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प्रकृति संरक्षण को समर्पित एकमात्र पत्रिका आम आदमी की भाषा में
पारिस्थितिकी
जीव जंतु भी करते हैं नशा
(01-01-2015)

नशा की लत इंसान को ही नहीं, बल्कि पशु-पक्षियों को भी लगती है। नशे के लिए पशु-पक्षी प्रकृति में उपलब्ध पेड़-पौधों और जीव-जंतुओं का इस्तेमाल करते हैं। इनमें कुछ ऐसे भी नशे हैं जो जहरभरे साबित होते हैं। फिर भी पशु-पक्षी नशे के आनंद का मोह छोड़ नहीं पाते।

मधुमक्खियाॅं भांग व मैरीजुआना जैसे नशीले पौधों को बेहद पसंद करती हैं। बारहसिंगा से लेकर हाथियों तक जीव-जंतुओं की दुनिया ऐसे जानवरों से भरी पड़ी है, जो इस तरह के पौधे या कीड़े-मकोड़े जान-बूझकर खाते हैं, जिनमें हैल्यूसिनोजेनिक रसायन ज्यादा मात्रा में पाए जाते हैं।

बारहसिंघा की पसंद

बारहसिंगा को एमैनिटा मसकैरिया नामक नशीला मशरूम पसंद है। यह मशरूम साइकोएक्टिव प्रकार की    औषधि है, जिस पर सफेद फंगस लगा रहता है। इसको फ्लाई एगैरिक के नाम से भी जाना जाता है। जानकारों का कहना है कि इसको खाने के बाद बारहसिंगा जब जंगल में कूदते-फांदते हुए दौड़ता है, तो उसे ऐसा अहसास होता है कि वह उड़ रहा है।

जहरीला पौधा

लोकोवीड लगभग 20 प्रकार के जंगली पौधों का एक समूह है, जो पश्चिमी अमरीका में पाया जाता है। यह पौधा जाड़ों में पनपता है और घोड़ों का पसंदीदा भोजन है। एक-दो बार इसको खाने के बाद घोड़े इसके आदी हो जाते हैं और बार-बार इसे खाने के लिए आते रहते हैं। इस जहरीले पौधे की लत इन घोड़ों को इस कदर लगती है कि वे इसे तब तक खाते रहते हैं, जब तक कि वे मर न जाएं। 

लोकोविड के नशे के कारण घोड़े हिनहिनाते रहते हैं और साथ ही जबड़े को भी खोलते व बंद करते रहते हैं। जो घोड़े इसे अधिक मात्रा में खा लेते हैं, उनको या तो डायरिया हो जाता है या वे डिप्रेशन का शिकार हो जाते हैं।

सड़े फलों का रस

मधुमक्खी व बरैया जैसी प्रजातियाॅं सड़े हुए फलों का रस पीती हैं। इस तरह का रस पीने वाली मक्खियाॅं हिंसक, असामाजिक व उड़ने की कम शौकीन होती हैं। जो मक्खियां ज्यादा रस पी लेती हैं उन्हें अक्सर पैरों को ऊपर उठाकर जमीन पर पीठ के बल लेटा देखा जा सकता है।

कनखजूरों से नशा

एनिमल प्लेनेट के अनुसार बंदरों जैसी दिखने वाली एक प्रजाति काले लीमर अपने दांतों की सहायता से बड़े-बड़े कनखजूरों को उनके सिर की तरफ से कुतर डालते हैं, जबकि कनखजूरे बहुत जहरीले होते हैं। कनखजूरा अपने बचाव में सायनायड जैसे जहरीले रसायन शरीर से बाहर निकालने लगता है। यदि यह रसायन लीमर के शरीर के भीतर पहुॅंच जाए तो घातक हो सकता है। लेकिन लीमर पहले ही चालाकी से कनखजूरे का सिर दांतों से कुतर डालता है। इस प्रकार विषैला रसायन सिर्फ लीमर के शरीर पर ही लग पाता है, जिससे लीमर को हल्का नशा सा होने लगता है। तनाव के दौर से निबटने के लिए लीमर इस नशे का अक्सर प्रयोग करते हैं।

