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विष मुक्ति अभियान
खरपतवार नाशक रसायन से किडनी की भयावह बीमारी
(01-04-2014)

श्रीलंका सरकार ने एक अध्ययन के द्वारा यह पाया कि मोनसेंटो के ‘‘राउंडअप’’ नामक ‘‘ग्लाईफासेट’’ खरपतवार नाशक (Weedicide नींदानाशक) से क्रानिक किडनी की बीमारी युक्त मरीजों की संख्या बढ़ रही है। फलस्वरूप श्रीलंका सरकार ने इस खरपतवार नाशक के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया है। विशेष परियोजना मंत्री श्री एस.एम. चन्द्रसेना के अनुसार ‘‘ग्लाईफासेट’’ पर प्रतिबंध राष्ट्रपति श्री महिन्द्र राज पक्षे के निर्देशों के अनुसार किया गया है, ताकि किसानों के बीच भयावह रूप से बढ़ रही किडनी की बीमारी के विस्तार को रोका जा सके। 

इंटरनेशनल जर्नल आफ एनवायरमेंट रिसर्च एण्ड पब्लिक हेल्थ में प्रकाशित लेख में, एक अध्ययन में श्रीलंका के धान के किसानों के बीच बढ़ रहे घातक ‘‘अज्ञात किडनी की बीमारी’’ में तथा राउंडअप नामक खरपतवार नाशक ग्लाईफासेट रसायन में एक अंतर्सम्बन्ध के कारण दुष्प्रभाव होना पाया गया। अध्ययन में यह पाया गया कि यद्यपि रसायन स्वयं में नेफ्रोटाक्सिक (किडनी घातक) नहीं है, किन्तु जब यह पानी के कठोर पदार्थों यथा कैडमिअम, आर्सेनिक आदि जो मिट्टी या पानी में पहले से मौजूद कठोर तत्व होते हैं या किसी उर्वरक के साथ आते हैं, उसके साथ मिलकर यह भयावह घातकता एवं विषाक्तता विकसित कर लेते हैं।

अभी हाल के वर्षों में श्रीलंका के उत्तर मध्य, उत्तर पश्चिमी, उत्तर एवं पूर्वोत्तर प्रांतों के धान के किसानों में इस प्रकार के अज्ञात किडनी की बीमारी का भारी प्रकोप बढ़ते पाया गया है। मंत्री महोदय ने बताया कि श्रीलंका सरकार द्वारा किडनी की बढ़ती महामारी को रोकने के लिए अतिशीघ्र एक कार्यक्रम आरंभ किया जा रहा है। इस दिशा में किए जा रहे प्रयासों के अंतर्गत् राजाराता विश्वविद्यालय के डाॅ. चन्ना जया सुभना के मार्गदर्शन में बिना किसी रसायन के प्रयोग से ‘‘राजनगन्या’’ के बायें तट पर 100 एकड़ में धान की परम्परागत खेती की शुरूआत की जा रही है, ताकि रसायन मुक्त जैविक खेती को प्रोत्साहन मिल सके। इस क्षेत्रफल को भविष्य में बढ़ाकर, परम्परागत धान की किस्मों को अपनाकर दाहिने तट पर 5000 एकड़ तक पहुॅंचाया जाएगा। अगली खरीफ की फसल हेतु श्रीलंका सरकार ने एक लाख एकड़ में पूरे श्रीलंका में इस प्रकार के रसायन मुक्त खेती की योजना लागू कर रखी है।

उक्त घटनाक्रम भारत देश के लिए तथा भारत सरकार के कृषि, वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के साथ स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा ध्यान किए जाने योग्य है। चूॅंकि, भारत में भी इस खरपतवार नाशक का उपयोग भारी मात्रा में किया जाने लगा है। छत्तीसगढ़ राज्य में भी पिछले दो वर्षों में इसकी खपत में भारी वृद्धि हुई है। ‘‘सफाचट’’ नाम से प्रचलित हो रहे इस खरपतवार नाशक रसायन के दुष्प्रभावों पर आरंभ से ही निगरानी नहीं रखी गई, तो इसके अत्यंत घातक परिणाम इस पीढ़ी को और आने वाली पीढ़ी को भोगना पड़ सकते हैं।

पर्यावरण ऊर्जा टाइम्स

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