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विविध आलेख
घटती बर्फ फैलते समन्दर
(01-02-2015)

बढ़ते तापमान से पृथ्वी के ध्रुवों में जमी बर्फ तेजी से पिघलने लगी है। समुद्र फैल रहे हैं। इसके साथ समुद्री तूफान, अतिवृष्टि और बादल फटने की घटनाएॅं बढ़ने लगी हैं। अगर अब भी हम बढ़ते तापमान को रोकने में सजग नहीं हुए तो भविष्य संकट से घिरा रहेगा।

संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा जलवायु परिवर्तन के लिए नियुक्त अंतर्राजकीय पैनल ने वर्ष 2007 में भौगोलिक उष्मन के फलस्वरूप पृथ्वी के ध्रुवों के हिम भंडारों के विगलन की जो तस्वीर खींची थी, उसके प्रमाण अब अधिक तेजी से नजर आने लगे हैं। कई लोग जो इन प्रमाणों को कोरा झूठ या अप्रमाणिक मान रहे थे, उन्हें शायद आज के नए आंकड़ों पर भी विश्वास न हो, लेकिन गर्म होती पृथ्वी के ध्रुवों पर जमी बर्फ की चादर अब पतली होने लगी है। 

इसके प्रमाण ग्रैविटी रिकवरी द्वारा जलवायु अध्ययनों (गैस मिशन) के लिए प्रयुक्त उपग्रह के आंकड़ों ने स्पष्ट किए हैं। इस प्रकार के एक उपग्रह ने संकेत दिए हैं कि अंटार्कटिक व ग्रीनलैंड की हिम चादरों की प्रति वर्ष 300 खरब टन बर्फ पिघल रही है, जिस कारण समुद्र का स्तर शनैः-शनैः बढ़ रहा है।

ध्रुवीय बर्फ पिघल रही है

ब्रिटेन के वैज्ञानिकों ने वर्ष 2002 से लेकर अब तक इस उपग्रह द्वारा बर्फ व अन्य गतिमान द्रव्यों के वितरण के द्वारा पृथ्वी के गुरूत्वाकर्षण में सूक्ष्म परिवर्तनों का अध्ययन किया है। इन परिवर्तनों के आधार पर ही भारी परिमाण में बर्फ पिघलने की गति में वृद्धि का अनुमान लगाया गया है। अमेरिका के ब्रिस्टल विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने भी पृथ्वी के गुरूत्वाकर्षण में पाए गए परिवर्तनों के आधार पर यह माना है कि पिछले कुछ वर्षों में समुद्र का स्तर बढ़ाने में हिम चादरों का योगदान लगभ दोगुना हो गया है। फिर भी वैज्ञानिक ग्रेस मिशन के दिए गए परिणामों पर एक मत नहीं हैं।

बर्फ विहीन हो जाएगा आर्कटिक

हाल ही में अमेरिका व चीन के वैज्ञानिकों के एक अध्ययन के अनुसार वर्ष 2054 व 2058 तक आर्कटिक समुद्र (उत्तरी ध्रुव) हिम विहीन हो जाएगा। साधारणतया ग्रीष्म ऋतु के बाद सितम्बर माह तक आर्कटिक की बर्फ काफी कम हो जाती है। चूॅंकि, भौगोलिक उष्मन जिस गति से बढ़ रहा है, आने वाले 40-50 वर्षों में ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जाएगी कि सितम्बर माह तक उत्तरी ध्रुव पर बर्फ की मात्रा लगभग नगण्य हो जाया करेगी। एक जलवायु सन्दर्शन द्वारा गणनाओं के आधार पर इस प्रकार के अनुमान लगाए गए हैं।

वैज्ञानिकों का मानना है कि मानव  जनित उष्मन के अलावा अन्य             प्राकृतिक कारणों पर भी बर्फ का पिघलना या जमना निर्भर करता है। वायुमंडल में दीर्घावधि उतार-चढ़ाव जैसे कि उत्तरी अटलांटिक समुद्र में निरंतर स्थानांतरित होते दबाव तंत्र या एल नीनो व ला निना तथा समुद्री तरंगों में धीमे गति से होते परिवर्तन इत्यादि पृथ्वी के ध्रुवों पर जमी बर्फ को प्रभावित करते हैं।

समुद्रों का जल स्तर बढ़ रहा

अंटार्कटिका व ग्रीनलैण्ड ग्लेशियरों में पृथ्वी की 99.5 प्रतिशत बर्फ जमी है, जो कि यदि पूरी तरह पिघल जाए तो पृथ्वी के समुन्दरों का स्तर 63 मीटर तक उठ जाएगा। अर्थात् विश्व के अनेक समुद्र तटीय शहरों की गगनचुम्बी इमारतें जलमग्न हो जाएंगी। हमारे देश में चेन्नई, मुॅंबई जैसे समुद्र तटों पर बसे शहर तो शायद लुप्तप्राय ही हो जाएं। इसीलिए ग्रेस मिशन जैसे कई अभियान लगातार धु्रवों पर बर्फ के पिघलने व समुद्र का स्तर बढ़ने का अनुमापन कर रहे हैं, ताकि समय रहते चेतावनी दी जा सके तथा समग्र नैसर्गिक सम्पदा को इन पर्यावरणीय खतरों से बचाया जा सके।

