/
/
/
/
/
/
/
/

प्रकृति संरक्षण को समर्पित एकमात्र पत्रिका आम आदमी की भाषा में
कैंसर के विरूद्ध युद्ध
स्वर्णाभूषण का कहर-शरीर के लिए जहर?
(01-01-2015)

अध्ययन के आधार पर वर्तमान में स्वर्ण आभूषणों में बढ़ रहे कैडमियम की मात्रा चिंताजनक परिस्थितियों का संकेत देती है। भारत सरकार से तथा अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों से अपेक्षा है कि स्वर्णाभूषणों में प्रयुक्त होने वाले भारी धातु यथा कैडमियम एवं अन्य धातुओं का मानव स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभाव पर तत्काल अध्ययन किया जावे।

सभ्यता में निरंतर हो रहे परिवर्तन एवं लोगों में आ रही समृद्धि के साथ जीवनशैली में भी तेजी से परिवर्तन आ रहा है। नित्य नए-नए उपकरण उपादानों एवं रहन-सहन के   संसाधनों में परिवर्तन आ रहा है, जो ऊपरी तौर पर सुखकारी, समृद्धिजनक एवं सुख प्रदाय कर रहे हैं। किन्तु, इनमें से बहुतायत संसाधनों के अनेकानेक दुष्प्रभाव भी हैं, जिनकी समीक्षा यदाकदा ही होती है। 

हमने देखा है कि पिछले 20 वर्षों में लगभग पूरे भारतवर्ष में प्रत्येक शहर में सोने-चांदी एवं जेवर के व्यापार में अभूतपूर्व वृद्धि हुई। आजादी के पूर्व एवं आजादी के तत्काल बाद ‘‘सुनार’’ कहलाने वाले जेवर के कारीगर अब अपने आपको ‘‘ज्वेलर’’ के रूप में ही पहचाना जाना सम्मानजनक समझते हैं। पीली धातु का आकर्षण न केवल महिलाओं को है, अपितु अपने आपको समृद्धिशाली साबित करने के लिए पुरूषों में भी इसके प्रति आकर्षण कम नहीं है। 

विश्व में भारत ऐसा देश है, जहाॅं इस पीली धातु का जेवरों के रूप में सर्वाधिक उपयोग किया जाता है। हमारी अर्थव्यवस्था के, विदेश व्यापार में सबसे बड़े घाटे का भी यह बहुत बड़ा कारण है। बहुतायत लोग इस स्वर्ण     धातु में अपने भविष्य को सुरक्षित करने के दृष्टिकोण से भी निवेश करते हैं।  एक संकल्पना यह भी है कि भ्रष्टाचार जनित धन एवं कालेधन को संचित करने हेतु भी सर्वाधिक निवेश सोने में होता है, परिणामस्वरूप भी भारत में सर्वाधिक सोने की खपत है। चूॅंकि विश्व स्तर में भारत में भ्रष्टाचार और कालेधन का स्तर भी सर्वोच्च देशों में एक है। शरीर में धारण करने वाले लोग तो अपने शारीरिक सौंदर्य को विभूषित करने के लिए ही प्रयोग करते हैं। शादी-विवाह में बिना सोने के जेवरों का आदान-प्रदान किए, भारतीय विवाह संस्कार सम्पूर्ण ही नहीं होते। 

स्वर्ण धातु के पक्ष में आयुर्वेद में ढेर सारे आख्यान हैं, जिसे स्वास्थ्यवर्धक एवं चिकित्सा के लिए उपयोग किए जाने हेतु अनुशंसा की गई है। स्वर्ण भष्म का उपयोग असाध्य रोगों के उपचार हेतु एवं कामुकता वृद्धि हेतु भी किए जाने का आयुर्वेद में उल्लेख है।  अभी हाल ही के नैनो पार्टिकल वैज्ञानिकों ने भविष्य में स्वर्ण के नैनो पार्टिकलों के उपयोग से असाध्य रोगों को साध्य करने की बात कही है। परन्तु, स्वर्ण     धातु के उजले पक्ष को छोड़कर इसके स्याह पक्ष पर बहुत कम ही कहीं चर्चा होती है। पर हमने जब भारतीय जन समुदाय के बीच, विशेषकर महिलाओं में लगातार गिर रहे स्वास्थ्य के कारणों को जानने और समझने का प्रयास किया तो हमने पाया कि इस पीली       धातु से आभूषण बनाने की प्रक्रिया में टांके में उपयोग किए जाने वाले धातु में व्याप्त ‘‘कैडमियम’’ नामक धातु मानवीय शरीर के लिए अत्यंत घातक एवं जहरीला सिद्ध हो रहा है। 

