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शख्सियत / साक्षात्कार
स्वच्छता से बनेगा सशक्त भारत
(01-11-2014)

21वीं सदी में जहां एक ओर आर्थिक सम्पन्नता के लिए होड़ मची है, वहीं दूसरी ओर गंदगी का अंबार लगता जा रहा है। घर-परिवार से लेकर मुहल्ले में हमारे अपने कार्यस्थलों पर गंदगी पसरी पड़ी है। साफ-सफाई हजार रोगों की एक दवा है। लेकिन इसके ठीक विपरीत जैसे-जैसे हम सभ्य हुए, हम कचरा ज्यादा फैलाने लगे। गंदगी का आलम इतना गहरा गया है कि बरसात में शहरों की नालियां सड़कों में बहने लगती हैं। शहरी कचरा आज एक भयावह समस्या बनता जा रहा है।

गांधी और स्वच्छता

महात्मा गांधी ने साफ-सुथरे भारत की कल्पना की थी। गांधी की कल्पना को साकार स्वरूप देने में 60 बरस लग गए। देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गांधी जयंती से एक अभिनव अभियान चलाया। अब तक 2 अक्टूबर को गांधी की समाधि पर फूलमाला चढ़ाई जाती थी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वच्छता जागरूकता अभियान चलाया, जिन्होंने खुद झाड़ू उठाई और सफाई की। प्रधानमंत्री के ऐसे अनुकरणीय कार्य के साथ पूरा देश एकजुट हुआ।

प्रधानमंत्री खुद जुटे

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वच्छता अभियान को स्थायी देने के लिए एक महती कार्य भी किया। देश के नागरिकों से स्वच्छता के लिए शपथ लेने के लिए प्रेरित किया। स्वच्छता की शपथ दिलाते हुए कहा गया कि मैं हर बरस 100 घंटे श्रमदान करते हुए स्वच्छता के संकल्प को चरितार्थ करूॅंगा। सचमुच गांधी जयंती के पहले से ही समूचे देश में साफ-सफाई करने के लिए लोग जागरूक थे। हर जगह, हर तबके के लोगों के हाथ झाड़ू नजर आई जो सफाई में जुटे। स्वच्छ रखने के लिए केवल सफाई कामगार ही नहीं, बल्कि खुद को भी जुटना होगा। ऐसा जज्बा प्रधानमंत्री ने पैदा किया। देश के             प्रधानमंत्री की पहल रंग लाई और लोगों का ध्यान अपने आसपास के कचरे को साफ करने की ओर गया और सफाई हो गई।

देशव्यापी अभियान

स्वच्छता के देशव्यापी अभियान से सशक्त भारत की तस्वीर उभर रही है। स्वच्छता की शपथ लेने अपनी बात पर चलकर श्रमदान करते हैं तो बढ़ते कचरे की समस्या सुलझ जाएगी। हमें खुद सफाई करना है, तो गंदगी हम कदापि नहीं करेंगे। हमारा घर-आंगन साफ-सुथरा होगा, जिसमें रोगजनक कीटाणुओं के लिए कोई जगह नहीं होगी। नालियां जाम नहीं होंगी तो नदियों में बढ़ते प्रदूषण से विराम लग जाएगा। हमारी नदियां फिर से जीवनदायिनी बन जाएंगी। पतित पावनी गंगा अपने नाम को सार्थक कर सकेगी। बस एक ही संकल्प शपथ पर कार्य करने की ईमानदारी से मंशा होनी चाहिए। व्यक्तियों के बीच से महापुरूष जो कहते हैं, उनके अनुरूप जीवन को ढालना चाहिए। महात्मा गांधी के विचारों को मूर्त रूप देने संकल्प देश के              प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लिया।          गांधी जयंती पर समूचे देश में चले सफाई अभियान से नव जागरण हुआ। स्वच्छता रखकर कई रोगों को खत्म किया जा सकता है। स्वच्छता से बेहतर आबोहवा वातावरण में बहती है। सशक्त भारत ऐसे ही बना सकते हैं। 

