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प्रकृति संरक्षण को समर्पित एकमात्र पत्रिका आम आदमी की भाषा में
विष मुक्ति अभियान
कीटनाशकों ने मां के दूध में भी घोला जहर
(01-06-2014)

इस वक्त जब हवा, पानी और जमीन भी जहरीली हो चुकी है, खाद्य पदार्थ भी जहरीले हो गए हैं। गाय के दूध में एक तरफ मिलावट की बात है, तो नकली     दूध का भारी विस्तार हो चुका है। वहीं गाय के दूध में विदेशों में विषाक्त रसायनों के पाए जाने की अनेकों बार पुष्टि हुई है। उस वक्त यह भी जांच का बिन्दु हो गया है कि क्या माताओं के स्तन से बच्चों को पिलाया जाने वाला दूध भी अब सुरक्षित है या नहीं। सर्वश्री रूथ एम. हफीज एवं शरान ए. टेलर के अनुसार 1970 एवं 1980 के दशक में मातृ स्तन से पोषण में विश्व स्तर पर काफी वृद्धि हुई, जहाॅं 1960 के दशक में अस्पताल में जचकी कराकर बाहर जा रही 25 प्रतिशत महिलाएॅं स्तनपान कराती थीं, वहाॅं 1980 तक यह बढ़कर 60 प्रतिशत हो चुका था।

स्तनपान से बच्चे के साथ भावनात्मक लगाव के अलावे भी अनेकों अन्य फायदे भी हैं। इससे उत्कृष्ट पोषण मिलता है। किसी भी तरह के संक्रमण (इंफेक्शन) से सुरक्षा मिलती है। बच्चे की रोगरोधक क्षमता भी बढ़ती है। माता को गर्भ  निरोधन का समय मिलता है। इसके अलावे कृत्रिम दूध का क्रय करने का अर्थ भार भी माॅं पर नहीं पड़ता। 

किन्तु, शिशु आहार विक्रेता कम्पनियों के जबरदस्त विज्ञापन एवं प्रचार के कारण स्तन पोषण में काफी गिरावट आई थी। विकासशील देशों में भी स्तनपान की जगह बाॅटल से दुग्धपान का प्रचलन तेजी से बढ़ा था। परिणामस्वरूप गरीब परिवारों पर इसका काफी अधिक भार बढ़ा था। साथ ही बोतल से दूध पिलाने (बाटल फीडिंग) के गहरे दुष्प्रभावों में ऐसे दुखद दुष्प्रभाव भी बढ़े, जिनको स्तनपान से रोका जा सकता था; यथा- बाल डायरिया (पेचिस-दस्त), कुपोषण, इंफेक्शन में वृद्धि, इन बीमारियों के फलस्वरूप बाल मृत्यु। 

फलस्वरूप बाटल फीडिंग के स्थान पर स्तनपान ही बाल्य पोषण के लिए सुरक्षित विकल्प था और है। किन्तु, चिंता की बात यह है कि खाद्य उत्पादन प्रणाली में बढ़ते कीटनाशक, रोगनाशकों के प्रयोग से माॅं के दुग्ध में भी इनके अंश का पाया जाना है। अनेकों प्रकार के रोगनाशी रसायन यथा क्लोरडेन, हेप्टाक्लोर, डी.डी.टी., डी.डी.ई. एवं आर्गनो हैलोजन कंपाउंड, पर्यावरण में जैव विघटित नहीं होते। अपितु, ये मानव की वसा में जैव संकेन्द्रित हो जाते हैं, जो कि खाद्य प्रणाली में सर्वप्रथम आहार है। 