कैडमियम धातु के कारण शरीर में कैंसर एवं श्वांस सम्बन्धी एवं किडनी तथा हड्डी सम्बन्धी बीमारियों के उत्पन्न होने के वैज्ञानिक प्रमाण प्राप्त हुए हैं, जिनका विवरण कैथोलिक विश्वविद्यालय बेल्जियम के जन स्वास्थ्य विभाग द्वारा किए गए              अध्ययन के आधार पर प्रस्तुत है।

चूॅंकि, वर्तमान में स्वर्ण आभूषणों के निर्माण में टांका लगाने के लिए ‘‘कैडमियम’’ का सर्वाधिक उपयोग किया जा रहा है। कैडमियम एक ऐसा धातु है, जो त्वचा के सम्पर्क में आने से बहुत तेजी से शरीर तंत्र में अवशोषित होता है तथा एक बार अवशोषित होने के उपरांत शरीर के चयापचय प्रणाली के द्वारा मूत्र, विष्ठा या पसीने के     माध्यम से उत्सर्जित नहीं हो पाता है। इस प्रकार धीरे-धीरे ‘कैडमियम’ का सांद्रण शरीर में बढ़ता जाता है। परिणामस्वरूप, यह जीवन भर संचित होते-होते एक उम्र के उपरांत उस खतरनाक स्तर तक पहुॅंच जाता है, जिसके कारण शरीर के महत्वपूर्ण अंग प्रभावित होते हैं एवं कैंसर जैसे भयावह रोग उत्पन्न होते हैं।

जिंक के उत्पादन में सह-उत्पाद के रूप में कैडमियम उत्पन्न होता है, जो कि अत्यंत खतरनाक जहरीला तत्व है। इससे हड्डी, किडनी आदि के रोग उत्पन्न होते हैं। इसके अतिरिक्त कैडमियम उद्योगों द्वारा वायु प्रदूषण के रूप में उत्सर्जित होता है।  कैडमियम युक्त हवा को सांस द्वारा अंदर जाने पर फेफड़े का कैंसर उत्पन्न होता है।  इस आलेख का उद्देश्य कैडमियम से उत्पन्न खतरों को जनमानस तक पहुॅंचाना है। कैडमियम प्रदूषण युक्त वायु एवं जल से इसका असर अन्न, मछलियों, वनस्पतियों एवं जल में मिश्रित होता है। इनका सेवन करने से धीरे-धीरे मनुष्य शरीर में एकत्रित होता है और स्वास्थ्य पर घातक असर डालता है। लगभग 10 से 20 माइक्रोग्राम खाद्यों के द्वारा मनुष्य शरीर में पहुॅंचता है। एक सिगरेट में 1-2 माइक्रोग्राम कैडमियम होता है,  जो धूम्रपान करने से शरीर में संचित होता है। नदियों से होता हुआ सागर में कैडमियम प्रदूषण मिलता जाता है।

सागर में प्रदूषण

कुछ दशक पूर्व जापान में फैले इताइ-इताई रोग का कारण कैडमियम संदूषित समुद्री जीवों का भक्षण था। जिन लोगों ने बड़ी मात्रा में उन जीवों को खाया था, उनके शरीर में कैडमियम यौगिकों की सांद्रता काफी अधिक थी, उनकी हड्डियाॅं भंग हो गई थीं और उन्हें भूख लगनी बंद हो गई थी। समुद्री जीव अपने पर्यावरण से विभिन्न मात्राओं में कैडमियम यौगिक सांद्रित कर लेते हैं। मछलियाॅं अपने शारीरिक भार के अनुसार 113 मिली ग्राम प्रति किलोग्राम तक कैडमियम यौगिक सांद्रित कर लेती हैं, जबकि सीपियाॅं पर्यावरण की तुलना में 3.50 गुनी तक कैडमियम यौगिक संचित कर सकते हैं। कैडमियम का तात्कालिक प्रभाव केकड़ों पर ही पड़ता है। वे इतनी मात्रा में कैडमियम संचित कर लेते हैं कि तुरंत मर जाते हैं।