कचरा न हो समस्या

कचरा और उससे फैलता प्रदूषण विश्वव्यापी समस्या बन चुका है। 20वीं सदी में जिन नगरों से ज्यादा कचरा निकलता है, उससे उसके बढ़ते विकास को देखा जाता था। अब अजैविक कचरा (जो विघटित नहीं होता) कई समस्या पैदा कर रहा है। जैविक कचरा (अपघटित होने वाला) का समुचित प्रबंध कर इसका बेहतर उपयोग के लिए हम गंभीर नहीं हुए। आज के दौर में ई-कचरा जो घातक प्रदूषण फैलाता है, विश्वव्यापी समस्या बन चुका है। तो परमाणु अपशिष्ठ मानवता के लिए अभिशाप बनता जा रहा है। दुनिया में शहर बढ़ रहे हैं, वहीं कचरे की मात्रा बढ़ती जा रही है। औद्योगिक क्षेत्रों से निकला कचरा, अस्पतालों का कचरा वातावरण को प्रदूषित करने लगा है, जिनसे अनेक स्वास्थ्यगत समस्याएॅं उठ खड़ी हुई हैं।

कचरा प्रबंधन हो

बढ़ते हुए कचरे को शुरूआती दौर में पाटने (भूमि भरण) के काम में लाया गया। मगर यह प्रबंधन बाद में ज्यादा घातक साबित हुआ। जहाॅं-जहाॅं ऐसे कचरे से जमीन समतल की गई, उन क्षेत्रों में रहना दुष्कर हो गया है। वहाॅं का भूजल भी विषाक्तता के कगार में पहुॅंच चुका है। कचरे से पाटे गए क्षेत्र से अनेक गैसें उत्पन्न हो रही हैं, जो वातावरण को प्रदूषित करने लगी हैं। कचरा की समस्या से महानगर जूझ रहे हैं, क्योंकि कचरा प्रबंधन के लिए समुचित नीतियाॅं नहीं बनाई गई हैं। इसके चलते महानगरों का कचरा आसपास के गांव-कस्बों में डम्प किया जा रहा है। ऐसे क्षेत्र में वातावरण दूषित होने लगा है। कहीं संक्रमित रोग फैलने लगे हैं, जहां दुर्गन्ध के कारण जनजीवन कलुषित हो गया है।

कचरा प्रबंधन के लिए सरकार ने नियम-कानून बनाए हैं। परन्तु नागरिकों में जागरूकता का अभाव है। इस कारण बढ़ते कचरे और उससे उत्पन्न समस्याओं की ओर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया जा रहा है।

अजैविक कचरा जो सड़ता-गलता नहीं है, जिसकी अधिकता से नालियां अवरूद्ध हो रही हैं। नालियों का गंदा पानी जहाॅं-तहां अवरूद्ध हो, सड़कों पर बह रहा है। बरसात में नालियां सड़कों में आ जाती हैं, जहाॅं कचरा बहता रहता है। बरसात का पानी घरों में फैलने लगा है। यह आम समस्या हो गई है।

कचरा न जलाए

लोगों की बदली सोच ने कचरे की समस्या को और अधिक बढ़ा दिया है। घरों का कचरा आम लोग नालियों में डालने लगे हैं। वहीं सफाई-कामगार कचरे को एकत्र कर जलाने लगे हैं। नालियों का कचरा पानी के बहाव को रोक रहा है। कचरे में प्लास्टिक की अधिकता होती है। ऐसे कचरे को जलाए जाने से अनेक विषैली गैसें निकलती हैं, जो अनेक घातक रोगों के लिए जिम्मेदार हैं। कचरे से कंचन बनाया जा सकता है, बशर्ते कि उसका समुचित प्रबंधन हो। शहरों में ही नहीं गांव-कस्बे में कचरा निपटाने के लिए उपाय करना चाहिए।

पर्यावरण ऊर्जा टाइम्स

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