किन्तु, माॅं के स्तनपान के दूध पर आश्रित बच्चे पर ये रसायन और भी ज्यादा दुष्प्रभाव डालते हैं। 1960 के दशक में माॅं के दूध में कीटनाशकों के पाए जाने पर अमेरिका में बहुत बवाल मचा था। 1978 में अमेरिका में प्रकाशित रिपोर्टों में ‘‘ईलानाय’’ राज्य में गौ दुग्ध के 96 प्रतिशत नमूनों में डाए-एल्ड्रिन, 93 प्रतिशत नमूनों में हेप्टाक्लोर एपाक्साइड, 73 प्रतिशत नमूनों में लिडेन, 69 प्रतिशत नमूनों में क्लोडेन एवं 48 प्रतिशत नमूनों में डी.डी.टी. के अवशेष पाए गए थे। 

चूॅंकि, गाय के दूध में कीटनाशकों का संदूषण पर्याप्त मात्रा में पाया गया था, इसलिए माॅं के दूध में भी इसके संदूषण की जांच किए जाने हेतु उत्सुकता वैज्ञानिकों में जागृत हुई। सबसे पहले वर्ष 1951 में पहली 32 काली महिलाओं में वाशिंगटन डीसी में दुग्ध परीक्षण पर 0.13 पार्ट्स पर मिलिअन डी.डी.टी. का स्तर पाया गया। दस वर्षों के उपरांत कैलीफोर्निया के एक छोटे से सर्वेक्षण में डी.डी.टी. का 0.12 पीपीएम तथा डी.डी.ई. की मात्रा 0.25 पीपीएम पाई गई। 1981 के पूर्व मुख्यतया डी.डी.टी. की विषाक्तता पर ही परीक्षण किए जाते रहे।

वर्ष 1981 में किए गए अमेरिका के राष्ट्रीय सर्वेक्षण में 1400 माताओं के दूध में पर्याप्त मात्रा में डाय-एल्ड्रिन, हेप्टाक्लोर एपाक्साइड, आक्सीक्लोरडेन इत्यादि पाया गया। तदुपरांत किए गए लगभग सभी अध्ययनों में पाया गया कि बच्चों को स्तनपान करा रही सभी माताओं में इस प्रकार के कीटनाशक/रोगनाशक माॅं के दूध में उपलब्ध हैं।

माॅं के दूध में यह विषाक्ता  आती कहाॅं से?

मानव शरीर में माॅं एक लीटर तक   दूध प्रतिदिन बना सकती है। यह एक अत्यंत जटिल अंग एवं जटिल प्रक्रिया है, जिसमें रसायनों की संरचना भी होती है और निष्कर्षण भी होता है। दूध में प्रोटीन, वसा, कार्बोहाइड्रेट, खनिज, विटामिन, हारमोन तथा एंटीबाडी होते है। दूध में उपलब्ध वसा पानी में तैरती बूंदों की तरह होता है, जो कि ईमल्सन रूप में एक सेमी परमीएबल मेंब्रेन से ब्लड प्लाज्मा (रक्त प्लाज्मा) से अलग रहती है। ये विषाक्त रसायन दूध में मिल्क प्रोटीन के साथ मिलकर निष्कर्षित हो सकते हैं या दुग्ध वसा के साथ चिपककर आ सकते हैं या दुग्ध वसा कणों को पूरी तरह संदूषित कर उपलब्ध हो सकते हैं।

डी.डी.टी. एवं क्लोरडेन जैसे आर्गेनोक्लोरीन, विषैले रसायन वसा में घुलनशील होने के कारण मानव शरीर के वसा में लम्बे समय तक यथावत रह सकते हैं। माॅं के दुग्ध काल में शारीरिक वसा के संवाहन (प्रवाह)  और आवाजाही बढ़ने के कारण वसा में घुले रसायनों का संवाहन भी बढ़ जाता है। फलस्वरूप दुग्ध काल में माॅं के दुग्ध के साथ ये ‘‘वसा घुलनशील रसायन’’ दूध के साथ आ जाते हैं। फलस्वरूप ये दुग्धकाल से पूर्व में भी माताओं को यदि इन वसा घुलनशील रसायन युक्त पदार्थों का आहार दिया गया हो तो वे दुग्ध काल में दुग्ध की गुणवत्ता को संदूषित कर सकते हैं। 