महिलाओं में कैडमियम

हमारे भोजन में विटामिन के साथ कई अन्य तत्वों का समावेश रहता है, जिनमें फास्फोरस, सीसा (लैड), जिंक, मैग्नीशियम, कैल्शियम, आयरन आदि प्रमुख हैं। इन तत्वों में से एक कैडमियम का इस्तेमाल महिलाओं के लिए हानिकारक होता है। कैडमियम के अधिक सेवन से महिलाओं में स्तन कैंसर का खतरा बढ़ जाता है। अमेरिका की एसोसिएशन फार कैंसर रिसर्च के एक अनुसंधान के आधार पर यह तथ्य सामने लाया गया है। अनुसंधान में 56000 महिलाओं पर यह शोध किया गया था। शोध के अनुसार इनमें से एक-तिहाई महिलाओं के भोजन में कैडमियम की मात्रा    अधिक थी।

कैडमियम से रोग

कैडमियम जल में भी औद्योगिक अपशिष्ट के साथ चला जाता है। खेतों में उगाई जाने वाली सब्जियों में भी कैडमियम की मात्रा अधिक हो जाती है। अनौद्योगिक क्षेत्रों में उगने वाले पौधों में आमतौर पर कैडमियम कम मात्रा में पाया जाता है, लेकिन जानवरों के लिवर और किडनी में इसकी  अधिक मात्रा मिलती है। आलू, रतालू, साबुत अनाज आदि में यह पाया जाता है, इसलिए कैडमियम युक्त पदार्थों के अधिक सेवन से बचना चाहिए। जिंक व सीसा की अधिक मात्रा भी पेट व गुर्दों के रोगों को बढ़ावा देते हैं। इसके अलावा सिगरेट आदि से भी लोग कैडमियम की चपेट में आ सकते हैं। हालांकि, आमतौर पर तंबाकू में भोज्य पदार्थों की अपेक्षा कम कैडमियम होता है, लेकिन फेफड़े पेट की बजाय ज्यादा तेजी से कैडमियम ग्रहण कर लेते हैं।

ललित कुमार सिंघानिया

पर्यावरण ऊर्जा टाइम्स

लेख पर अपने विचार लिखें ( 0 )                                                                                                                                                                     
 

भारत के समाचार पत्रों के पंजीयक कार्यालय की पंजीयन संख्या( आर. एन. आर्इ. नं.) : 7087498, डाक पंजीयन : छ.ग./ रायपुर संभाग / 26 / 2012-14
संपादक - ललित कुमार सिंघानिया, संयुक्त संपादक - रविन्द्र गिन्नौरे, सह संपादक - उत्तम सिंह गहरवार, सलाहकार - डा. सुरेन्द्र पाठक, महाप्रबंधक - राजकुमार शुक्ला, विज्ञापन एवं प्रसार - देवराज सिंह चौहान, लेआउट एवं डिजाइनिंग -उत्तम सिंह गहरवार, विकाष ठाकुर
स्वामित्व, मुद्रक एवं प्रकाषक : एनवायरमेंट एनर्जी फाउडेषन, 28 कालेज रोड, चौबे कालोनी, रायपुर (छ.ग.) के स्वामित्व में प्रकाषित, महावीर आफसेट प्रिंटर्स, रायपुर से मुदि्रत, संपादक - ललित कुमार सिंघानिया, 205, समता कालोनी, रायपुर रायपुर (छ.ग.)

COPYRIGHT © BY PARYAVARAN URJA TIMES
DEVELOPED BY CREATIVE IT MEDIA