लाइकेन और भेड़

लाइकेन की एक प्रजाति बहुत दुर्लभ होती है और धीरे-धीरे बढ़ती है। यह इतनी दुर्लभ है कि कभी-कभी चट्टानी पहाड़ों के ढेर में से किसी एक ही चट्टान पर उगती है। लेकिन यह जानते हुए भी कि इस प्रकार की लाइकेन को पाना आसान नहीं और इसमें कोई पोषक तत्व भी नहीं हैं, भेड़ें अपनी जान-जोखिम में डालकर उसको ढूॅंढ़ती हैं। एक बार लाइकेन तक पहुॅंचने के बाद भेड़ें इसको अपने दांतों से कुरेद-कुरेद कर तब तक खाती रहती हैं, जब तक यह चट्टान से पूरी तरह साफ न हो जाए।

नशे के आदी पक्षी

रैवन, जे ब्लैकबर्ड व तोते जैसे पक्षी चींटियों को मसल कर अपने पंखों में दबा लेते हैं। पक्षियों के व्यवहार का अध्ययन करने वाले वैज्ञानिकों ने पहले यह सोचा कि चींटियों से निकलने वाले फार्मिक अम्ल को पाने के लिए पक्षी ऐसा करते हैं, ताकि अपने शरीर से परजीवियों का सफाया कर सकें। पक्षियों के व्यवहार के बारे में ऐसी सोच तब तक कायम रही, जब तक वैज्ञानिकों ने मैना के अजीब व्यवहार पर शोध नहीं किया। मैना कीड़ों को तम्बाकू की राख पर मसलने के बाद ही अपने शरीर पर लगाती है। वैज्ञानिकों ने पक्षियों के इस अजीब व्यवहार को देखकर यह नतीजा निकाला कि पक्षियों को ऐसा करने से आनंद प्राप्त होता है। इस अजीब नशे के लिए पक्षी कई प्रकार के तरीकों का इस्तेमाल करते हैं और इसके आदी भी हो जाते हैं।

जंगली वन्य पशुओं का नशा

जब अफ्रीका के जंगलों में मैरूला नामक फल पक जाता है तो ऐसा लगता है कि सारी कुदरत मैरूला के पेड़ों के पास जमा हो गई है। लेकिन यहां इस पके हुए फल को कोई जानवर नहीं खाता, बल्कि वे इसके जमीन पर गिरने के बाद सड़ जाने का इंतजार करते हैं। हाथी, बंदर व अन्य प्रकार के स्तनपाई जानवर इन सड़े हुए फलों को खाने के बाद या तो आपस में झगड़ा करते हैं या फिर अपने सहचर के साथ संभोग। इसके बाद वे जब तक जमीन पर पड़े रहते हैं, जब तक फल के नशे का असर खत्म न हो जाए।

बकरियां बहुत उत्साह से काफी बींस खाती हैं और सुअर भांग के बीज खाकर मस्त रहते हैं। जगुआर भी एक खास तरह के पौधे की बेल खाकर झूमता रहता है। चीटियों का झुंड हमेशा एकेसिया के पेड़ की रक्षा करता है, क्योंकि इस पेड़ से चीटियों को एक मीठा सीरप मिलता है। कैटनिप नामक पौधे को खाने के बाद बिल्लियां मस्ती के चरम पर पहुॅंच जाती हैं और इधर-उधर उछल-कूद करने लगती हैं। जिस तरह की दुनिया में ये जीव-जंतु रहते हैं, उसको देखते हुए अगर ये अपने आनंद की तलाश इस तरह से करते हैं तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है।

 नरेन्द्र देवांगन

भोपाल (मध्यप्रदेश)

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