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प्रकृति संरक्षण को समर्पित एकमात्र पत्रिका आम आदमी की भाषा में
सामयिक
जीवन में प्रकाश और मिट्टी
(01-01-2015)

इंसान माटी का पुतला है, जिसके जीवन को बनाए रखने के लिए मिट्टी से भोजन मिलता है। भोजन से ऊर्जा लेकर इंसान गतिमान होता हुआ आज दोराहे पर जा खड़ा हुआ है, जहाॅं उसे तरक्की के लिए प्रकाश की   अधिक जरूरत हो रही है। टिकाऊ प्रकाश तकनीकियों को लेकर इंसान असीम संसार को पाना चाहता है।  भविष्य की चुनौतियाॅं उसे सजग कर रही हैं।

जीवन में प्रकाश और प्रकाश  आधारित प्रौद्योगिकियों से समूची दुनियाॅ में बदलाव के कई दौर आए हैं। आज वैश्विक स्तर पर समाज के भविष्य को उत्तरोत्तर विकास की राह पर चलने के लिए प्रकाश की नई टेक्नोलाजी लाना चुनौती बन रही है। विकास के लिए ऊर्जा संसाधनों का विस्तार टिकाऊ विकास के साथ हो। ऊर्जा उत्पादन की ऐसी प्रौद्योगिकी हो जो विकसित और विकासशील दोनों तरह के देशों के जीवन में गुणवत्ता बनाए रखे। इन्हीं उद्देश्यों को लेकर वर्ष 2015 ‘‘प्रकाश’’ और ‘‘प्रकाश आधारित प्रौद्योगिकियों’’ का अंतर्राष्ट्रीय वर्ष घोषित किया गया है। 

प्रकाश विज्ञान में मील का पत्थर

वर्ष 2015 के साथ ‘प्रकाश विज्ञान’  की महत्वपूर्ण श्रृंखला की वर्षगांठ के साथ मेल खाती है। प्रकाश विज्ञान के इतिहास में मील के पत्थर में 1015 में इब्न अल हैदम, 1815 में फ्रेसनेल द्वारा एक लहर में प्रकाश की अवधारणा को प्रतिपादित किया। 1865 में प्रकाश और प्रकाश आधारित टेक्नोलाजी के साथ ही आइंस्टीन के सिद्धांत 1915 में ‘समय सापेक्षता’ के माध्यम से ब्रह्मांड विज्ञान की ओर कदम पढ़े। 

लौकिक जगत को सुखमय बनाने वाली अनेक खोजों में ‘विल्सन’ और ‘काओ’ की उपलब्धियों से माइक्रोवेव हमें मिला। आॅप्टिकल संचार के लिए फाइबर में प्रकाश के संचरण की खोज मील का पत्थर साबित हुई। प्रकाश और प्रकाश तकनीकी खोजों की वर्षगांठ का उत्सव 2015 में इसलिए ही मनाए जाने का निर्णय लिया गया है, ताकि इससे प्रकृति को निरंतर उजागर करने का हौसला हमें मिलता रहे। 

लक्ष्यों पर ध्यान नहीं

विश्व में बढ़ती ऊर्जा की मांग और वैश्विक तापन में बढ़ोत्तरी वैज्ञानिकों को प्रकाश की नई तकनीकियों की खोजों को तीव्रतर कर रही है। ऊर्जा उत्पादन के परम्परागत साधनों से  धरती पर ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन अबाध गति से जारी है। इसकी परिणिति में प्राकृतिक संसाधन खत्म हो रहे हैं, वहीं पृथ्वी का तापमान बढ़ते जा रहा है। 

क्योटो शिखर सम्मेलन में विश्व के अनेक देश कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए सहमत हुए थे, मगर किसी भी राष्ट्र ने गंभीरता से अपने लक्ष्यों पर ध्यान नहीं दिया। वैश्विक कार्बन उत्सर्जन को कम करने की पहल नहीं हुई, जिसके कारण अनेक पर्यावरणीय संकट उठ खड़े हुए हैं। आर्थिक विकास के लिए प्रकाश का आज सर्वाधिक महत्व है, जिसकी मांग बढ़ती जा रही है। 

बढ़ती हुई मांग के अनुरूप ऊर्जा उत्पादन नाकाफी हो रहा है। इस खाई को पाटने के लिए हमें प्रकाश की उन तकनीकियों की खोज की ओर ज्यादा ध्यान देना चाहिए, जिसके उत्पादन से कार्बन उत्सर्जन कम हो। टिकाऊ विकास की नीति अपनाते हुए आने वाले समय में अपरम्परागत ऊर्जा संसाधनों की तकनीकियों को व्यावहारिक बनाने के लिए कार्य करना होगा।