एक माता के गर्भाधान से पूर्व, पूरे जीवनकाल में कीटनाशकों एवं रोगनाशकों (रसायनों) का शरीर पर जमाव, माॅं के दूध को दुष्प्रभावित कर सकता है। इस कारण से वसा (फैट) में घुलनशील रसायन मां के दूध को सबसे ज्यादा संदूषित कर सकते हैं।

सामान्यतौर पर शैशव काल में बच्चे तीन स्तर तक प्रभावित हो सकते हैं। पहले तो इन विषाक्त पदार्थों का दिमाग (ब्रेन) पर असर, दूसरा यह कि मस्तिष्क (ब्रेन) के विकास पर असर एवं तीसरा यह कि विषाक्त पदार्थ ‘वसा’ में घुले रह कर मौजूद रहते हैं, तो मनुष्य के मस्तिष्क को बचाने वाले ‘‘ब्लड ब्रेन बैरियर’’ को प्रभावित कर सकते हैं। यह ‘‘ब्लड ब्रेन बैरियर’’ शरीर के शेष हिस्से में प्रवाहित रक्त की विषाक्तताओं से मस्तिष्क को सुरक्षा प्रदान करने का कार्य करता है। इसके दुष्प्रभावित होने से बच्चों के विकास में और भविष्य में बुरा असर पड़ सकता है। इस प्रकार बच्चों पर विशेष रूप से न्यूरोटाक्सिक पेस्टीसाइड्स के एक्सपोजर से संवेदनशीलता बढ़ जाती है।

खाद्य श्रृंखला पर शिखर पर उपलब्ध विष

माॅं के स्तन से दुग्धपान पर निर्भर शिशु के शरीर को वास्तव में इन विषाक्त रसायनों के पहुॅंचने की मात्रा इस बात पर निर्भर करती है कि बालक को गर्भावस्था में कितनी मात्रा में ये रसायन गर्भनाल (प्लेसेंटा) के द्वारा पहुॅंचते हैं। तदुपरांत मां के स्तन के दूध में इन रसायनों की सांद्रता कितनी है। इन दोनों का सम्बन्ध माॅं के शरीर में व्याप्त विषैले रसायनों की उपलब्धता तथा बच्चे को पिलाए जाने वाले दूध की मात्रा पर निर्भर करता है। माॅं के दूध में वसा की मात्रा (%) पोषणकाल में बदलती रहती है। प्रसव उपरांत माॅं के दूध में प्रारंभिक काल में वसा का प्रतिशत ज्यादा होता है, बनिस्बत बाद की अवधि के। 

इसी प्रकार दूध पिलाना आरंभ करने के समय में वसा की मात्रा ज्यादा होती है, बनिस्बत थोड़ी देर के बाद के दूध में। इसी कारण से थोड़ी-थोड़ी मात्रा में बार-बार दूध पिलाए जाने की स्थिति में बच्चे को ज्यादा वसा की मात्रा मिलने के कारण अधिक मात्रा में ‘‘वसा घुलनशील विषैले रसायन’’ शरीर में पहुॅंच सकते हैं। किन्तु, एक शिशु के शरीर में कीटनाशी रसायनों की मात्रा इस बात पर निर्भर करती है कि माॅं के दूध में ये किस स्तर तक थे तथा इसमें से कितनी मात्रा को शिशु ने अवशोषित किया और कितनी मात्रा को शरीर से बाहर निष्कासित कर दिया। 

