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नई तकनीकी
नई तकनीकी के नए उत्पाद
(01-02-2015)

वैज्ञानिक शोध अध्ययन के साथ अनेक नए उत्पाद बाजार में आ रहे हैं। ऐसे उत्पाद जीवन को और अधिक सुगम बना रहे हैं। इन्हीं के साथ जीवनचर्या की अनेक समस्याएॅं स्वमेव सुलझ रही हैं। वर्तमान में बढ़ते प्रदूषण के मद्देनजर पर्यावरण प्रिय उत्पाद बेहतर साबित हो रहे हैं। वहीं वैज्ञानिक अध्ययनों ने उन खतरों से आगाह किया है, जिनसे हम आमतौर पर अनजान होने पर रोग ग्रसित हो जाते हैं।

बिना बिजली का वर्षा पम्प

नीदरलैंड के शोधकर्ताओं ने खेतों की सिंचाई को बेहद आसान बनाने वाली तकनीक विकसित की है। उन्होंने एक ऐसा वर्षा पम्प बनाया है, जिसे सिर्फ नदी या नहर में रखकर आसपास के खेतों की सिंचाई की जा सकती है। यूरोपीय संस्था क्लाईमेट केआईसी की ओर से पंप को यूरोप की इस साल की सबसे बड़ी तकनीकी खोज का अवार्ड दिया गया। नीदरलैंड की कम्पनी क्यूस्टा ने इसे बनाया है। 

इससे 5 गुना फसल उत्पादन बढ़ेगा। शून्य ईंधन या बिजली लगती है, इस वर्षा पम्प में। एक लीटर प्रति सेकेंड की रफ्तार से छोड़ता है पानी। 82 फिट की उंचाई तक पहुॅंच सकता है पानी। एक साल में ही पंप की पूरी लागत वसूल हो जाती है।

शोधकर्ताओं के मुताबिक यह बिल्कुल नया उपकरण है। हालांकि इसी तरह की डिजाइन वाले पंप का इस्तेमाल प्राचीन मिस्र में किया जाता था। शोधकर्ताओं की मानें तो विकासशील देशों में यह तकनीक ज्यादा कारगर होगी। प्रदूषण न फैलने के कारण यह पर्यावरण के भी अनुकूल होता है। 

लहरों से टकराकर सिंचाई पंप का बड़ा सा पहिया घूमता है। यंत्र की संरचना ऐसी होती है कि इससे वायु का एक दबाव तैयार होता है। यह हवा का दबाव पानी को एक नली के जरिए खेतों तक पहुॅंचा देता है। नदी में पानी की रफ्तार जितनी तेज होती है, उतनी दूर तक पानी जाता है। पहला वर्षा पंप इस साल नेपाल में लगाया गया था। अब एशिया, लेटिन अमेरिका व अफ्रीका में इसके निर्माण की तैयारी शुरू की जा रही है।

टेस्ट ट्यूब बेबी जैसा आलू

शीघ्र ही ऐसे आलू बाजार में         उपलब्ध होंगे, जिनसे  किसी तरह का कोई रोग नहीं होगा। ऐसे आलू आकार में भी एक जैसे होंगे। क्लोन से संक्रमण रहित आलू पैदा किए हैं। इस क्लोन को टेस्ट ट्यूब के माध्यम से प्रयोगशाला में तैयार किया जा रहा है।

पटियाला विश्वविद्यालय के टाइसेक कोर के प्रमुख डाॅ. संजय सक्सेना ने बताया कि आमतौर पर किसानों को आलू की खेती करने के लिए काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। इस समस्या का समाधान करने के लिए आलू का क्लोन टेस्ट ट्यूब में एक विशेष प्रयोगशाला में तैयार किया जाता है। क्लोन को तैयार करने में करीब तीन से चार माह का समय लग जाता है।

क्लोन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि जब भी नए आलू की पैदावार की जाती है, तो सभी आलू संक्रमण रहित पैदा होते हैं। इनमें कोई भी रोग नहीं होता है। इस क्लोन से एक जैसे लाखों या करोड़ों आलू एक ही बार में पैदा किए जा सकते हैं।

डाॅ. सक्सेना के अनुसार क्लोन से तैयार किए गए आलू बड़ी-बड़ी कम्पनियों के लिए बेहद लाभदायक सिद्ध हो सकते हैं। चिप्स बनाने वाली कम्पनियों को एक ही जैसे बड़ी संख्या में आलू चाहिए होते हैं। क्लोन के चलते आलू की खेती करने में आसानी हो जाएगी। इस आलू की खेती 110 दिन में तैयार हो जाती है। क्लोन को अक्टूबर से पहले तैयार किया जाना जरूरी होता है, ताकि इसकी नवम्बर में बुवाई की जा सके। इन दिनों विश्वविद्यालय में इसकी खेती की जा रही है।

खारे पानी में सिंचाई 

सिंचाई के लिए मीठे पानी की उपलब्धता का संकट अब जल्दी खत्म होने वाला है। वैज्ञानिकों ने ऐसी तकनीक विकसित कर ली है, जिससे खारे पानी को भी सिंचाई के लिए इस्तेमाल किया जा सकेगा।

एम्स्टर्डम स्थित फ्री विश्वविद्यालय के कृषि वैज्ञानिकों के दल ने किसानों के साथ खेतों में लगातार प्रयोग के बाद एक ऐसी तकनीक इजाद की है, जिससे समुद्री तट के आसपास के क्षेत्रों में जहाॅं पानी में अम्लता की मात्रा काफी कम होती है, वहां आलू, गाजर, पत्ता गोभी, प्याज और चुकंदर जैसी सब्जियाॅं उगाई जा रही हैं।

