/
/
/
/
/
/
/
/

प्रकृति संरक्षण को समर्पित एकमात्र पत्रिका आम आदमी की भाषा में
पारिस्थितिकी
कोयल की चालाकी
(01-09-2014)

कोयल दूसरे पक्षियों के घोंसलों में अंडे देने के लिए बदनाम है। मगर ये अन्य पक्षी जो अनजाने में कोयल के अंडों के मेजबान बनते हैं, वे भी पीछे नहीं हैं। हाल के एक अध्ययन से पता चला है कि इन पक्षियों में अपने अंडों की पहचान के लिए कुछ उपाय विकसित हुए हैं। हालांकि अभी पता नहीं है कि ये उपाय कितने कारगर और कामयाब हैं। कोयल (कुकुलस केनोरस) ऐसे अंडे देने में सक्षम हैं जो किसी मेजबान पक्षी के अंडों जैसे दिखें। और तो और, कोयल के अंडे मेजबान पक्षी के अंडों से पहले फूटते हैं और इनमें से निकले चूजे मेजबान पक्ष़्ाी के अंडों या चूजों को बाहर गिरा देते हैं। परिणाम यह होता है कि मेजबान पक्षी कोयल के चूजों को अपना समझकर दाना देते रहते हैं।

इन घुसपैठियों से बचने के लिए मेजबान पक्षियों को करना यह होगा कि फूटने से पहले इन अंडों को पहचानकर अपने घोंसले से बाहर कर दें। नेचर कम्युनिकेशन्स में प्रकाशित एक शोध पत्र से लगता है कि मेजबान पक्षी इसका प्रयास करते भी हैं। हारवर्ड विश्वविद्यालय की जीव वैज्ञानिक मैरी केसवेल स्टोडार्ड ने कम्प्यूटर की मदद से एक अध्ययन करके बताया है कि मेजबान पक्षियों के अंडों पर ऐसे पैटर्न विकसित हुए हैं, जिनके आधार पर वे अपने अंडों को पहचान सकते हैं।

स्टोडार्ड और उनके साथियों ने लंदन के प्राकृतिक इतिहास संग्रहालय से 689 अंडों की तस्वीरें खींची। ये अंडे उन पक्षी प्रजातियों के थे, जिनके घोंसलों में कोयल अंडे देती है। तस्वीरें एक ऐसे कैमरे से खींची गई थीं, जो उस प्रकाश को पकड़ता है, जिसे पक्षी देख पाते हैं। अर्थात ये तस्वीरें बताती हैं कि ये अंडे पक्षियों को कैसे दिखते होंगे। 

अब शोधकर्ता यह देखना चाहते थे कि पक्षी इन अंडों पर बने चितकबरे पैटर्न को कैसे देखते-समझते होंगे। इसके लिए एक पैटर्न पहचान सूत्र विकसित किया गया, जिसे नेचर पैटर्नमैच कहते हैं। जब एक-एक प्रजाति के अंडों के पैटर्न का अध्ययन किया गया तो काफी विविधता सामने आई। सबसे प्रमुख निष्कर्ष तो यह था कि अधिकांश मेजबान प्रजातियों में अंडों पर विशिष्ट ‘सिग्नेचर पैटर्न’ थे। यह भी देखा गया कि कोयल जिन पक्षियों के घोंसलों का ज्यादा शोषण करती है, उनके अंडों के पैटर्न कहीं ज्यादा जटिल थे। कुछ प्रजातियों में एक ही मादा के सारे अंडों में एक सा पैटर्न था, जबकि कुछ पक्षियों में एक ही मादा द्वारा अलग-अलग समय पर दिए गए अंडों के पैटर्न अलग-अलग थे।

शोधकर्ताओं का निष्कर्ष है कि मेजबान पक्षी पूरी कोशिश करते हैं कि कोयल उनका शोषण न कर पाए। मगर तथ्य यह है कि कोयल फिर भी करतब दिखा जाती है। इसलिए कई वैज्ञानिकों को लगता है कि यह              अध्ययन अभी भी इस मान्यता पर टिका है कि कम्प्यूटर वही देख रहा है, जो पक्षी देखते हैं। स

लेख पर अपने विचार लिखें ( 0 )                                                                                                                                                                     
 

भारत के समाचार पत्रों के पंजीयक कार्यालय की पंजीयन संख्या( आर. एन. आर्इ. नं.) : 7087498, डाक पंजीयन : छ.ग./ रायपुर संभाग / 26 / 2012-14
संपादक - ललित कुमार सिंघानिया, संयुक्त संपादक - रविन्द्र गिन्नौरे, सह संपादक - उत्तम सिंह गहरवार, सलाहकार - डा. सुरेन्द्र पाठक, महाप्रबंधक - राजकुमार शुक्ला, विज्ञापन एवं प्रसार - देवराज सिंह चौहान, लेआउट एवं डिजाइनिंग -उत्तम सिंह गहरवार, विकाष ठाकुर
स्वामित्व, मुद्रक एवं प्रकाषक : एनवायरमेंट एनर्जी फाउडेषन, 28 कालेज रोड, चौबे कालोनी, रायपुर (छ.ग.) के स्वामित्व में प्रकाषित, महावीर आफसेट प्रिंटर्स, रायपुर से मुदि्रत, संपादक - ललित कुमार सिंघानिया, 205, समता कालोनी, रायपुर रायपुर (छ.ग.)

COPYRIGHT © BY PARYAVARAN URJA TIMES
DEVELOPED BY CREATIVE IT MEDIA