यहाॅं यह महत्वपूर्ण तथ्य है कि इन विष रसायनों को निकालने का मार्ग, वृक्क (किडनी) के द्वारा छान कर तथा लीवर के द्वारा चयापचयन करके ही है, जो कि लीवर की कार्यक्षमता पर ही निर्भर है। किन्तु, प्रसव उपरांत शैशव अवस्था में ये दोनों ही अंग बहुधा बहुत कमजोर अवस्था में होते हैं तथा पूर्ण कार्यक्षमता हेतु विकसित नहीं हुए होते हैं। फलस्वरूप इन अंगों को इन विषाक्त पदार्थों को निकालने की क्षमता भी कम ही होती है। इस प्रकार विष निष्कासन तंत्र शैशव अवस्था में कमजोर ही होता है। खासकर कम वजन वाले कमजोर बच्चों में तो और भी कम विकसित होता है, जबकि ऐसे बच्चों की संख्या कम से कम 6ः तो होती ही है।

उच्च जोखिम वाला जन समूह यथा गरीब जीवनशैली, कुपोषण, अल्पपोषित माताएॅं या कम उम्र की माता (टीनेज मदर), गर्भकाल में सुपोषण की कमी या देर से सुपोषण आदि के कारण भी करीब 12 प्रतिशत से अधिक बच्चों का वजन सामान्य से कम होता है। इन अल्प परिपक्व शिशुओं में जीवन क्षमता पहले से ही कम होती है, क्योंकि वे पहले से ही रोगों के प्रति संवेदनशील होते हैं तथा उनमें शारीरिक विकास कम होने हेतु अनेक अन्य कारण भी होते हैं। 

अपरिपक्व जन्मे शिशुओं में विष गर्भित मां के दूध से दुष्प्रभाव होने की संभावना केवल इस कारण से अधिक नहीं होती कि उसके लीवर एवं किडनी सक्षम नहीं होते, अपितु ‘‘ब्लड ब्रेन बैरिअर’’ की प्रतिरक्षा टूटने की ज्यादा संभावना होती है। इन कारणों से कीटनाशकों तथा उनको शरीर में घोलकर परिवहन करने वाले माध्यम यथा वसा (फैट) जो कि दोनों ही न्यूरो टाक्सिन के रूप में चिन्हित हैं, शिशु स्वास्थ्य के प्रति गंभीर चिंता उत्पन्न करते हैं। केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र (सेंट्रल नर्वस सिस्टम) को क्षतिग्रस्त करने की संभावना ज्यादा होती है। चूॅंकि यह सत्य है कि मस्तिष्क एवं तंत्रिका तंत्र का सर्वाधिक विकास जन्मोपरांत ही होता है।

संदूषण के स्रोत

माॅं एवं शिशु में इन कीटनाशकों के एक्सपोजर के स्रोत बहुत स्पष्ट हैं। इस बात का आंकलन करना महत्वपूर्ण है कि कार्यस्थल, निवास, सामुदायिक स्थल एवं अन्य कहाॅं-कहाॅं से इन कीटनाशकों से पर्याप्त एक्सपोजर हो सकता है। चिंताजनक रसायनों में सीसा (लेड), पारा (मरकरी) एवं कैडमिअम तथा हैलो जिनेटेड हाइड्रोकार्बन हैं, जिनमें वसा में घुलनशील पेस्टीसाइड शामिल हैं, जो माॅं के दूध में उच्च वसा स्तर के कारण सरलता से स्थानांतरित हो जाते हैं। 

बहुत सारे कार्मिक अपने कार्यस्थल से कीटनाशकों के सम्पर्क में आते हैं, तो बहुत सारे लोग, जिनके कार्य में यद्यपि कीटनाशक का सम्पर्क नहीं भी होता, पर उनके कार्यालय, परिवहन गतिविधियों, अस्पताल या पार्क इत्यादि, जहाॅं कीटनाशक प्रयुक्त होते हैं, पर मौजूदगी के कारण सम्पर्क में आ जाते हैं। घरों में कीटनाशकों का प्रयोग नाना प्रकार से होता है। भवन संरचनाओं में कीट नियंत्रण हेतु, बगीचों में कीट नियंत्रण, खेती में कीट नियंत्रण, समुदाय में कीट नियंत्रण, खरपतवार नाश हेतु रसायन छिड़काव आदि से इन रसायनों से सम्पर्क हो जाता है।