वैज्ञानिकों ने इसके लिए एक स्थानीय किसान मार्क रेसिलबर्ग के साथ मिलकर कुछ नए प्रयोग किए हैं। रेसिलबर्ग के खेतों में सिंचाई के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले मीठे पानी में कुछ प्रतिशत खारा पानी मिलाया गया और कम्प्यूटर ने जैसे ही इस घोल को सिंचाई के लिए इस्तेमाल करने लायक बताया इसे खेत में डाल दिया गया।

सेकेंडों में चमकेंगे दांत

पीले पड़े दांतों की सफाई मात्र छह सेकंड में हो सकती है। दांतों को चमकदार बनाने के लिए एक कम्पनी ने स्मार्ट टूथ ब्रश बनाया हैं कम्पनी ने दावा किया है कि आमतौर पर लोग ब्रश करने के लिए चार-पांच मिनट लगाते हैं। इसके बावजूद दांतों की ठीक-टीक सफाई नहीं हो पाती। इस समस्या को दूर करने के लिए कम्पनी ने 3डी प्रिंटेड टूथ ब्रश बनाया है, जो उपयोग करने वाले व्यक्ति के मुॅंह में फिट किया जा सकता है। यह सिर्फ छह सेकंड में दांतों की सफाई कर देता है। कम्पनी ने इस ब्रश को ब्लिजिडेंट नाम दिया है। इस उपकरण में लगे लगभग 400 रेशे दांतों के चारों ओर रगड़ खाते हैं, जिससे वे साफ हो जाते हैं।

टीवी सिग्नल एंटीना

भारतीय मूल के अमेरिकी उद्यमी चैत कनौजिया ने एक छोटा एंटिना बनाया है। यह एंटिना टेलीविजन के सिग्नल पकड़ उसे इंटरनेट के जरिए उपभोक्ताओं को भेजने में सक्षम है।  कनौजिया के इस अविष्कार से अमेरिकी टीवी उद्योग जगत में खलबली मच गई है। जिनकी कम्पनी का एंटिना एयरो, एबीसी, एनबीसी और सीबीएस जैसी बड़ी प्रसारण कम्पनियों के लिए खतरा बन गया है। छोटा एंटिना उपभोक्ताओं को किसी भी उपकरण पर इंटरनेट के जरिए प्रसारण देखने व रिकार्ड करने की सहूलियत देता है। इसके लिए किसी केबल या तार की जरूरत नहीं है। कम्पनी यह काम प्रत्येक उपभोक्ता को एक रिमोट एंटिना एवं एक डीआर देकर कर रही है। प्रसारण कम्पनियों ने इसके खिलाफ अमेरिका के उच्च न्यायालय में मुकदमा दायर किया है।

बैंगनी टमाटर

लाल रंग के टमाटर के बाद जीन संवर्द्धित फसलों के लिए विकास में लगे वैज्ञानिकों ने बैगनी रंग का टमाटर विकसित किया है। इसका श्रेय ब्रिटेन के नार्विच स्थित ‘जांन इंस सेंटर’ के वैज्ञानिकों को जाता है। केन्द्र की प्रोफेसर कैथी मार्टिन को उम्मीद है कि बैगनी टमाटर से तैयार किए गए जूस पर शोध के बाद शोधकर्ता इसकी पौष्टिकता को जांच कर पाएंगे। जिन्होंने बताया कि इन बैगनी टमाटरों में वही तत्व मौजूद है जो ब्लूबेरी और करौंदे में पाए जाते हैं, जो मानव स्वास्थ्य के लिए आवश्यक हैं।

फफूंद से बनेगी कार

जीवन में फफूंद बहुत उपयोगी है। फफूंद का उपयोग पावरोटी से लेकर बीयर बनाने तक में किया जाता है। आने वाले दिनों में मामूली सी लगने वाली फफूंद के जरिए बेहतर दवाएं, भवन निर्माण सामग्री, ईंधन और कार भी बनाई जा सकेगी।

वैज्ञानिकों का मानना है कि फफूंद सुरक्षित कीटनाशक, चिकित्सकीय प्रत्यारोपणों या हरित ईंधन के निर्माण में मुख्य भूमिका निभा सकता है। वैज्ञानिक कहते हैं, हम फफूंद युग में प्रवेश कर सकते हैं। जो पर्यावरण संकट से जूझ रही दुनिया को बचाने में मददगार साबित होगा। अमेरिका में बोजोमन स्थित मोटाना विश्वविद्यालय के वैज्ञानिग ग्रे स्ट्रोबे ने फफूंद की एक खास प्रजाति से एक जैव ईंधन विकसित किया है। फफूंद की इस खास प्रजाति का नाम एस्कोराइन सारकोइड्स है, जिसे आम बोलचाल में जेली ड्राप मशरूम कहा जाात है। स्ट्रोबे ने इस जैव ईंधन को अपनी मोटर बाइक में परीक्षण करके देखा। खमीरयुक्त फसल से ईंधन तैयार करने के विपरीत ग्रेस्ट्रोबे द्वारा मशरूम से तैयार किया गया       ईंधन कृषि जनित अपशिष्ठ से तैयार किया जा सकता है।

इवोकेटिव कम्पनी के सीईओ इबेन बोवेर का मानना है कि फफूंद से कार भी बनाई जा सकती है। कवक जाल लचीला होता है। वास्तव में यह पालीमर या एक तरह का प्लास्टिक है, जिसको जैव तरीके से विघटित किया जा सकता है। इसको विभिन्न घनत्वों में विकसित किया जा सकता है।

प्रस्तुति: रमेश व्यास

रायपुर (छत्तीसगढ़)

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