यह एक चेतावनी भी है कि यदि भौगोलिक उष्मन के कारकों को वर्तमान गति से बेरोकटोक बढ़ने दिया गया तो वह दिन दूर नहीं, जब समुन्दर हमारे दरवाजों तक दस्तक देने लगे। उपग्रहों द्वारा हिमनदों के प्रगलन के वर्तमान अध्ययन ही नहीं बल्कि वर्ष 1980 से समुद्र स्तर को मापने के दीर्घावधि प्रयास भी किए गए हैं।

समुद्र स्तर बढ़ाने वाले

वैज्ञानिक आधार पर समुद्र तीन कारणों से फैलता है। पहला कारण है कि वायुमंडल का तापमान बढ़ने से समुद्र का भी तापमान भी बढ़ता है, जिससे जल का आयतन बढ़ता है। दूसरा अन्तस्र्थलीय हिम शिखरों व हिमनदों की बर्फ पिघल कर नदियों द्वारा लगातार समुद्रों की ओर जाती है। तीसरा अंटार्कटिक व ग्रीनलैंड की हिमचादरों के पिघलने से। 

भौगोलिक उष्मन समुद्र का स्तर बढ़ाने में तीन कारकों की भूमिका को प्रभावित करता है। इन अध्ययनों के अनुसार 1880 से लेकर 1910 के बाद समुद्र स्तर लगातार बढ़ता गया है। तब से लेकर आज तक समुद्र का जल स्तर 20 सेंटीमीटर तक बढ़ गया है। आईपीसीसी की चैथी रिपोर्ट के अनुसार 21वीं सदी के अंत तक समुद्र का स्तर 18-59 सेंटीमीटर बढ़ सकता है। अमेरिका की राष्ट्रीय     अनुसंधान परिषद के जलवायु वैज्ञानिकों के अनुसार समुद्र का स्तर 56-200 सेंटीमीटर बढ़ सकता है।

इतने स्पष्ट आंकड़ों के बाद भी लोग यह विश्वास नहीं कर पाते हैं कि वास्तव में समुद्र फैल रहा है, क्योंकि समुद्र इतना विशाल है कि 20 सेंटीमीटर क्या 100 सेंटीमीटर की बढ़त भी हमारी समझ में नहीं आती। समुद्र के किनारे जब तक डूब नहीं जाएंे, तटीय शहर जब तक जल से लबालब भर नहीं जाएंगे, तब तक जनसाधारण को समुद्र के फैलने का सत्य समझ में नहीं आएगा। 

समुद्रों के फैलने का संकेत केवल तटों के डूबने से ही नहीं मिलता। समुद्री तूफानों, बवंडरों, अतिवृष्टि तथा बादल फटने की घटनाओं में भी वृद्धि समुद्र स्तर में वृद्धि का परिणाम है। ये घटनाएं केवल संकेत दे रही हैं। वास्तविक विभीषिका तो अभी आनी बाकी है, क्योंकि जिन कारणों से समुद्र फैल रहे हैं, उन्हें रोक सकने में प्रतिदिन 3000-4000 वाहन बिकते हैं। देश-दुनिया में तो कोई हिसाब-किताब नहीं। यही नहीं, नए-नए उद्योग, ताप बिजली घर खरबों टन कोयला जला रहे हैं। इतना ईंधन धरती पर जलेगा तो वह गरम तो रहेगी। कैसे रूकेगा यह कारवां। आदमी के अरमानों का रथ कैसे थमेगा। इसके लिए उपदेश बहुत दिए जा सकते हैं, दिए भी जा रहे हैं, पर क्या कोई सुन रहा है? ऊर्जा स्रोतों के दोहन की होड़ लगी हुई है। पूरी अंतर्राष्ट्रीय राजनीति और अर्थव्यवस्था ही ऊर्जा के स्रोतों पर टिकी हुई है। यही नहीं अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा के विक्रेता नवीनीकृत ऊर्जा स्रोतों की व्यावहारिकता पर प्रश्नचिन्ह लगा रहे हैं। इतने भयावह परिदृश्य में एक ही आशा की किरण नजर आती है कि एक न एक दिन खनिज ईंधनों के स्रोत तो समाप्त होंगे ही, पर तब तक समुद्र हमें निगल न लें।

डाॅ. हेम चन्द्र जोशी

63-बी‘5, सेक्टर-8, रोहिणी, नई दिल्ली-85

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