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प्रकृति संरक्षण को समर्पित एकमात्र पत्रिका आम आदमी की भाषा में
जल संरक्षण
भूल रहे हैं तालाब की परम्परा
(01-01-2015)

तालाब सदियों से हमारे जीवन में रचे बसे थे। तालाबों से पेयजल मिलता था, वहीं सिंचाई के काम आते हैं। मखाना, सिंघाड़ा तो तालाबों से ही मिलते हैं। तालाब भूजल संरक्षण में अहम् भूमिका निभाते हैं। इंसान के अलावा अनेक जीव-जंतु तालाबों के भरोसे रहते हैं। मछली, कछुआ, मेंढक तो तालाबों में बसेरा करते हैं। 

जलस्रोतों में नदियों के बाद तालाबों का सर्वाधिक महत्व है। तालाबों से सभी जीव-जंतु अपनी प्यास बुझाते हैं। किसान तालाबों से खेतों की सिंचाई करते रहे हैं। हमारे देश में आज भी सिंचाई के आधुनिकतम संसाधनों की भारी कमी है, जिस कारण किसान वर्षा तथा तालाब के पानी पर निर्भर हैं। लेकिन तालाबों की निरंतर कमी होती जा रही है। लगता है, हम तालाबों के महत्व को भूलते जा रहे हैं। 

देश में 6,38,365 गांव हैं। इनमें से डेढ़ लाख से भी अधिक गांवों में पेयजल की किल्लत है। लगभग 72 प्रतिशत छोटे तथा सीमांत किसानों की फसलें पानी की कमी के कारण ठीक तरह फल-फूल नहीं पातीं। नदियों से निकलने वाली नहरों को न तो चैड़ा किया जा रहा है और न ही उनकी साफ-सफाई हो रही है। नतीजतन उनका वजूद मिटता जा रहा है। इसके अलावा देश में कई राज्य तथा पहाड़ी क्षेत्र ऐसे हैं, जहां नहरें हैं ही नहीं, और हैं भी, तो अपर्याप्त।

रामायण कालीन तालाब

वर्षा जल या किसी झरने के पानी को रोकने के लिए बनाए जाने वाले तालाबों का प्रचलन अत्यधिक प्राचीन है। निचली धरती पर पानी भर जाने से कुछ तालाब अपने आप बन जाते रहे हैं। रामायण काल के तालाबों में शृंगवेरपुर का तालाब प्रसिद्ध रहा है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के निदेशक डॉ. बी. वी लाल ने पुराने साक्ष्य के आधार पर इलाहाबाद से 60 किलोमीटर दूर खुदाई कर इस तालाब को खोजा है। यह तालाब ईसा पूर्व सातवीं सदी का बना हुआ है। महाभारतकालीन तालाबों में कुरुक्षेत्र का ब्रह्मसर, करनाल की कर्णझील और मेरठ के पास हस्तिनापुर का शुक्रताल आज भी हैं।

ऐतिहासिक तालाब

रामायण और महाभारत काल को छोड़ दें, तो पांचवी सदी से पंद्रहवी सदी तक देश में तालाब बनते ही जा रहे थे। रीवा रियासत में पिछली सदी में 5,000 तालाब थे। वर्ष 1847 तक मद्रास प्रेसीडेंसी में 53,000 तालाब थे। वर्ष 1980 तक मैसूर राज्य में 39,000 तालाब थे। अंगरेजों के आने से पहले दिल्ली में 350 तालाब थे, जिनमें से अधिकांश अब लुप्त हो चुके हैं। भोपाल का तालाब अपनी विशालता के कारण देश में मशहूर था। इसे ग्यारहवीं सदी में राजा भोज ने बनवाया था। पच्चीस वर्गमील में फैले इस तालाब में 365 नालों-नदियों का पानी भरता था। मालवा के शाह होशंगशाह ने 15वीं सदी में इसे सामरिक कारणों से तुड़वाया, तो तीन वर्ष तक पानी निकाले जाने के बाद उसका तल दिखाई दिया। इसके आगर का दलदल 30 वर्षों तक बना रहा। जब यह सूख गया, तब इसमें खेती आरंभ की गई। 