समुदाय में अस्पतालों, स्कूलों, पार्कों, मालों में, बाजार में, सिनेमा भवनों में, बगीचों में, भंडार ग्रहों में कीटनाशकों का प्रचुरता से उपयोग किया जाता है। हवा, पानी, भोजन, दूध, फल, सब्जी, अनाज ये सभी शरीर तक कीटनाशक रसायन पहुॅंचाने के वाहक बन चुके हैं। शरीर में प्रवेश के मार्गों में, श्वास तंत्र, फेफड़े, चमड़ी, पाचन तंत्र, गर्भावस्था में  प्लेसेंटा (गर्भनाल) तथा स्तनपान के समय माॅं का दूध है। इस प्रकार नाना प्रकार के स्रोतों से कीटनाशक शिशु के शरीर में पहुॅंच सकते हैं।

स्वास्थ्य के प्रति चिंता

वर्तमान में उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर यद्यपि यह स्पष्ट कथन करना बहुत कठिन है कि वास्तव में उपरोक्त विषाक्तता से कितना निश्चिित दुष्प्रभाव है। हमारी समझ केवल उच्च स्तरीय मात्रा में कीटनाशकों के सम्पर्क के दुष्प्रभाव तक सीमित है। हमारे पास अभी भी इन शिशुओं पर बाल्यावस्था में सूक्ष्म मात्रा में ग्रहण किए जाने वाले कीटनाशकों के दीर्घावधि दुष्प्रभावों पर निश्चित आंकड़े नहीं है। पर आज भी यह ज्ञात है कि कीटनाशक, बाल्यावस्स्था में शिशुओं पर दुष्प्रभाव अवश्य डाल सकते हैं। इनके कारण आनुवांशिक परिवर्तन, कैंसर रोग, तंत्रिका रोग, रक्षा तंत्र में अवरोध (इम्यून डिस्टरबेंस) तो ज्ञात हैं। 

अभी तक यह कहना भी कठिन है कि कीटनाशक रसायनों की कितनी सूक्ष्म मात्रा सुरक्षित है। तदैव, इस लेख का आशय हमें अपने चतुर्दिक पर्यावरण में बढ़ रहे कीटनाशकों के जीव तंत्र पर प्रवेश करने हेतु सजग करने हेतु है तथा यह निगरानी रखना जरूरी है कि वर्तमान में प्रयोग किए जाने वाले विषैले रसायन किस प्रकार से जीव प्रणाली में संचारित हो रहे हैं। माॅं के दूध को भी उस निगरानी से मुक्त रखना ठीक नहीं।

भविष्य की सुरक्षा

चूॅंकि, आज के बालक ही देश का भविष्य हैं तथा बच्चों के जन्म काल से बढ़ रहे नाना प्रकार के रोग यथा बाल्य मधुमेह, तांत्रिक विकृतियाॅं, नेत्र रोग, हृदय रोग, चर्म रोग, कैंसर आदि इस बात के लिए हमें मजबूर करते हैं कि हम अपने पर्यावरण में बढ़ रहे विषाक्त रसायनों के जीव प्रणाली में व्याप्तता पर निरंतर निगरानी रखें और सजग रहें। जहाॅं तक सम्भव हो, हम इन रसायनों का कम से कम उपयोग करें तो ही अच्छा है।

ललित कुमार सिंघानिया

पर्यावरण ऊर्जा टाइम्स, रायपुर (छग)

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संपादक - ललित कुमार सिंघानिया, संयुक्त संपादक - रविन्द्र गिन्नौरे, सह संपादक - उत्तम सिंह गहरवार, सलाहकार - डा. सुरेन्द्र पाठक, महाप्रबंधक - राजकुमार शुक्ला, विज्ञापन एवं प्रसार - देवराज सिंह चौहान, लेआउट एवं डिजाइनिंग -उत्तम सिंह गहरवार, विकाष ठाकुर
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