औद्योगिक परिवेश के साथ शहरी क्षेत्रों में भी हो रहा है। वहीं कृषि रसायनों, कीटनाशक आदि के कारण भूजल विषाक्त भी होने लगा है। कहीं अत्यधिक गहराई से निकाले जाने वाले भूजल में फ्लोरोसिस व आर्सेनिक जैसे घातक तत्व पाए जाने लगे हैं।
भूजल संवर्धन की पहल
भूजल संवर्धन और उसकी स्वच्छता को बनाए रखने के लिए भूजल बोर्ड का गठन किया गया। कानून में       संशोधन हुए। देश के राज्यों व जिलों में प्रदूषण नियंत्रण मंडल बोर्ड बने, जो पर्यावरण के अंतर्गत् भूजल संवर्धन की निगरानी करता रहा। तमाम कोशिशों व कानून के बावजूद भूजल स्तर में लगातार गिरावट एक चिंता का विषय बन गया। 1010 से देश में राष्ट्रीय हरित अभिकरण (नेशनल ग्रीन ट्रिब्युनल) बनाए गए, जिसकी पहल से स्थितियों में तेजी से सुधार होने लगा। फरवरी 2015 में एनजीटी ने अपने आदेश में दिल्ली के बिल्डरों और कई अस्पतालों को भूजल संवर्धन के तहत दोषी करार देते हुए जुर्माना लगाया गया। एनजीटी की पहल से भूजल संवर्धन में अपेक्षित वृद्धि होने की संभावना है।
तालाब सहेजते समाज
बारिश के पानी को एकत्र कर उसके उपयोग के लिए तालाब, झीलों का निर्माण प्राचीन काल से होता रहा है। दक्षिण भारत में तालाबों से आज भी सिंचाई का कार्य होता है। वेल्लारी जिले में तुंगभद्रा नदी के किनारे पंपासर तालाब है। रामायण काल में शायद इसी पंपासर तालाब का उल्लेख आया है। इलाहाबाद में श्रृंगवेरपुर में 2000 साल से भी अधिक पुराना तालाब मिला है। छत्तीसगढ़ में तालाबों की समृद्ध परम्परा मौजूद रही, जहाॅं के पुराने नगरों में हजारों तालाब थे।
20वीं सदी के अंत तक देश में झीलें और तालाब 2 लाख हेक्टेयर भूमि को समेटे हुए थे। झीलें अब सिमट गईं, कुछ पट गईं तो प्रदूषित भी हो गई। कश्मीर की डल झील और वूलर झील, राजस्थान की पुष्कर झील, मणिपुर की लोकटक झील, सिक्किम की खिचीपिरी झील, तमिलनाडु की उटी झील, उत्तरप्रदेश, झारखंड की भीमवाल और नैनीताल की झील, हैदराबाद हुसैनी सागर तो मध्यप्रदेश का भोजताल जो पहले सागर जैसे थे अब गागर बन गए हैं, प्रदूषित हो चले हैं।
तालाबों की उन्नत परम्परा पर अंग्रेजों ने कोई ध्यान नहीं दिया। आजादी के बाद बढ़ते अंधाधुंध विकास और शहरीकरण के साथ कुओं और तालाबों का सिलसिला चला, जो आज भी नहीं थमा। तालाबों पर टिकी जीवनशैली का दौर खत्म हुआ तो तालाब बेकार समझे गए। अब जाकर मालूम पड़ा कि तालाब पर्यावरण में कितना अहम योगदान देते हैं। यह जानकर भी आज तालाबों को सहेजने के लिए तैयार नहीं हुए हैं। भूजल संवर्धन के लिए तालाबों की भूमिका प्रमुख है। इसे देखते हुए शहरों की नई कालोनियों के लिए कानूनन तालाब बनवाना अनिवार्य घोषित किया जाना जरूरी है।
जल प्रदूषण के खिलाफ
नदी, तालाब, झीलों का ही नहीं भूजल भी प्रदूषित होने लगा है, जिनके प्रदूषण को खत्म करने के लिए गंभीरता से पहल नहीं होने के कारण कई विकराल समस्याएॅं उठ खड़ी हुई हैं। भारत की पवित्र गंगा नदी कहीं-कहीं इतनी प्रदूषित हैं, जहाॅं स्नान करना भी खतरे से खाली नहीं है। नदियाॅं प्रदूषण के कारण खत्म हो रही हैं। जीवनदायिनी नदियों में शहरों का जलमल और औद्योगिक क्षेत्र का विषाक्त पानी व कचरा प्रवाहित किया जा रहा है। नदियों, को साफ-सुथरा रखने के लिए अब तक बनी परियोजनाएॅं निरर्थक सिद्ध हुई हैं। लेकिन नेशनल ग्रीन ट्रिब्युनल के अस्तित्व में आने के बाद उम्मीद की जा सकती है कि आने वाले समय में नदियों से काफी हद तक प्रदूषण खत्म हो सकेगा।
जल ही तो जीवन है। वह जिसमें मिल जाए, वैसा ही बन जाता है। जल प्रदूषित न हो, हमें ऐसा प्रयास करना चाहिए। जल प्रदूषण को बरकरार रख बोतलबंद पानी पर अवलंबित जीवन श्रेयस्कर नहीं है। हमें अपने आसपास के जल स्रोतों के उचित रखरखाव की ओर ध्यान देना चाहिए। जल प्रदूषण को दूर करने का काम केवल सरकार का नहीं है, समाज को पहल करनी चाहिए, तभी हमें और हमारी पीढ़ी को निर्मल जल मिल सकेगा।
रविन्द्र गिन्नौरे
पर्यावरण ऊर्जा टाइम्स, रायपुर (छग)

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