सौर ऊर्जा

सौर ऊर्जा उन ज्ञात नई तकनीकियों में से एक है, जो पर्यावरण को नुकसान पहुॅंचाए बगैर ऊर्जा प्रदान कर रही है। सूर्य से ऊर्जा लेकर हम अपनी ऊर्जा की सारी जरूरतों को पूरा कर सकते हैं। मगर, सोलर ऊर्जा तकनीकी आज भी आम व्यवहार से बाहर है। सूरज से ऊर्जा लेने के लिए अब तक जो सौर पैनल बने हैं, वह काफी मंहगे साबित हो रहे हैं। यही कारण है कि सौर ऊर्जा उत्पादन काफी कम हो रहा है। सौर ऊर्जा के व्यावसायिक इस्तेमाल में इसकी उच्च लागत बाधा बन रही है। ग्रिड पावर जनरेशन के लिए सौर ऊर्जा की शुरूआती लागत को देखते हुए विकासशील देश पीछे हट रहे हैं।

अंतर्राष्ट्रीय प्रकाश वर्ष

संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा 2015 को प्रकाश और प्रकाश की तकनीकियों का वर्ष घोषित कर एक पहल की है। इसके माध्यम से विश्व का ध्यान इस ओर आकृष्ट किया है कि जीवन के तम को निरंतर गतिमान प्रकाशमान बनाए रखने के लिए हमें नई-नई तकनीकियों की खोज करते जाना जरूरी है।

मिट्टी स्वस्थ जीवन के लिए

मिट्टी ही जीवन है। मिट्टी ही खाद्य संरक्षण और सुरक्षा देने के साथ हमारे सतत् भविष्य के लिए आवश्यक है। मिट्टी के अमूल्य महत्व को उजागर करने के लिए वर्ष 2015 के लिए एक स्वस्थ जीवन के लिए स्वस्थ मिट्टी का नारा दिया गया है।

धरती का एक तिहाई क्षेत्र का भूभाग भू-क्षरण, मरूस्थलीकरण, औद्योगिक व रासायनिक कृषि के कारण मिट्टी को खराब कर रहा है। स्वस्थ मिट्टी कृषि विकास के साथ स्वस्थ खाद्यान्न उत्पादन के लिए जरूरी है। मगर कृषि तकनीकी में रसायनों, कीटनाशकों के उपयोग से मिट्टी अनुपजाऊ हो रही है। कृषि बंजर हो रही है। मिट्टी में उर्वरता कम होने से खाद्यान्न उत्पादन में कमी आने लगी है। मिट्टी की गुणवत्ता घटने से गांव खत्म हो रहे हैं, ग्रामीण पलायन के लिए मजबूर हो रहे हैं। ग्रामीणों के समक्ष आजीविका के खतरे उठ खड़े हुए हैं। खेती करने वाले किसानों के सामने सबसे बड़ी समस्या उठ खड़ी हुई है कि फसल उत्पादन लागत के अनुरूप नहीं हो रहा है। समस्या विकराल हो रही है और किसान आत्महत्या करने को मजबूर भी हो रहे हैं।

रासायनिक खेती के दुष्परिणाम

पंजाब और हरियाणा राज्यों का उदाहरण आज हमारे सामने है, जहाॅं हरित क्रांति के दौर ने वहाॅं के किसानों  को रासायनिक कृषि की ओर धकेल दिया। मात्र तीन दशक बाद ही रासायनिक खेती के खतरे उठ खड़े हुए, जहाॅं किसानों का ही नहीं, गांवों का जनजीवन भी भयावह हो चुका है। रसायन कीटनाशक मिट्टी में घुल-मिल गए हैं। मिट्टी से रिसता हुआ जल जमीन में गया तो भूजल भी विषाक्त हो गया। आज पंजाब में ऐसे कई गांव हैं, जहाॅं के भूजल को पीना जहर साबित हो रहा है।

कृषि भूमि बंजर में बदल रही है, जहाॅं फसल उत्पादन गिर रहा है। ऐसी मिट्टी को फिर से स्वस्थ बनाने के लिए सैकड़ों बरस लगेंगें। यही कारण है कि समृद्ध पंजाब में मिट्टी की विकृति से असंख्य स्वास्थ्य समस्याएॅं सामने आ रही हैं।

मिट्टी की गुणवत्ता बनाए रखना जरूरी

सवाल उठता है कि मिट्टी को हम कैसे स्वस्थ बनाए रखें। भविष्य की पीढ़ियों के लिए मिट्टी की गुणवत्ता को बनाए रखना जरूरी है। जीवन को बनाए रखने के लिए वायु एवं जल के बाद भोजन बहुत जरूरी है। मिट्टी स्वस्थ नहीं हुई तो हमें भोजन भी उपलब्ध नहीं हो सकेगा। दुनियाॅ के किसान ही एकमात्र ऐसे उत्पादक हैं, जो हमारा पोषण करते हैं। मिट्टी में विकृति आने के कारण किसान ही कृषि कार्य से हटकर पलायन करने को मजबूर हों, ऐसी विषम परिस्थितियों को खत्क करने के लिए पूरी दुनिया को एकजुट होकर पहल करनी होगी।

रविन्द्र गिन्नौरे

पर्यावरण ऊर्जा टाइम्स

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