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प्रकृति संरक्षण को समर्पित एकमात्र पत्रिका आम आदमी की भाषा में
जल संरक्षण
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भूल रहे हैं तालाब की परम्परा

01-01-2015

तालाब सदियों से हमारे जीवन में रचे बसे थे। तालाबों से पेयजल मिलता था, वहीं सिंचाई के काम आते हैं। मखाना, सिंघाड़ा तो तालाबों से ही मिलते हैं। तालाब भूजल संरक्षण में अहम् भूमिका निभाते हैं। इंसान के अलावा अनेक जीव-जंतु तालाबों के भरोसे रहते हैं। मछली, कछुआ, मेंढक तो तालाबों में बसेरा करते हैं। 

जलस्रोतों में नदियों के बाद तालाबों का सर्वाधिक महत्व है। तालाबों से सभी जीव-जंतु अपनी प्यास बुझाते हैं। किसान तालाबों से खेतों की सिंचाई करते रहे हैं। हमारे दे...

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अब बचेगी कलियोसोत नदी

01-12-2014

नेशनल ग्रीन ट्रिब्युनल, भोपाल ने  20 अगस्त 2014 के अपने अंतरिम फैसले में मध्यप्रदेश सरकार को निर्देशित किया है कि वह बेतवा की सहायक नदी कलियासोत नदी के दोनों ओर 33 मीटर के क्षेत्र को नो कंस्ट्रक्शन जोन घोषित करे और नदी के दोनों ओर सभी अवैध निर्माण कार्यों को तुड़वाए और निर्माण कार्यों को तुड़वाने से जो जमीन खाली होगी, उसमें मौजूदा सीजन में ही फेंसिंग करा कर सघन वृक्षारोपण कराए, ताकि अतिक्रमण के कारण मर रही नदी को संजीवनी मिल सके। कोर्ट ने सरकार से 24 नवम्बर 2014 तक की...

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अब संकट में हैं तालाब

01-10-2014

छत्तीसगढ़ में जांजगीर-चांपा जिले के अधिकांश तालाब कचरे से पट चुके हैं। कुछ तालाब सूखने के कगार पर पहुॅंच चुके हैं, तो कई तालाबों को पाट दिया गया है। उच्चतम न्यायालय ने प्राकृतिक जल स्रोतों को सुरक्षित रखने व उनके संवर्धन का निर्देश दिया है। लेकिन जांजगीर जिला प्रशासन इस ओर उदासीन है।

गिरता भूजल स्तर

एक तरफ तालाब खत्म हो रहे हैं, वहीं औद्योगिक इकाईयां भूजल का अत्यधिक दोहन कर रही है। यही कारण है कि जिले के शक्ति, मालखरौदा, डभरा विकासखंड में भूजल स्तर सि...

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नदी सूखने से रोजी पर संकट

01-06-2014

‘‘पहले हम दुधी नदी में मच्छी पकड़ते थे, अब नदी सूख गई। खकरा और माहुल के पत्तों से दोना-पत्तल बनाते थे, अब उनका चलन कम हो गया। जंगलों से महुआ-गुल्ली, तेंदू, अचार लाते थे, वे अब नहीं मिलते। ऐसे में हमारा रोजी-रोटी का संकट बढ़ रहा है।’’ यह कहना है पलिया पिपरिया के रज्झर समुदाय के लोगों का।

होशंगाबाद जिले की बनखेड़ी तहसील के पलिया पिपरिया गांव में नदी किनारे रज्झर मोहल्ला है। इस मोहल्ला के ज्यादातर बुजुर्ग और बच्चे करीब 20 साल पहले तक दुधी नदी में मछली पकड़ते थ...

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वेदों में जल

01-05-2014

पंचमहाभूतों में से जल चतुर्थ महाभूत माना जाता है, जहाॅं जल जीवन के लिए उपयोगी और अनिवार्य है, वहीं समस्त प्रगति का संवाहक भी है। वैदिक-साहित्य का न्यूनतम 50 प्रतिशत भाग जल तत्व का किसी न किसी रूप में उल्लेख करता है। वेद में जितना वर्णन इन्द्र या जल के अधिष्ठाता देवताओं का हुआ है, उतना शेष देवताओं का नहीं हुआ है। मत्स्य के समान जल प्रत्येक प्राणी के जीवन के लिए अनिवार्य तत्व है। व्यवहार और विज्ञान की दृष्टि से जल तत्व का अनेक रूपों में उपयोग होता था। जलतत्व के ...

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संपादक - ललित कुमार सिंघानिया, संयुक्त संपादक - रविन्द्र गिन्नौरे, सह संपादक - उत्तम सिंह गहरवार, सलाहकार - डा. सुरेन्द्र पाठक, महाप्रबंधक - राजकुमार शुक्ला, विज्ञापन एवं प्रसार - देवराज सिंह चौहान, लेआउट एवं डिजाइनिंग -उत्तम सिंह गहरवार, विकाष ठाकुर
स्वामित्व, मुद्रक एवं प्रकाषक : एनवायरमेंट एनर्जी फाउडेषन, 28 कालेज रोड, चौबे कालोनी, रायपुर (छ.ग.) के स्वामित्व में प्रकाषित, महावीर आफसेट प्रिंटर्स, रायपुर से मुदि्रत, संपादक - ललित कुमार सिंघानिया, 205, समता कालोनी, रायपुर रायपुर (छ.ग.)

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