वर्ष 1335 में महाराज घड़सी ने जैसलमेर में 120 वर्ग मील लंबा-चैड़ा घड़सीसर खुदवाया था। इसी तरह जयपुर के पास गोला ताल है। कहते हैं, जयगढ़ के राजा ने जयबाण नामक एक तोप बनवाई थी। परीक्षण के लिए यह तोप किले के बुर्ज पर चढ़ाकर एक गोला दागा गया, जो चाकसू नामक स्थान पर 20 मील दूर जाकर गिरा। विस्फोट इतना भयंकर था कि एक लंबा, चैड़ा और गहरा गड्ढा बन गया। बरसात में इसमें पानी भर गया, जो कभी सूखा नहीं। आबू पर्वत के पास एक नखी सरोवर तालाब है। कहते हैं कि इस तालाब को देवताओं और ऋषियों ने अपने नाखूनों से खोदकर तैयार किया था, जिससे उस क्षेत्र के प्राणियों को पानी प्राप्त हो सके ।

सिंचाई और मछलीपालन

गोंड समाज का तालाबों से गहरा संबंध है। जबलपुर के पास कूडन गोंड द्वारा बनाया गया तालाब आज लगभग हजार वर्ष बाद भी काम आ रहा है। इसी समाज से रानी दुर्गावती थीं, जिन्होंने थोड़े समय में अपने क्षेत्र के एक बड़े भाग को तालाबों से भर दिया था। चंदेलों-बुंदेलों के समय में एक-एक हजार एकड़ के बनवाए गए बरुआ सागर और अरजर सागर तालाब आज भी सिंचाई के काम आते हैं। बरुआ सागर ओरछा के नरेश उदित सिंह ने और अरजर सागर राजा सुरजन सिंह ने क्रमशरू वर्ष 1737 और 1671 में खुदवाए थे। बंगाल में पोखरों की उज्ज्वल परंपरा है। उन पोखरों में मछलियां भी पाली जाती हैं। हालांकि अब वहां भी पोखर कम होते जा रहे हैं, जिस कारण मछली उत्पादन भी प्रभावित हुआ है। 

तालाब बनाने वाले

एक समय था, जब देश में तालाब बनाने की होड़-सी लगी रहती थी। तालाब की जगह का चुनाव बुलई करते थे। गजधर जमीन की पैमाइश करते थे। सिलवट पत्थर का काम करते थे। सिरभाव बिना औजार के पानी की ठीक जगह बताते थे। जलसूंघा आम अथवा जामुन की लकड़ी से भूजल सूंघकर उसका विश्लेषण करते थे। पथरोट और टंकार तालाब बनाते थे। खंती मिट्टी काटते थे। सोनकर मिट्टी खोदते थे। मटकूट मिट्टी कूटते थे। ईंट और चूने-गारे का काम चुनकर करते थे। दुसाध, नौनिया, गोंड,            परधान, कोल, धीमर, भोई, लुनिया, मुरहा और झांसी तालाब बनाने वाले अच्छे कारीगर माने जाते थे। 

अब सरकारें तालाबों को भूल चुकी हैं। यही कारण है कि तालाब खुदवाने की जगह पाटने की सूचनाएं ज्यादा मिलती हैं। सरकारें पीने तथा सिंचाई के लिए ट्यूबवेल, पंपसैट, हैंडपंप आदि पर जोर देती है, परंतु तालाब का महत्व नहीं समझती। जल स्रोत नष्ट होते जा रहे हैं। इस समय देश में पानी की भारी कमी है। यदि सरकार और जनता तालाब निर्माण की ओर एक बार जागृत हो जाए, तो संभवतः पानी की कमी दूर की जा सकती है। मत्स्यपुराण में कहा गया है- दस कुओं के बराबर एक बावड़ी, दस बावडियों के बराबर एक तालाब, दस तालाबों के बराबर एक पुत्र और दस पुत्रों के बराबर एक वृक्ष होता है।

स आर. एस. रमन

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